Thursday, 12 November 2020

न्यूज़ पोर्टल और नये नियम कानून क्या हैं आईये जानते हैं...?

"एस एम फ़रीद भारतीय"
दोस्तों सुना ही होगा डॉटा सस्ता और आटा महंगा, मगर इसी डॉटा से आटा कमाया जा सकता है कैसे यही आज हम आपको बतायेंगे ही नहीं बल्कि अगर आप हमारी मदद लेना चाहेंगे तब हम पूरी ईमानदारी से आपकी मदद भी करेंगे, तो चलिए आगे बढ़ते हैं.
जब से भारत में जिओ (Jio) आया है तभी से भारत मैं  सस्ती इंटरनेट सेवा (Internet) शुरू हो चुकी है, या यूं कहें कि नेट क्रांति के बाद से इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या में अचानक से भारी मात्रा में वृद्धि हुई है, अब पहले की तुलना में और भी अधिक लोग इंटरनेट से रूबरू हो चुके है, बड़े-२ शहरों की बात को तो छोड़िये अब तो गांव कस्बे और गली मुहल्ले के लोगो के लिए भी इंटरनेट बड़ी ही आसान और सस्ती चीज़ हो गई है.

अगर सच माने तो एक कंपनी के आंकलन के मुताबिक 2025 में भारत में इंटरनेट उपभोगताओं (Internet Users) की संख्या लगभग 10 करोड़ 10 लाख (110 Million) होने वाली है.

अगर हम बताये जा रहे आंकड़ों की माने तो भारत ही नहीं दुनियां मैं इंटरनेट पर लोग सबसे अधिक समय समाचार पढ़ने, देखने के लिए बीताते है, ऐसे में जो भी लोग समाचार तथा इस इंडस्ट्री (News Industry) से जुड़े है उन्हें काफी अधिक फायदा हो रहा है, लोगों को मनचाही ख़बर आसानी से मिल जाती है.

हर दिन समाचार वाली वेबसाइट (Website) पर आने वाले लोगो की संख्या बढ़ते ही जा रही है, ऐसे में जो भी लोग न्यूज़ वेबसाइट (News Website / News Portal) चला रहे है इससे काफी अच्छी कमाई भी कर रहे है। तो आइये समझते है की आखिर न्यूज़ पोर्टल (News Portal) क्या होता है?  और न्यूज़ पोर्टल से किस तरह से कमाई की जा सकती है? (News Portal Earning).

न्यूज़ पोर्टल क्या होता है? News Portal Kya Hota Hai...?
न्यूज़ पोर्टल (news portal) एक खास तरह की वेबसाइट होती है जहां पर आप किसी भी तरहां के छोटे बड़े समाचार (ख़बरों) को पढ़ते है, दूसरे शब्दों में कहे तो जो वेबसाइट नियमित तरीके से ताजा ख़बरों और समाचारों से आपको अवगत कराने के लिए सोशल मीडिया यानि इंटरनेट पर प्रकाशित (publish) करते हैं, उसे सरल भाषा मैं कहें या देहाती भाषा मैं, लोग न्यूज़ पोर्टल (news portal) कहते हैं.

अगर आप इंटरनेट पर समाचार पढ़ते होंगे तो आपको नीचे दिए गए किसी ने किसी न्यूज़ पोर्टल से सामना जरूर हुआ होगा, सीधे शब्दों में कहते तो आज हर टीवी चैनल, समाचार पत्र अपना न्यूज़ पोर्टल चला रही है और उसके माध्यम से पाठकों तक लेटेस्ट अपडेट (latest update) पंहुचा रही है।

न्यूज़ पोर्टल के उदहारण हैं...?
https://www.nbtvindia.in 
या अन्य कोई और वेबसाइट.

न्यूज़ पोर्टल से कमाई कैसे होती है...? 
(News Portal Earning)
एक न्यूज़ पोर्टल को शुरू (Start a News Portal) करने के बाद आप कई तरीकों से कमाई कर सकते है, हालाँकि न्यूज़ पोर्टल से कमाई करने में जो सबसे अधिक प्रचलित तरीका है वह है विज्ञापन (Advertisements) के जरिए ही है.

यानि आपके वेब पोर्टल पर ख़बरों के बीच में विज्ञापन (Ads) होगा जिसके माध्यम से आप कमाई कर सकते है, लेकिन अब यह प्रश्न उठता है की आखिर न्यूज़ पोर्टल पर विज्ञापन देगा कौन, ये आयेगा कहां से...?

इस सवाल का जवाब है, विज्ञापन एजेंसी (Ad Agency) से, जैसे आप नेट पर अपनी वेबसाइट बनाकर ख़बरों से नाम व पैसा कमाना चाहते हैं ऐसे ही बहुत से लोग इंटरनेट पर बहुत सी ऐसी विज्ञापन एजेंसी बनाकर पैसा कमा रहे हैं जो इस फ़ील्ड के माहिर हैं, वही आपकी मदद करेंगे, वही आपके न्यूज़ पोर्टल पर पाठकों की संख्या (Traffic) के आधार पर आपको विज्ञापन (advertisements) दिलायेंगे, बस आपको ज़रूरत है अपने समाचार और ख़बरों से अपने पोर्टल पर भीड़ को लाना यानि देखने सुनने वालों को जमा करना.

इसके साथ ही दूसरा तरीका यह भी है कि आप खुद अपने शहर, कस्बे, गांव व ज़िले की विभिन्न कम्पनियों व अलग-२ तरह के छोटे बड़े दुकानों से विज्ञापन लेकर अपने पोर्टल की ख़बरों के बीच लगा सकते है.

विज्ञापन के अलावे भी न्यूज़ पोर्टल से कमाई करने के कई तरीके है जिसमे एफिलिएट मार्केटिंग (Affiliate Marketing) अदि शामिल है.

अब सवाल है कि आप न्यूज़ पोर्टल कैसे शुरू करे...? Start News Portal, न्यूज़ पोर्टल को शुरू करने के लिए कई तरह की मूलभूत जरूरते है जिसे आपको पूरा करना होता है, सबसे पहले बजट और ख़ुद को पत्रकारिता का ज्ञान होना ज़रूरी है.

अभी से डरिए मत ये सभी जरूरते काफी साधारण है...!
सबसे पहले तो आपको पत्रकारिता के ज्ञान के साथ अपने आसपास की ख़बरों से अपडेट रहना होगा, यानि सही ख़बरों को जानना और समझना होगा, जिस भी तरह का न्यूज़ वेबसाइट या पोर्टल आप शुरू करेंगे उस क्षेत्र से जुड़ी हर छोटी बड़ी ख़बर के बारे में आपको पता होनी चाहिए, साथ ही ख़बर की सच्चाई और ईमानदारी ही आपको पत्रकारिता मैं यक़ीन और विश्वास के काबिल बनाती है.

लिहाज़ा इसके लिए आपकी लेखनी अच्छी होनी चाहिए, जिससे आप ऐसा लिख सके जो आपके पाठकों के बहुत आसानी से समझ मैं आ सकें, आपको पत्रकारिता के मूल सिद्धांत और नियमों की जानकारी भी होना ज़रूरी है, इसी के साथ आपको कंप्यूटर और इंटरनेट के बारे में आम लोगों से थोड़ी अधिक जानकारी होनी चाहिए, लेकिन यहां आप किसी को आप पत्रकार के रूप मैं नियुक्त नहीं कर सकते हैं ये सोचने का विषय है.

क्यूं भागीदार नहीं कर सकते तब आईये ये भी आपको बताते हैं...?
मान लो आप अगर किसी बस मैं मुफ़्त की सवारी कर रहे हैं तब क्या आप उस बस की बाकी सवारियों से पैसा वसूल कर सकते हैं, जिसमें आप ख़ुद मुफ़्त सवारी कर रहे हैं...?

नहीं कर सकते सही कहा ना, ऐसे ही अगर आप किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर फ़्री मै अपने लेख, समाचार या कोई वीडियो बनाकर डाल रहे हैं तब आप अपने किसी दोस्त साथी भाई या भारत देश के नागरिक को अपने लिए कैसे काम करने वाला यानि पत्रकार नियुक्त कर सकते हैं, ये ग़ैर कानूनी और ठगी माना जायेगा...?

इसके अलावा अगर आप एक डोमेन लेकर एक छोटी सी वेबसाइट बना भी लेते हैं तब भी आप उसूलों को हिसाब से सही से पत्रकारिता को नियम के साथ देश के संविधान को नहीं समझ रहे हैं, क्यूंकि हर नागरिक आपकी तरहां आज़ाद है, जब तक उसकी मर्ज़ी ना हो तब तक आप उसे अपने से छोटा सहभागी नहीं बना सकते, वो भी सोशल नेटवर्किंग साइट पर, जैसा कि अधिकतर लोग कर रहे हैं, वो एक छोटी सी वेबसाइट बनाकर ख़ुद को सम्पादक के साथ ना जाने क्या क्या समझने लगते हैं और पत्रकार बनाने की घोषणा भी करते रहते हैं, ये सब भी ग़ैर कानूनी और ठगी मैं ही आता है.

न्यूज़ पोर्टल शुरू करने में कितना खर्च लगता है...?
कहने को आप न्यूज़ पोर्टल को बिना एक पैसे खर्च किए भी शुरू किया जा सकता है जैसे यूट्यूब पर, फ़ेसबुक पर या फिर किसी और सोशल नेटवर्किंग साइट पर, लेकिन अगर आप डोमेन और होस्टिंग लेते है तो कुछ खर्च जरूर आता है, शुरुआती दौर में यह खर्च 5 हजार सालाना से भी कम होता है, मगर असल मैं ये न्यूज़ पोर्टल नहीं न्यूज़ की वेबसाइट होती है, मगर इसी को अधिकतर लोग पोर्टल कहते भी और समझते भी हैं लेकिन हम आपको समझाते हैं फ़र्क क्या है.

दोस्तों असल मैं न्यूज़ पोर्टल एक तरहां से सैटेलाइट चैनल का छोटा रूप है, जैसे न्यूज़ चैनल का बजट आठ करोड़ से लेकर बीस करोड़ है, ऐसे ही असल न्यूज़ पोर्टल का बजट भी पचास लाख से दो करोड़ के बीच होता है, बस फ़र्क इतना है कि सेटेलाइट चैनल आपके घर मैं टीवी पर बिना नेट के चलता है, जबकि न्यूज़ पोर्टल इन्टरनेट के साथ मोबाइल, टीवी या कम्प्यूटर पर भी देखा जा सकता है, जिसको एक हैवी या मध्यम नेट सर्वर के साथ प्रसारित किया जाता है, यही असल मैं न्यूज़ पोर्टल होता है इसके लिए आपके पास अपनी एक कम्प्लीट वेबसाइट और मध्यम वेब सर्वर तो ज़रूर होना चाहिए, जिसपर आपकी ख़बर बिना किसी सहारे के अपलोड की जा सके, जबकि छोटी वेबसाइट वालों को बाकी सोशल नेटवर्किंग साइटों का सहारा लेना पड़ता है, ये न्यूज़ पोर्टल नहीं कही जा सकती.

अगर आपको अपना ख़ुद ता नेटवर्क खड़ा करना है और पत्रकारों की टीम के साथ बिजनेस की टीम भी बनानी है तब आपको सही मैं मध्यम सर्वर के साथ वेब पोर्टल बनाना चाहिए, इसके लिए सबसे पहला रास्ता अपनी एक अच्छी वेबसाइट के साथ एक अच्छा वेब सर्वर होना ज़रूरी है, शुरू मैं आप छोटे सर्वर से काम चला सकते हैं मगर बढ़ती जिसको वीवर्स और ट्रेफ़िक भी कहा जाता है,  जिसके बढ़ने के साथ ही आपको अपने इस सर्वर को भी बड़ा और मज़बूत करना होगा, तब आप बाकी सोशल नेटवर्किंग साइटों का सहारा अपने विस्तार यानि ट्रेफ़िक भीड़ बढ़ाने के लिए ले सकते हैं.

 दोस्तों अगर आपके अंदर भी ऊपर दिए गए कुछ मूलभूत गुण और बजट है तब आप भी एक कामयाब कमाई वाला न्यूज़ पोर्टल शुरू करके घर बैठे पैसे कमा सकते है और अपने पाठकों के बीच समाचार और ज्ञान की परंपरा का विस्तार कर सकते है, जो समाचारपत्र या पत्ररिकाओं से बेहतर और कम मेहनत वाला है, अगर आप कोई  पत्रिका निकालते हैं तब आपको बड़ी मेहनत करनी होगी इसे छापने से लेकर बेचने तक, जो बहुत मुश्किल काम है, क्यूंकि पत्रिका वही बिकेगी जिसकी ख़बरें दमदार होंगी वरना आपको घर से पैसा लगाना होगा, जबकि न्यूज़ पोर्टल मैं बस आपको दिमाग के साथ एक जगह मेहनत करनी होगी.

न्यूज़ पोर्टल कैसे शुरू करे...?
अगर आप न्यूज़ पोर्टल शुरू करना चाहते है तो आप हमारे फ़ोन नंबर 9808123436 पर संपर्क कर पूरी जानकारी ले सकते है.

सवाल क्या न्यूज़ पोर्टल का रजिस्ट्रेशन करना होता है...?

जी अभी तक भारत में न्यूज़ पोर्टल को रजिस्टर करने के लिए कोई मज़बूत नियम कानून मौजूद नहीं था, ऐसे में लोगों ने बिना किसी रजिस्ट्रेशन के आराम से न्यूज़ पोर्टल चलाये हैं, लेकिन आज ही केंद्र सरकार ने कानून बनाया है, लेकिन अभी पूरे नियम कानून तय नहीं हुए हैं, लिहाज़ा फिर भी पत्रकारिता के नियम व कानूनों के साथ भारतीय संविधान का अध्ययन ज़रूर कर लें, वरना ऐसा ना हो आप किसी मुसीबत या परेशानी मैं घिर जायें.

नया नियम कानून 2020 क्या है...?
सरकार अब ऑनलाइन न्यूज प्लेटफॉर्म्स और कंटेंट प्रोवाइडर्स को ‘सूचना-प्रसारण मंत्रालय’ (MIB) के दायरे में ले आई है। इसके लिए सरकार की ओर से अधिसूचना जारी कर दी गई है। नौ नवंबर को जारी इस अधिसूचना के अनुसार, राष्ट्रपति ने वेब फिल्म्स, डिजिटल न्यूज और करेंट अफेयर्स कंटेंट को सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन लाने के आदेश को मंजूरी दे दी है.

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में एक मामले में वकालत की थी कि ऑनलाइन माध्यमों का नियमन (Regulation of Digital Media) टीवी से ज्यादा जरूरी है। अब सरकार ने ऑनलाइन फिल्मों के साथ ऑडियो-विजुअल कार्यक्रम, ऑनलाइन समाचार और करंट अफेयर्स के कंटेंट को सूचना प्रसारण मंत्रालय के तहत लाने का कदम उठाया है।

इस बारे में सरकार की ओर से जारी अधिसूचना को आप यहां पढ़ सकते हैं.


आपको ये जानकारी कैसी लगी हमको ज़रूर बतायें, हमें आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा...!

Monday, 2 November 2020

नया समाचारपत्र या पत्रिका शुरू करने के लिए क्या करें...?

यहां बताया जा रहा है कि आप कैसे शुरू करें अपना नया समाचार पत्र...?

"एस एरम फ़रीद भारतीय"
अकसर लोगों के पास यह जानकारी नहीं होती है कि नया समाचारपत्र या पत्रिका निकालते वक़्त करना क्या चाहिए. कृपया एक बार पढ़कर या इसे कापी करके ना रखें बल्कि लगातार इसके अपडेट्स सरकारी ऑफिसियल वेबसाईट http://www.rni.nic.in पर देखते रहें ताकि आप बदलते नियमों से भी परिचित हो सकें.

इस जानकारी देने का मक़सद आपको उन दलालों से भी दूर रखना है जो आपको आरएनआई के नाम पर ठगते हैं, आपको बता दें आरएनआई समाचारपत्र या पत्रिका के रेजिस्ट्रेशन के लिए ना तो कोई फ़ीस लेता है और ना ही आप वहां बिना समय लिए मिलने जा सकते हैं, क्यूंकि आरएनआई बाकी सरकारी कार्यालयों से अलग या यूं समझें जैसे पासपोर्ट कार्यालय का काम होता है ठीक इसी तरहां या इससे भी अधिक नियमों का पालन करता है, आरएनआई की चेतावनी के बाद भी अकसर सुनने को मिलता है कि समाचारपत्रों के नामांकन के पर ठगी की जा रही है, लिहाज़ा ऐसे लोगों से सावधान ही ना रहें, बल्कि इसकी सूचना आरएनआई के अधिकारियों को या हमको दें हम उनकी शिकायत आरएनआई से करेंगे.


1. रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया के पूर्व यदि किसी भी प्रकार का प्रकाशन किया जाता है तो वह न केवल अवैध होगा बल्कि कलेक्टर या कलेक्टर द्वारा अधिकृत एडीशनल कलेक्टर या एसडीएम को यह अधिकार होगा कि वह उसके मुद्रक, प्रकाशक एवं संपादक के खिलाफ संवैधानिक कार्रवाई करे एवं संबंधित प्रकाशन तत्काल प्रभाव से बंद कराकर बाजार में उपलब्ध उसकी सभी प्रतियां जब्त कर ले. बिना रजिस्ट्रेशन के किसी भी प्रकार का प्रकाशन अवैध माना जाएगा, चाहे वह किसी समाज की सामाजिक पत्रिका हो या किसी स्कूल की वार्षिक स्मारिका. इस श्रेणी में वे पर्चे भी आ जाते हैं जो दुकानदार भाईयों या नेताओं द्वारा अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए छपवाए जाते हैं. मजिस्ट्रेट उनके खिलाफ कार्रवाई संपादित कर सकते हैं.

2. भारत में छपने तथा प्रकाशि‍त होने वाले समाचारपत्र एवं आवधि‍क प्रेस एवं पुस्‍तक पंजीकरण अधि‍नि‍यम, 1867 तथा समाचारपत्रों के पंजीकरण(केन्‍द्रीय) नि‍यम, 1956 द्वारा नि‍यंत्रि‍त होते हैं। अधि‍नि‍यम के अनुसार, कि‍सी भी समाचार पत्र अथवा आवधि‍क का शीर्षक उसी भाषा या उसी राज्‍य में पहले से प्रकाशि‍त हो रहे कि‍सी अन्‍य समाचारपत्र या आवधि‍क के समान या मि‍लता‑जुलता न हो, जब तक कि‍ उस शीर्षक का स्‍वामि‍त्‍व उसी व्‍यक्‍ति‍ के पास न हो ।

इस शर्त के अनुपालन को सुनि‍श्‍चि‍त करने के लि‍ए, भारत सरकार ने समाचारपत्रों का पंजीयक नि‍युक्‍त कि‍या है, जि‍न्‍हें प्रेस पंजीयक भी कहा जाता है, जो भारत में प्रकाशि‍त होने वाले समाचारपत्रों एवं आवधि‍कों की पंजि‍का का रख‑ रखाव करते हैं। भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का कार्यालय का मुख्‍यालय नई दि‍ल्‍ली में है तथा देश के सभी क्षेत्रों की जरूरतों को पूरा करने के लि‍ए कोलकाता,मुंबई तथा चेन्‍नई में तीन क्षेत्रीय कार्यालय भी हैं। कार्यालयों के पते एवं कार्यक्षेत्र के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र नि‍म्‍नानुसार हैं?

आर.एन.आई. के वि‍भि‍न्‍न कार्यालयों के पता

भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का कार्यालय,
1. मुख्‍यालय,
पश्‍चि‍मी खंड‑8, स्‍कंध‑2,
आर.के.पुरम,नई दि‍ल्‍ली‑110066

2. भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का क्षेत्रीय कार्यालय,

    एम.एस.ओ.भवन,बलॉक डी एफ

   द्वि‍तीय तल , पो0 सी.सी.ब्‍लॉक,
सॉल्‍ट लेक,कोलकाता‑700064

3. भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का क्षेत्रीय कार्यालय,
ए‑1,वि‍गं,नि‍चला तल, नया सी.जी.ओ.कॉम्‍पलेक्‍स,
सी.बी.डी,बेलापुर, नवी मुंबई‑400614

4. भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का क्षेत्रीय कार्यालय,
बी‑ ब्‍लाक,बी स्‍कंध, (बी‑2‑बी) सी.जी.ओ.कॉम्‍पलेक्‍स
राजाजी भवन, बेसंत नगर,चेन्‍नई‑600090

प्रेस एवं पुस्‍तक पंजीकरण अधि‍नि‍यम के अनुसार, मुद्रक एवं प्रकाशक को जि‍ला/महाप्रांत/उप‑प्रखण्‍ड दण्‍डाधि‍कारी के समक्ष घोषणा करनी होती है, जि‍सके स्‍थानीय अधि‍कारक्षेत्र के अधीन समाचारपत्र मुद्रि‍त अथवा प्रकाशि‍त कि‍या जाएगा, कि‍ वह उक्‍त समाचारपत्र का मुद्रक/प्रकाशक है।

घोषणा पत्र में समाचारपत्र संबंधी सभी वि‍वरण शामि‍ल होने चाहि‍ए, जैसे कि‍ कि‍स भाषा में प्रकाशि‍त होगा, प्रकाशन का स्‍थान इत्‍यादि‍। समाचारपत्र के प्रकाशन से पहले दण्‍डाधि‍कारी द्वारा घोषणा पत्र को अधि‍प्रमाणि‍त कि‍या जाना चाहि‍ए।

अधि‍प्रमाणन से पहले, दण्‍डाधि‍कारी समाचारपत्रों के पंजीयक से छानबीन करने के बाद यह पुष्‍टि‍ करता है कि‍ प्रेस एवं पुस्‍तक पंजीकरण अधि‍नि‍यम की धारा 6 में उल्‍लि‍खि‍त शर्तों का पालन हो रहा है।

समाचार पत्र का पंजीकरण

समाचार पत्र के प्रथम अंक के प्रकाशन के बाद, आर.एन.आई. से समाचारपत्र को पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी करने का अनुरोध अवश्‍य कि‍या जाना चाहि‍ए । समाचार पत्रों/पत्रि‍काओं के पंजीकरण के लि‍ए जांच सूची/दि‍शा नि‍र्देश नि‍म्‍नलि‍खि‍त हैं :

1. आवश्‍यक दस्‍तावेज
(क) आर.एन.आई. द्वारा जारी शीर्षक सत्‍यापन पत्र की फोटोकापी ।
(ख) डी.एम./ए.डी एम/डी सी पी/सी एम एम/एस डी एम द्वारा प्रपत्र‑। में नि‍र्दिष्‍ट(देखें नि‍यम‑3) प्रमाणीकृत घोषणा की सत्‍यापि‍त प्रति‍ ।
(ग) प्रथम अंक में खंड‑1 और अंक­‑1 का उल्‍लेख करें !
(घ) नि‍र्धारि‍त प्रपत्र में ‘ कोई वि‍देशी बंधन नहीं ‘ के लि‍ए प्रकाशक का शपथ पत्र(देखें परि‍शि‍ष्‍ट‑IV) ।
2. यदि‍ मुद्रक और प्रकाशक भि‍न्‍न हों तो अलग घोषणा दाखि‍ल करनी होगी ।
3. प्रथम अंक में स्‍पष्‍ट रूप से खंड‑। और अंक‑1, दि‍नांक‑रेखा,पृष्‍ठसंख्‍या और प्रकाशन के शीर्षक का उल्‍लेख होना चाहि‍ए ।
4. घोषणा के प्रमाणीकरण की ति‍थि‍ से छह सप्‍ताह की अवधि‍ के भीतर (दैनिक‍/साप्‍ताहि‍क के लि‍ए) और तीन महीने के भीतर(अन्‍य अवधि‍यों वाले प्रकाशनों के लि‍ए) प्रकाशन प्रकाशि‍त हो जाना चाहि‍ए ।
5. इंम्‍प्रिं‍ट लाइन में(क) प्रकाशक का नाम(ख) मुद्रक का नाम,(ग) स्‍वामी का नाम,(घ) मुद्रणालय का नाम व पूरा पता,(ड.) प्रकाशन का स्‍थान व पता,और (च) सम्‍पादक का नाम शामि‍ल होना चाहि‍ए ।
2.11.2 यदि‍ उचि‍त जांच पड़ताल के पश्‍चात आवेदन संतोषजनक पाया जाता है तो प्रेस पंजीयक अपने यहां रखे गए रजि‍स्‍टर में समाचार पत्र के वि‍वरण दर्ज करेगा और प्रकाशक को पंजीकरण प्रमाण पत्र जारी करेगा ।
2.11 नई घोषणा करने पर नया/संशोधि‍त प्रमाण पत्र ले लें
2.12.1 जब भी कभी पैरा 2.6.1 के (क) से (ज) में उल्‍लि‍खि‍त परि‍स्‍थि‍ति‍यों में नई घोषणा की जाती है, तो संशोधि‍त पंजीकरण प्रमाण पत्र के लि‍ए प्रेस पंजीयक को आवेदन करना आवश्‍यक होगा । लेकि‍न यदि‍ नई घोषणा पैरा 2.6.1 के (झ) से (ड) में उल्‍लि‍खि‍त परि‍स्‍थि‍ति‍यों के अंतर्गत की गई हो तो संशोधि‍त प्रमाणपत्र जरूरी नहीं होगा ।

आवश्‍यक दस्‍तावेज नि‍म्‍नानुसार हैं :

(क) सम्‍बद्द मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा प्रमाणीकृत नई घोषणा की सत्‍यापि‍त फोटोकापी, जि‍समें परि‍वर्तन(परि‍वर्तनों) का उल्‍लेख होगा ।
(ख) प्रकाशन के नवीनतम अंक की प्रति‍, जि‍समें सही इम्‍प्रिं‍ट लाइन,प्रकाशन का नाम तथा दि‍नांक रेखा हर पृष्‍ठ पर मुद्रि‍त हो ।
(ग) आर.एन.आई. कार्यालय द्वारा जारी मूल पंजीकरण प्रमाणपत्र ।
(घ) यदि‍ मूल पंजीकरण प्रमाणपत्र खो गया हो, नष्‍ट हो गया हो, चोरी चला गया हो, तो मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा हस्‍ताक्षरि‍त शपथपत्र तथा उसके साथ आर.एन.आई. के नाम पर 5 रूपए का भारतीय पोस्‍टल आर्डर देना होगा।
(ड.) स्‍वामि‍त्‍व के परि‍वर्तन की स्‍थि‍ति‍ में सम्‍बद्द मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा प्रमाणीकृत स्‍वामि‍त्‍व सम्‍बन्‍धी अंतरण‑पत्र (ट्रांसफर डीड) की सत्‍यापि‍त फोटोकापी भी प्रस्‍तुत करनी होगी ।
(च) प्रकाशन के शीर्षक/भाषा के परि‍वर्तन की स्‍थि‍ति‍ में शीर्षक सत्‍यापन पत्र की एक प्रति‍ प्रस्‍तुत करनी होगी ।
2.13 प्रमाण पत्र खो गया है ? डुप्‍लि‍केट प्रमाण पत्र ले लें
2.13.1 जब मूल पंजीकरण प्रमाण पत्र खो जाए या खराब हो जाए या चोरी चला जाए तथा ऐसी परि‍स्‍थि‍ति‍ न हो, जि‍समें ऊपर बताए अनुसार नई घोषणा की जा सकती हो तो डुप्‍लीकेट पंजीकरण प्रमाण पत्र जारी करने के लि‍ए प्रेस पंजीयक को आवेदन दि‍या जा सकता है, जि‍सके साथ एक अलग पृष्‍ठ पर पूरा वि‍वरण देना होगा । कृपया ध्‍यान रखें यदि‍ प्रमाण पत्र खो गया है या चोरी चला गया है, तो पुलि‍स द्वारा दर्ज की गई प्राथमि‍की की एक प्रति‍ या पुलि‍स की मुहर लगी शि‍कायत की एक प्रति‍ जैसा पर्याप्‍त दस्‍तावेजी सबूत प्रस्‍तुत करना जरूरी होगा , जो दर्शाए कि‍ मामला सम्‍बद्द पुलि‍स अधि‍कारि‍यों को सूचि‍त कर दि‍या गया है।

वांछि‍त दस्‍तावेज नि‍म्‍नानुसार हैं:

(क) नोटरी या सम्‍बद्द मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा उसके हस्‍ताक्षर व कार्यालय मुहर के साथ प्रमाणीकृत इस आशय का एक शपथपत्र ।
(ख) सम्‍बद्द मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा प्रमाणीकृत नवीनतम घोषणा की सत्‍यापि‍त फोटोकापी ।
(ग) सही इम्‍प्रिं‍ट लाइन सहि‍त प्रकाशन के नवीनतम अंक की एक प्रति‍ 1
(घ) आर.एन.आई. के नाम पर 5 रूपए का भारतीय पोस्‍टल आर्डर ।
(ड.) ‘ कोई वि‍देशी बंधन नहीं ‘ के लि‍ए एक शपथ पत्र (देखें परि‍शि‍ष्‍ट‑।V) प्रकाशक द्वारा भेजी जाने वाली
नि‍यत कालि‍क सूचना/रि‍टर्न 1. प्रपत्र ‑II में वार्षि‍क वि‍वरण (देखें नि‍यम 6(i)
2. प्रपत्र‑IV में समाचारपत्र के स्‍वामि‍त्‍व का तथा अन्‍य वि‍वरण(देखें नि‍यम 8)
3. परि‍शि‍ष्‍ट‑ VIII के अनुसार दैनि‍क प्रेस का वि‍वरण
4. आयाति‍त अखबारी कागज का इस्‍तेमाल करने वाले प्रकाशक को परि‍शि‍ष्‍ट IX के अनुसार आयाति‍त अखबारी कागज की खरीद और खपत के बारे में भी रि‍टर्न भरनी होगी ।

3.1 अखबारी कागज़

3.1.1 इनमें से एक भारत सरकार की अखबारी कागज की नीति‍ के बारे में है । सरकार की वर्तमान नीति‍ इस प्रकार है:
क) अखबारी कागज के वार्षि‍क स्‍वदेशी उत्‍पादन का कम से कम एक ति‍हाई हि‍स्‍सा,छोटे और
मझौले समाचारपत्रों के लि‍ए आरक्षि‍त रखा जाएगा ।
ख) वास्‍तवि‍क उपभोक्‍ताओं को अखबारी कागज के आयात की अनुमति‍ है 1
3.1.2 छोटे या मझौले ? आपको स्‍वदेशी अखबारी कागज मि‍ल सकता है
3.1.3 अखबारी कागज नीति‍ के उदेश्‍य के लि‍ए, उन समाचार पत्रों को छोटा और मझौला समाचारपत्र माना गया है, जि‍नकी अखबारी कागज की वार्षि‍क खपत 200 मीटरी टन से अधि‍क नहीं है । वर्तमान में स्‍वदेशी अखबारी कागज प्राय: उपलब्‍ध है तथा छोटे व मझौले समाचार पत्रों को इस सम्‍बन्‍ध में कोई समस्‍या नहीं होगी । फि‍र भी, यदि‍ आवश्‍यक हो, तो इस श्रेणी के समाचार पत्र,आर.एन.आई. से ‘ पात्रता प्रमाण पत्र ‘ के लि‍ए आवेदन कर सकते हैं, जो परि‍शि‍ष्‍ट में दि‍ए गए प्रपत्र में दि‍या गया है जि‍सके आधार पर वे अनुसूचि‍त कागज कारखानों से स्‍वदेशी अखबारी कागज प्राप्‍त कर सकेंगे ।
3.1.4 पर्याप्‍त नहीं ? आप अखबारी कागज आयात कर सकते हैं
3.1.5 सरकार की वर्तमान नीति‍, वाणि‍ज्‍य मंत्रालय की अधि‍सूचना दि‍नांक 5.3.1997 तथा सूचना एवं प्रसारण
मंत्रालय की सार्वजनि‍क सूचना दि‍नांक 26‑3‑98 में प्रस्‍तुत की गई है । इसके अनुसार प्रत्‍येक पंजीकृत समाचार पत्र अखबारी कागज का आयात कर सकता है । इसके लि‍ए, समाचार पत्र के प्रकाशक/स्‍वामी को समाचार पत्र के पंजीयन प्रमाण पत्र को आर.एन.आई. से प्रमाणीकृत कराना होगा, जि‍सके आधार पर आयात की अनुमति‍ प्रदान की जाएगी । इस प्रयोजन के लि‍ए परि‍शि‍ष्‍ट‑VI में दि‍ए गए प्रपत्रों में आवेदन दि‍ए जा सकते हैं । आवेदन के साथ (क) समाचारपत्र के नवीनतम पंजीकरण प्रमाणपत्र की दो प्रति‍यां (ख) पि‍छले कैलेंडर वर्ष के लि‍ए वार्षि‍क वि‍वरण की सत्‍यापि‍त प्रति‍, और (ग)आवेदन की ति‍थि‍ से पि‍छले 12 महीनों के प्रत्‍येक महीने के लि‍ए एक‑एक नमूना अंक भेजने होंगे । लेकि‍न उन समाचारपत्रों को जि‍नकी शुरूआत और पंजीकरण के बाद एक वर्ष पूरा न हुआ हो,उन्‍हें ऊपर(ख)और(ग) में नि‍र्दि‍ष्‍ट दस्‍तावेज भेजने की आवश्‍यकता नहीं है । ऐसे मामलों में (क) में नि‍र्दि‍ष्‍ट दस्‍तावेजों के अलावा,प्रकाशन के प्रत्‍येक पूर्ण महीने का नमूना अंक प्रस्‍तुत कि‍या जाना चाहि‍ए ।
4.2 वार्षि‍क वि‍वरण
प्रत्‍येक प्रकाशक को समाचार पत्र के बारे में एक वार्षि‍क वि‍वरण प्रेस पंजीयक को भेजना होगा । यह वि‍वरण, समाचार पत्र पंजीकरण(केन्‍द्रीय)नि‍यम,1956 की अनुसूची के प्रपत्र ।। में देना होगा । देखें नि‍यम 6(i) ।
4.2.2 कैलेंडर वर्ष के अनुसार भेजे जाने वाले यह वि‍वरण अगले वर्ष के फरवरी माह के अंति‍म दि‍वस
से पहले/तक पहुंच जाना चाहि‍ए ।
4.2.3 जहां समाचार पत्र की प्रसार संख्‍या,प्रति‍ प्रकाशन दि‍वस 2000 से अधि‍क हो, वहां वार्षि‍क वि‍वरण
के साथ नि‍र्धारि‍त प्रपत्र के नीचे खंड‑ख के अनुसार चार्टर्ड एकाऊटेंट या योग्‍यता प्राप्‍त लेखा परीक्षक का प्रमाण पत्र प्रस्‍तुत करना होगा ।
4.2.4 समय से वार्षि‍क वि‍वरण दाखि‍ल न करने पर पी आर बी अधि‍नि‍यम के अंतर्गत दंडात्‍मक कार्रवाई की जा सकती है ।
(टि‍प्‍पणी: प्रेस पंजीयक को हर वर्ष देश में समाचार पत्रों की स्‍थि‍ति‍ के बारे में एक रि‍पोर्ट सरकार को देनी
होती है ,जो प्राय: प्रकाशकों से प्राप्‍त वार्षि‍क वि‍वरण के आधार पर होती है । इसलि‍ए ,समाचार पत्र प्रकाशक,कृपया प्रपत्र ।। में अपने वार्षि‍क वि‍वरण की सम्‍पूर्ण व सही‑सही जानकारी दें (देखें नि‍यम 6(।) । दैनि‍क समाचारपत्रों द्वारा परि‍शि‍ष्‍ट‑VIII में दि‍ए अनुसार एक वि‍वरण भी देना होगा । )
4.3 स्‍वामि‍त्‍व वि‍वरण
4.3.1 प्रत्‍येक वर्ष फरवरी के अंति‍म दि‍न के बाद नि‍कलने वाले प्रथम अंक में समाचार पत्र के
स्‍वामि‍त्‍व तथा अन्‍य सम्‍बन्‍धि‍त वि‍वरण प्रकाशि‍त कि‍या जाना चाहि‍ए । वि‍वरण समाचार पत्र पंजीकरण(केन्‍द्रीय)नि‍यम,1956 की अनुसूची में दि‍ए गए प्रपत्र IV में देना होगा(देखें नि‍यम 8) ।
4.5 क्‍या आपने अखबारी कागज आयात कि‍या है ? रि‍टर्न भरि‍ए !!!
4.5.1 समाचार पत्र के प्रकाशक/स्‍वामी को 30 सि‍तम्‍बर को समाप्‍त छमाही की
अर्ध‑वार्षि‍क रि‍टर्न और 31 मार्च को समाप्‍त वर्ष की वार्षि‍क रि‍टर्न क्रमश: 31 अक्‍टूबर और 30 अप्रैल तक भेजनी होगी, जि‍समें सम्‍बद्व अवधि‍यों में खरीदी तथा उपयोग की गई आयाति‍त अखबारी कागज की मात्राएं दि‍खाई जाएंगी । छमाही रि‍पोर्ट प्रकाशक/स्‍वामी द्वारा और वार्षिक रि‍पोर्ट चार्टर्ड एकाउंटेंट द्वारा प्रमाणि‍त की जाएगी । रि‍टर्न का नमूना प्रपत्र परि‍शि‍ष्‍ट‑IX में दि‍या गया है ।
4.5.2 समय पर रि‍टर्न दाखि‍ल न करने या गलत जानकारी देने पर समाचार पत्र अखबारी कागज के
आयात के लि‍ए, पंजीयन प्रमाणपत्र के प्रमाणीकरण के लि‍ए अयोग्‍य हो जाएगा ।

जरूरी दस्‍तावेज इस प्रकार हैं :
(क) वर्ष‑‑‑‑‑‑‑‑के लि‍ए वार्षिक वि‍वरण की एक फोटोस्‍टेट प्रति‍ । दैनि‍क समाचारपत्रों के
प्रकाशक परि‍शि‍ष्‍ट VIII में नि‍र्धारि‍त प्रपत्र पर दैनि‍क प्रेस का वि‍वरण भी भेज सकते हैं ।
(ख) दैनि‍कों के मामलों में दि‍नांक ‑‑‑‑‑‑‑‑के लि‍ए कैलेंडर वर्ष ‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑के प्रत्‍येक
महीने के सात‑सात अंक और अन्‍य नि‍यतकालि‍क पत्रों के मामलें में सभी अकों का एक सैट । नवीनतम अंक की एक प्रति‍ भी भेजी जानी चाहि‍ए ।
(ग) मुद्रण मशीनों का वि‍वरण अर्थात् प्रत्‍येक मशीन का मेक,साइज,प्रति‍ घंटा गति आदि‍,मुद्रण
सारणी(पृष्‍ठवार) तथा अन्‍य मुद्रण कार्यों का वि‍वरण ,यदि‍ हो तो, साथ ही प्रिंट आर्डरों,मुद्रण प्रभार के बि‍लों और ‑‑‑‑‑‑‑‑महीने के लि‍ए भुगतान के प्रमाण स्‍वरूप प्राप्‍तकर्ता की रसीदों की फोटोस्‍टेट प्रति‍यां ।
(घ) अखबारी कागज का वि‍वरण जि‍समें प्रथम दि‍वस का प्रारंभि‍क अधि‍शेष,वर्ष‑‑‑‑‑‑के
दौरान खरीदी मात्रा, वर्ष के दौरान कुल खपत तथा आलोच्‍य वर्ष के अंति‍म दि‍न
का अंति‍म अधि‍शेष ।
(ड.) आलोच्‍य वर्ष के लि‍ए कागज खरीदने के बि‍लों की फोटोस्‍टेट प्रति‍यां तथा साथ ही
भुगतान के प्रमाण स्‍वरूप प्राप्‍तकर्ता की रसीदों की प्रति‍यां ।
(च) आपूर्ति स्‍त्रोत से प्रकाशन स्‍थान तक अखबारी कागज की ढुलाई से सम्‍बन्‍धि‍त बि‍लों की
फोटोस्‍टेट प्रति‍यां ।
(छ) एजेंट/हॉकर का नाम, स्‍टेशन,प्रेषि‍त प्रति‍यों की संख्‍या,प्रेषण माध्‍यम अर्थात् रेल,सड़क,डाक आदि‍,
प्राप्‍त भुगतान ,की प्रति‍यों के वि‍तरण का ब्‍यौरा देने वाला एक वि‍वरण जि‍सके साथ‑‑‑‑‑‑महीने के लि‍ए एजेंसी बि‍लों,एजेंटों/हॉकरों को जारी भुगतान रसीदों,प्रेषण रसीदों आदि‍ की फोटोस्‍टेट प्रति‍यां 1
(ज) कैलेंडर वर्ष ‑‑‑‑‑‑‑के लि‍ए लाभ‑हानि‍ खाता । यदि‍ लाभ‑हानि‍ खाता वि‍त्‍तीय वर्ष आधार पर
बनाया गया है, तो जनवरी से दि‍सम्‍बर‑‑‑‑‑‑‑तक माह‑वार बि‍क्री आय की प्रति‍यां प्रस्‍तुत की जानी चाहि‍ए, जि‍समें बेची गई प्रति‍यों की माह‑वार बि‍ल राशि‍ का उल्‍लेख हो ।
(झ) स्‍वामी की स्‍थायी आयकर संख्‍या, यदि‍ हो तो, लि‍खें ।
टि‍प्‍पणी: कृपया ध्‍यान दें कि‍ दस्‍तावेजों की प्रति‍यां और उनकी फोटोस्‍टेट प्रति‍ राजपत्रि‍त अधि‍कारी द्वारा
सत्‍यापि‍त कराके भेजी जाएंगी, यदि‍ असत्‍यापि‍त प्रति‍यां प्राप्‍त होती हैं, तो उन पर वि‍चार नहीं कि‍या जाएगा यही नियम है.

कभी भी कोई जानकारी इसके अलावा चाहिए तब आप मुझे इस नम्बर +919808123436 पर कॉल या व्हाटसऐप करके जानकारी हासिल कर सकते हैं...!
आपको ये जानकारी कैसी लगी हमको ज़रूर बतायें
धन्यवाद...!

Wednesday, 30 September 2020

देश मैं बलात्कार के बाद होने वाली मेडिकल जांच भी पीड़ित को शर्मशार करती है...?

"एस एम फ़रीद भारतीय"
रेप के 20 साल बाद मेडिकल होना बताता है कि यातनाएं झेलना तो पीड़िता की नियति मैं शामिल हो चुका है.

इस बारे मैं सबसे पहले हम बात करते हैं विनता नंदा की जिनके साथ आलोक नाथ ने 20 साल पहले कथित रूप से बलात्कार किया था. मामला भले ही पुराना हो लेकिन उन्हें किसी भी सूरत में बख्शा नहीं गया. बलात्कार कल होता तब भी मेडिकल टेस्ट होता, 20 साल पहले हुआ, तब भी होगा.

विनता नंदा आज एक सफल राइटर और प्रोड्यूसर हैं, वो सशक्त हैं और हिम्मती भी, लेकिन ऐसा नहीं है कि उनके इतना हिम्मती होने से यातनाएं उनके हिस्से नहीं आएंगी, सच तो ये है कि हमारे देश का सिस्टम इतना लचर है कि रेप पीड़िता की नियति बन जाता है, हर कदम पर यातनाएं झेलना, विनता भी झेल रही हैं, चूंकि रेप हुआ है तो 20 साल के बाद भी उन्हें अपना मेडिकल टेस्ट कराना होगा, तभी तो मामला आगे बढ़ेगा.

Me too आंदोलन के तहत तनुश्री दत्ता के बाद अगर किसी महिला का मामला सबसे ज्यादा चर्चित हुआ, तो वो हैं राइटर और प्रोड्यूसर विनता नंदा, विनता का मामला इसलिए भी चर्चित था क्योंकि ये मामला 20 साल पुराना था और टीवी के सबसे संस्कारी कहे जाने वाले शख्स आलोक नाथ के खिलाफ था.

20 साल पहले भी विनता यही सब झेल रही होतीं जो आज झेल रही हैं, ये तो शुरुआत है, अभी तो कोर्ट की फजीहत अलग बात है, विनता नंदा कहती हैं कि ' मैं एक पढ़ी-लिखी, आजाद और सशक्त महिला हूं, लेकिन मेरे साथ जो कुछ भी हुआ वो शायद उन महिलाओं की तुलना में बहुत कम होगा जो सशक्त नहीं हैं और आवाज नहीं उठा पातीं, वो तो इससे कहीं ज्यादा बुरा होता होगा.

सच ही कहा था ये विनता ने, और वो ये सब झेलने के लिए तैयार थीं, लेकिन उन महिलाओं के साथ क्या होता होगा जो उतनी मजबूत स्थिति में नहीं हैं, खैर, हम सब जानते हैं, पर अब सवाल ये है कि पुलिसिया कार्रवाई क्या रूप लेने जा रही है, और जब मेडिकल में कुछ नहीं मिलेगा, तो क्या विनता नंदा का केस खारिज हो जाएगा. इतनी हिम्मत के बाद जो सच विनता पूरी दुनिया के सामने लाईं क्या उसका अस्तित्व एक मेडिकल टेस्ट पर आधारित है? 

ये बातें साबित करती हैं कि रेप के मामले में हमारा समाज जितना असंवेदनशील है उससे भी कहीं ज़्यादा सुस्त हमारा कानून और हमारी कानून व्यवस्था भी है.

विनता नंदा के साथ आलोकनाथ ने 20 साल पहले दुष्कर्म किया था, बहुत हिम्मत लगी होगी विनता को जब उन्होंने फेसबुक पर ये बताया कि उनके साथ बलात्कार किया गया था, और उससे भी ज्यादा हिम्मत तब लगी जब उन्होंने आलोकनाथ के खिलाफ पुलिस में शिकायत की थी, हालांकि ये हिम्मत वो उस वक्त नहीं जुटा सकी थीं जब उनके साथ ये सब हुआ था, यानी 20 साल पहले, लेकिन जब अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का मन विनता ने बना लिया तो ये बात वहीं तय हो गई थी कि अब वो सबकुछ सहने के लिए तैयार हैं, वही सबकुछ जो बलात्कार सहने वाली हर महिला झेलती है.

विनता का मामला भले ही 20 साल पुराना हो, लेकिन उन्हें किसी भी सूरत में बख्शा नहीं गया, बलात्कार कल होता तब भी मेडिकल टेस्ट होता, 20 साल पहले हुआ, तब भी होगा, हालांकि ये टेस्ट अगर रेप के 72 घंटो के भीतर हो तो ही काम का होता है, ज्यादा से ज्यादा एक सप्ताह, लेकिन एक सप्ताह बाद ये टेस्ट किसी काम का नहीं रहता, लेकिन पुलिस की कार्रवाई आगे तभी बढ़ेगी जब मेडिकल करवाया जाएगा, सोचने वाली बात तो ये है कि मेडिकल में आखिर मिलेगा क्या, ये रटे रटाए सरकारी डायलॉग बोलकर पुलिस अगर खुद को प्रक्रिया के मुताबिक काम करते दिखाना चाहती है तब पुलिस को ये भी समझना होगा कि वो ये कहकर अपनी फ़जीहत खुद कराती रही है.

आपको बता दें कि, 8 अक्टूबर को विनता ने फेसबुक के जरिए रेप के बारे में दुनिया को बताया था और 19 अक्टूबर को पुलिस को, लेकिन पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की. रेप के मामले में शायद पुलिस जरूरत से ज्यदा सोचती है, इसलिए तुरंत एफआईआर कभी नहीं करती, शिकायत के लगभग एक महीने के बाद पुलिस ने कहा कि वो FIR दर्ज करेंगे, और 21 नवंबर को ओशीवारा पुलिस ने आलोकनाथ के खिलाफ बलात्कार की FIR दर्ज की, लेकिन मेडिकल कराए बिना केस आगे नहीं बढ़ सकता.

वहीं श्रंखला पांडेय 16 दिसंबर 2017 के साथ रेप के बाद की मेडिकल जांच से भी पीड़िता को शर्मशार किया जाता है। मध्य प्रदेश में 18 वर्षीय दलित महिला का अपहरण और बलात्कार किया गया। इस मामले में स्वास्थ्य पेशेवर ने पीड़िता पर दोष मढ़ा जिससे उसे और भी नुकसान पहुंचा। बेटी की मेडिकल जांच के दौरान उसके साथ कमरे में मौजूद उसकी मां ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि डॉक्टर ने कहा कि उसकी बेटी झूठ बोल रही है और सेक्स सहमति से हुआ है। डॉक्टर ने मेरी बेटी से कहा "यदि वे आप के साथ जबरदस्ती करते, तो आपके शरीर पर निशान होना चाहिए था, लेकिन आपके शरीर पर ऐसा कुछ नहीं है। आपने जरूर अपनी इच्छा से ऐसा किया होगा।" जांच के बाद मेरी बेटी और ज्यादा डर गई। बलात्कार के बाद पीड़िताओं को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं में कमी पाई गई। ये एक चिंता का विषय है कि जहां बलात्कार के बाद पीड़िता को कानून व स्वास्थ्य सेवाएं मिलनी चाहिए हमारे यहां उन्हें इसके लिए दर दर भटकना पड़ता है.

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में, ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि यौन हमले की पीड़िताओं की जांच करने वाले डॉक्टर उन्हें जाँच के बारे में पर्याप्त जानकारी देने में नाकाम रहे और उनके साथ डॉक्टरों के व्यवहार में संवेदनशीलता की कमी थी। 2014 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने पीड़िताओं के लिए चिकित्सीय-कानूनी सेवा हेतु दिशानिर्देश जारी किए जिससे कि स्वास्थ्य सेवा, जांच और इलाज को मानकीकृत किया जा सके। 

वहीं टू फिंगर टेस्ट पर लगी रोक भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बलात्कार पीड़ितों के संग व्यवहार करने के नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मंत्रालय ने टू फिंगर टेस्ट पर भी रोक लगाई है। नए दिशा-निर्देशों के तहत सभी अस्पतालों में बलात्कार पीड़ितों के लिए एक विशेष कक्ष बनाने के लिए कहा गया है जिसमें उनका फॉरेसिंक और चिकित्सकीय परीक्षण होगा। ये भी पढ़ें: इस स्केच ने बच्ची के साथ बलात्कार करने वाले को पहुंचाया जेल अर्चना सिंह बताती हैं, “बलात्कार के बाद होने वाले मेडिकल जांच में संवेदनशीलता बरती जाए इसके लिए अस्पतालों में नोडल ऑफिसर बनाए जाते हैं जिन्हें पूरी ट्रेनिंग दी जाती है कि वो इस दौरान संवदेनशीलता रखें.

लेकिन कई बार ऐसी शिकायतें आती हैं कि अस्पताल में पीड़िता व उसके परिवार के साथ गलत व्यवहार होता है।” ये एक अच्छी बात है कि टू फिंगर टेस्ट पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है ये बहुत ही शर्मनाक व गंदा तरीका था जांच का जो पीड़िता को शारीरिक व मानसिक दोनों रूप से कमजोर करता है, एक पीड़िता ने बताया, बलात्कार के बाद जब मेडिकल जांच के लिए ले गए तो वहां मुझे बहुत डर लग रहा था, उन्होंने इस तरह से बात की जैसे मैं झूठ बोल रही हूं, मुझे लगा था कि महिला डॉक्टर टेस्ट करेगीं लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। टेस्ट के दौरान जो पीड़ा होती है वो भी बलात्कार के दर्द को ताजा करने वाली थी.

 शर्म, तकलीफ और डर ये कोई नहीं समझ सकता जो मैंने झेला है, किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के क्वीन मेरी की स्त्रीरोग विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ अंजू अग्रवाल बताती हैं, “जब तक पुलिस केस नहीं होता डॉक्टर जांच नहीं कर सकता, उसके लिए अलग से दिशा निर्देश होते हैं जिसका पालन डॉक्टर करता है, इसके दौरान महिला पुलिस भी उपस्थित होती हैं,” मेडिकल जांच के नियमों में भी हुए बदलाव, अलग अलग राज्यों में अलग नियम कई राज्यों के अपने दिशानिर्देश हैं, लेकिन वे अक्सर पुराने होते हैं और 2014 के केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों जैसे विस्तृत और संवेदनशील नहीं होते हैं, इनमें ऐसी प्रक्रियाएं और चिकित्सा जांचें भी हैं जिनकी जरूरत नहीं होती.

उदाहरण के लिए, राजस्थान के अस्पतालों में इस्तेमाल किए जाने वाले मानक फॉर्म में एक ऐसा कॉलम अभी भी है जो योनिच्छद (हैमेन) की स्थिति के बारे में जानकारी मांगता है और डॉक्टर इसे भरने के लिए फिंगर टेस्ट करते हैं, जयपुर के एक अस्पताल में फॉरेंसिक साक्ष्य विभाग के एक मेडिकल कानूनविद ने कहा, "ये फॉर्म्स मेरे जन्म से पहले के हैं जो अभी तक वैसे के वैसे ही हैं.

हरियाणा राज्य सरकार ने 2014 के बेहतर दिशानिर्देशों से पहले 2012 में अपनी चिकित्सीय-कानूनी नियमावली जारी की थी, मगर अस्पताल हमेशा उन प्रोटोकॉल्स का पालन नहीं करते हैं, कोई भी डॉक्टर कर सकता है टेस्ट 1997 में कानून बनाया गया था कि सिर्फ महिला डॉक्टर ही बलात्कार के मामलों में मेडिकल जांच कर सकती है.

लेकिन महिला डॉक्टरों की कमी को देखते हुए 2005 में फिर से कानून में संशोधन हुआ, अब किसी भी लिंग और किसी भी विषय का रजिस्टर्ड मेडिकल डॉक्टर इस तरह की जांच कर सकता है, हालांकि इसके लिए पीड़ित की अनुमति जरूरी है, इस तरह के बदलावों ने इतनी संवेदनशील जांच के लिए ज्यादा डॉक्टर उपलब्ध करा दिए हैं, लेकिन उनमें से बहुतों के पास योग्यता ही नहीं है.

पीड़ित मनीषा या मनीषा के परिवार को बारे मैं बात करें तो ये बहुत ही दुखद है, अभी पीड़ित के परिवार को उसकी मौत के बाद भी इंसाफ़ नहीं मिल पाया है, जबकि पुलिस की कार्यवाही पीड़ित पर ज़ुल्म करने वालों के हौंसलों को नई उड़ान देने वाली है, यही वजह है बलात्कार करने वाले कानून से डरने के बजाये कानून को ठेंगा दिखाते हैं, जिसे बदलना ज़रूरी है...!

Sunday, 16 August 2020

चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मन के लिए फिर एक वीर शहीद अब्दुल हमीद पैदा करना होगा...?


"एस एम फ़रीद भारतीय"
जब देश भर में कल 74वां मनाया गया, कहते हैं अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुए देश को 73 साल पूरे हो गए, ऐसे में अब हम आपको एक ऐसे हीरो के बारे में बताते हैं, जिन्होंने केवल अपनी एक जीप से दुश्मन पाकिस्तान के 7 खतरनाक टैंकों के परखच्चे उड़ा दिए थे, जी हां दोस्तों, सही पढ़ रहे हैं आप, एक नहीं बल्कि पूरे सात टैंक, वो भी सिर्फ़ एक जीप से, यह कारनामा करने वाला कोई और नहीं बल्कि, परमवीर चक्र विजेता वीर शहीद अब्दुल हमीद मसऊदी (अब्दुल हमीद) थे, वीर शहीद अब्दुल हमीद के शौर्य और साहस ने उस समय पाकिस्तान की सेना में खलबली मचा दी थी, दुश्मन ने तब खुलकर कहा था कि लोहे को लोहा ही काटता है, और सच में ये उनके पराक्रम का नतीजा ही था, जिसने हताश हो चुकी भारतीय सेना के अंदर एक नई जान फूंक दी थी और 1965 की जंग में महान भारत ने दुश्मन पाकिस्तान को धूल चटा दी थी.

ये साल 1965 की बात है, तब पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' की शुरुआत की थी, पाकिस्तान का मक़सद बिल्कुल साफ़ था कि हमें भारत को दो मोर्चों पर घेरना है, इस ऑपरेशन के तहत जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी सेना ने आतंकियों की घुसपैठ करानी शुरू कर दी और भारत को दूसरे मोर्चों पर घेरना शुरू कर दिया था,  इस दौरान भारत को खुफिया जानकारी मिली कि पाकिस्तान कश्मीर पर कब्जा करना चाहता है और इसके लिए उसने अपने 30 हजार जवानों को गुरिल्ला वार का ट्रेनिंग भी दी है.
 
तब पाकिस्तान ने 8 सितंबर 1965 को भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था, पाकिस्तानी सेना ने खेमकरण सेक्टर के उसल उताड़ गांव पर हमला कर दिया, पाकिस्तान की तैयारी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने भारत के खिलाफ अमेरिकन पैटन टैंकों को उतारा था, उस दौरान इन टैंकों को अपराजेय माना जाता था, यानि शुरू से ही अमेरिका ने पाकिस्तान को अपनी औलाद बनाकर रखा था, जबकि इसके जवाब में भारतीय जवानों के पास केवल थ्री नॉट थ्री रायफल और एलएमजी के साथ गन माउनटेड जीप हुआ करती थी.

तब की मिली जानकारियों के मुताबिक 8 सितंबर 1965 की सुबह अब्दुल हमीद की जीप चीमा गांव के बाहर गन्ने के खेतों से गुजर रही थी, जीप में अब्दुल हमीद ड्राइवर के बगल में बैठे थे, इस दौरान उन्हें दूर से आती टैंकों की आवाज सुनाई दी, कुछ देर बाद उन्हें टैंक भी दिखाई देने लगे, वीर अब्दुल हमीद ने तुरंत अपनी पोजिशन ली और अपनी रिकॉयलेस गन को टैंकों की तरफ सेट कर दिया, अब बस इंतजार था गन की रेंज में टैंकों के आने का, कुछ देर बाद जैसे ही रेंज में पाकिस्तानी टैंक आईं वैसे ही वीर अब्दुल हमीद की गन माउनटेड आरसीएल जीप ने आग उगलना शुरू कर दिया और देखते ही देखते पाकिस्तान के सात टैंकों के परखच्चे उड़ गए, वीर अब्दुल हमीद ने पाकिस्तान की आर्टिलरी को पूरी तरहां धवस्त कर दिया था.

गन्ने के खेत में पोजिशन लेने का अब्दुल हमीद को शुरुआती फायदा तो हुआ, लेकिन यह केवल कुछ समय के लिए था, इसके बाद पाकिस्तान की तरफ से वीर अब्दुल हमीद की गाड़ी पर जबरदस्त हमला शुरू हुआ, इस हमले में उनकी जीप पर सवार ड्राइवर की शहीद हो गये, लेकिन वीर सपूत हमीद ने हिम्मत नहीं हारी, वे लगातार लड़ते रहे और अपनी पोजीशन बदलते रहे, जबकि वीर अब्दुल हमीद हमले से काफी घायल हो चुके थे और लगातार लड़ने के कारण थकने भी लगे थे, लेकिन उन्होंने लड़ाई जारी रखी, क्यूंकि सवाल था मुल्क की हिफ़ाज़त का, इस बीच पाकिस्तानी टैंकों ने उनकी तरफ निशाना साधा और एक हमले में वीर अब्दुल हमीद की जीप के भी परखच्चे उड़ गए.

वीर अब्दुल हमीद की गन माउनटेड जीप द्वारा पैटन टैंकों को धवस्त करने की खबर ने दुनियाभर को हिला कर रख दिया था, यह घटना किसी अजूबे से कम नहीं थी, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि तब अमेरिका ने पाकिस्तान के पैटन टैंकों की दोबारा समीक्षा की थी.

आपको बता दें कि वीर शहीद अब्दुल हमीद 4 ग्रेनेडियर के सिपाही थे, और दुश्मन के ख़िलाफ़ 1965 की जंग में वीर अब्दुल हमीद ने अपनी जान की कुर्बानी दे दी थी, उनके इस ना भुलाने वाले साहस और बहादुरी के लिए वीर शहीद अब्दुल हमीद को 16 सितंबर 1965 को सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र दिया गया...!

मगर अफ़सोस आज उन्ही वीर सपूतों के वारिसों से मुल्क की वफ़ादारी के सबूत मांगे जा रहे है वो भी दुश्मन के बाप अमेरिका के इशारे पर, इससे साफ़ समझा जा सकता है कि अमेरिका की मंशा क्या है वो क्या चाहता है, कहते हैं जब अपने घर में दुश्मन हों तब बाहर वालों की ज़रूरत ही क्या है...!

Tuesday, 4 August 2020

प्रेस को हमेशा स्वतंत्रता के बावजूद मिलती आई हैं कई चुनौतियां क्यूं...?

पूरी दुनियां में अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस हर साल तीन मई को मनाया जाता है, प्रेस किसी भी समाज का आईना होता ये हमेशा कहा और सुना जाता ही नहीं माना भी जाता है, भारत जैसे महान लोकतांत्रिक देश में प्रेस की स्वतंत्रता देश की बुनियादी जरूरत रही है, आज भी हम प्रेस के माध्यम से देश और दुनिया में घटित होने वाली गतिविधियों से अवगत होकर अपना ज्ञान बढ़ाते हैं.

प्रेस की आजादी का मतलब है किसी भी व्यक्ति को अपनी राय कायम करने और सार्वजनिक तौर पर इसे जाहिर करने का पूरा अधिकार है, भारत में प्रेस की स्वतंत्रता भारतीय संविधान के अनुच्छेद−19 में भारतीयों को दिए गए अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार से सुनिश्चित होती है। विश्व स्तर पर प्रेस की आजादी को सम्मान देने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया, जिसे विश्व प्रेस दिवस के रूप में भी जाना जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन करना, प्रेस की स्वतंत्रता पर बाहरी तत्वों के हमले से बचाव करना एवं प्रेस की स्वतंत्रता के लिए शहीद हुए संवाददाताओं की यादों को सहेजना है। 

भारत में आजादी के आंदोलन में प्रेस की अहम् भूमिका रही थी। प्रेस ने तब बहुत ही जिम्मेदारी के साथ जनता की आवाज बुलंद की। इसीलिए यह माना और स्वीकार किया गया कि आजादी के आंदोलन में प्रेस की बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी जिसने बिना भय और लोभ लालच के अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया। महात्मा गाँधी से लेकर लोकमान्य तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी, लाला लाजपत राय, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, वियोगी हरि और डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे पत्रकारों का नाम हम आज भी बहुत ही सम्मान से लेते है। उन्होंने अपनी लेखनी के जरिये देशवासियों में आजादी के आंदोलन का जज़्बा पैदा किया था।

भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के साथ प्रेस को चौथा खंभा माना जाता है। प्रेस इनको जोड़ने का काम करती है। प्रेस की स्वतंत्रता के कारण ही कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को मजबूती के साथ आम अवाम की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का मौक़ा हासिल हुआ है। कभी-२ प्रेस पर तिल को ताड़ बनाने का आरोप लगाया जाता रहा है हालाँकि यह पूरी तरह सच नहीं, अधूरा सच है। 

आजादी के बाद प्रेस पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ गई थी जो आज भी है,भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनियां में  जनमत को जागृत करने का कार्य भी प्रेस ही करती आई है, यूं कहा जाये कि सोये हुए को जगाने का काम भी यही प्रेस करती आई है, और छोटे बड़े राजनीतिक दलों और नेताओं को राह दिखाने का काम भी हम प्रेस वालों को ही करना पड़ता है, आम आदमी को रोटी कपड़ा और मकान की बुनियादी सुविधाओं को दिलाने के काम में भी प्रेस की भूमिका हमेशा अहम रही है, वहीं भ्रष्टाचार से लड़ने का काम भी प्रेस ने बखूबी अंजाम दिया है। 

और सत्ता की नाराजगी का दंश भी हमेशा ही मीडिया को झेलना पड़ा है, इसकी सबसे बड़ी मिसाल 1975 में आम आवाम के हक की लड़ाई लड़ने वाले विपक्ष का समर्थन करने पर आपातकाल के नाम पर मीडिया का गला घोंट दिया गया था, तब सेंसरशिप का सामना भारतीय प्रेस को करना पड़ा था, अनेक अख़बारों पर सरकारी छापे पड़े, विज्ञापन रोक दिये गए, बहुत से अखबार जु़ल्म ज़्यादती के शिकार होकर अकाल मौत के शिकार हो गए, तब हमारे बहुत से वरिष्ठ पत्रकारों को जेलों में भी डाला गया, इसके बावजूद भारत की प्रेस कतई घबराई नहीं बल्कि इस आपदा का डटकर मुकाबला किया, ये सब इतिहास के काले पन्नों में सुनहरी शब्दों में दर्ज है, यह प्रेस की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने का ही फल था की एक सरकार का लोकतान्त्रिक तरीके से शांति के साथ तख्ता पलट भी हुआ था.

लेकिन आज समाज के आपसी रिश्तों के संयम के साथ वही संयम मीडिया को भी अपने संवाद में रखना होगा, इससे मीडिया के प्रति समाज में आदर और सम्मान बढ़ेगा और बड़ी से बड़ी ताकत भी मीडिया की आजादी को कुचल नहीं पाएगी, भारतीय संविधान और लोकतंत्र ने मीडिया को स्वतंत्रता दी है, इसलिए पत्रकारों को स्वतंत्रता और सुरक्षा मिलनी ही चाहिए, इसकी आवाज़ हमेशा उठती रही है, क्यूंकि प्रेस को खतरा दरअसल मीडिया घराने के मालिकों से नहीं है, बल्कि उन शक्तियों से है जो ज्यादा से ज्यादा पैसा जल्द बनाना चाहती हैं.

तब ऐसे में मीडिया को उच्च मानदंड और आदर्शों पर काम करना होगा ताकि कोई भी उस पर उंगलियां न उठा सके, क्योंकि एक पत्रकार सिर्फ खबरों को बताने वाला नहीं है बल्कि वह एक बुद्धिजीवी और सामाजिक प्राणी भी होता है, मीडिया जितना स्वतंत्र होगा, सरकारी कामकाज उतने पारदर्शी होंगे, ये भी सरकारों के साथ देश की आम जनता को नहीं भूलना चाहिए, तभी सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकारों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, मसलन पिछले तीन दशकों में दलित और महिला अधिकारों के प्रति मीडिया ने बड़ा कार्य किया था, बीते चुनावों में मीडिया की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है, सोशल मीडिया का दखल और इसका प्रयोग जिस तरह बढ़ रहा है, उसका लाभ भी पत्रकारिता को मिलेगा.

 आज मीडिया का प्रभाव काफी बढ़ गया है, कहा जाता है कि भारत के मीडिया पर पूंजीपतियों का आधिपत्य है जिसके कारण वह स्वतंत्र होकर कुछ भी लिखने को तैयार नहीं है, अब मीडिया केवल प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक तक सीमित होकर नहीं रहा, ना ही सरकार और पैसे वालों का उतना कब्जा है, वजह सोशल मीडिया ने जनमानस का विश्वास जीतने में सफलता हासिल कर ली है, अब मीडिया चंद हाथों में सीमित होकर नहीं रह गया है और न ही दारू और पैसे में बिकने वाला है, दरअसल इंटरनेट के विस्तार के बाद सोशल मीडिया का जबरदस्त प्रभाव देखने को मिला है अब कोई ख़बर दबाई नहीं जा सकती, सोशल मीडिया के कारण वह लोगों तक तुरंत पहुँच जाती है, हालांकि यह भी कड़वा सच है कि कुछ चालाक और धूर्त लोगों ने सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाकर मीडिया का दुरूपयोग भी शुरू कर दिया है.

वहीं आज सोशल मीडिया ने घर घर में पत्रकार खड़े कर दिए हैं जो पलक झपकते ही आप तक समाज में घटने वाली घटना ज्यों की त्यों परोस देता हैं, वह भी बिना लाग लपेट के, इसके अनेक खतरे भी उत्पन्न हो गए हैं जिससे समाज को लाभ कम और हानि अधिक होने की संभावनाऐं भी व्यक्त की जाने लगी हैं, देश दुनियां में मीडिया के बेहतर फैलाव के बाद यह महसूस किया जा रहा है कि प्रेस की आजादी को कायम रखा जाये मगर साथ ही जिम्मेदारी की भावनाओं का भी निर्वहन किया जाये, समाज के कमजोर और पिछड़े तबक़े तक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाया जाये.

साथ ही साम्प्रदायिकता और छद्म साम्प्रदायिकता की सच्चाई से लोगों को अवगत कराया जाये, समाज के कमजोर और पिछड़े वर्गों तक सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाया जाये। प्रेस की आजादी का मतलब हमारे सामाजिक नव निर्माण से है। प्रेस को अपनी स्वतंत्रता कायम रखते हुए समाज के जन जागरण में अपनी भूमिका तलाशनी होगी। प्रेस की चुनौतियां व्यापक हैं जिसे चंद शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि समाज में गैर बराबरी पर हमला बोल कर समता और न्याय का मार्ग प्रशस्त हो सके इसमें प्रेस के साथ हम सब की भलाई निहित है।
लेखक- बाल मुकुन्द ओझा
सम्पादित- एस एम फ़रीद भारतीय
सम्पादक एनबीटीवी इंडिया डॉट इन

भारतीय मीडिया का इतिहास कैसे और कब बदला एक नज़र...?

सम्पादित- एस एम फ़रीद भारतीय
भारत के संचार माध्यम (मीडिया) के अन्तर्गत टेलीविजन, रेडियो, सिनेमा, समाचार पत्र, पत्रिकाएँ, तथा अन्तरजालीय पृष्ट आदि हैं। अधिकांश मीडिया निजी हाथों में है और बड़ी-बड़ी कम्पनियों द्वारा नियंत्रित है। भारत में 70,000 से अधिक समाचार पत्र हैं, 690 उपग्रह चैनेल हैं (जिनमें से 80 समाचार चैनेल हैं)। आज भारत विश्व का सबसे बड़ा समाचार पत्र का ही नहीं इसके ज़रिये कमाई का बाजार भी है।

भारत में प्रकाशित प्रमुख दैनिक समाचार पत्र
हिंदी दैनिक...!
दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला, पत्रिका, प्रभात खबर, नव भारत टाइम्स, हरि भूमि, पंजाब केसरी, गोंड़वाना समय, नईदुनिया और
भारत मीडिया.

प्रमुख अंग्रेजी दैनिक...!
टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, दा हिन्दू, मुंबई मिरर, तार, नवभारत टाइम्स, मिड डे, द ट्रिब्यून, डेक्कन हेराल्ड, डेक्कन क्रॉनिकल और गोंड़वाना टाइम्स.

कुछ क्षेत्रीय दैनिक समाचार पत्र...!
मलाला मनोरमा (मलयालम), डेली थंथी (तमिल), मातृभूमि (मलयालम), लोकमत (मराठी), गोंड़वाना समय (गोंडी), आनंदबाजार पत्रिका (बंगाली), एनाडु (तेलगु), गुजरात का समाचार (गुजराती), सकाल (मराठी), संदेश (गुजराती), साक्षी (मराठी), दैनिक समाचार भारत मीडिया ( हिंदी )

भारत में प्रकाशित कुछ प्रमुख हिंदी पत्रिकाएं...!
प्रतियोगिता दर्पण, इंडिया टुडे, सरस सैलिल, समया ज्ञान दर्पण, गृहशोभा, जागरण जोश प्लस, क्रिकेट सम्राट, आदिवासी जनसत्ता एवं आदिवासी विजन, हीरा क्रिकेट, आज, मेरी सहेली, सरिता, समृद्ध झारखण्ड आदि.

अंग्रेजी की प्रमुख पत्रिकाएं...!
इंडिया टुडे, प्रतियोगिता दर्पण, सामान्य ज्ञान आज, स्पोर्टस्टार, प्रतियोगिता सफलता की समीक्षा, आउटलुक, रीडर्स डाइजेस्ट, फिल्मफेयर, हीरा क्रिकेट आज व फेमिना आदि.

कुछ प्रमुख क्षेत्रीय पत्रिकाएं...!
वनिता (मलयालम), मथुरुभूमि अरोग्य मास्का (मलयालम), मनोरमा ठोज़लिवेदी (मलयालम), कुमूदम (तमिल), कर्मसंगठन (बंगाली), मनोरमा थोजिलवार्थ (मलयालम), गृल्हाक्ष्मी (मलयालम), मलयालम मनोरमा (मलयालम), कुंगुमम (तमिल), कर्मक्षेत्र (बंगाली), लोक संवेदना दस्तक एवं आदिवासी विजन आदि.

भारत में मीडिया का विकास तीन चरणों में हुआ। पहले दौर की नींव उन्नीसवीं सदी में उस समय पड़ी जब औपनिवेशिक आधुनिकता के संसर्ग और औपनिवेशिक हुकूमत के ख़िलाफ़ असंतोष की अंतर्विरोधी छाया में हमारे सार्वजनिक जीवन की रूपरेखा बन रही थी। इस प्रक्रिया के तहत मीडिया दो ध्रुवों में बँट गया। उसका एक हिस्सा औपनिवेशिक शासन का समर्थक निकला, और दूसरे हिस्से ने स्वतंत्रता का झण्डा बुलंद करने वालों का साथ दिया। राष्ट्रवाद बनाम उपनिवेशवाद का यह दौर 1947 तक चलता रहा। 

इस बीच अंग्रेज़ी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं में पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन की समृद्ध परम्परा पड़ी और अंग्रेज़ों के नियंत्रण में रेडियो-प्रसारण की शुरुआत हुई। दूसरा दौर आज़ादी मिलने के साथ प्रारम्भ हुआ और अस्सी के दशक तक चला। इस लम्बी अवधि में मीडिया के प्रसार और गुणवत्ता में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई। उसके विभिन्न रूप भारत को आधुनिक राष्ट्र-राज्य बनाने के लक्ष्य के इर्द-गिर्द गढ़ी गयी अखिल भारतीय सहमति को धरती पर उतारने की महा-परियोजना में भागीदारी करते हुए दिखाई पड़े।  इसी दौर में टीवी का आगमन हुआ। मुद्रित मीडिया मुख्यतः निजी क्षेत्र के हाथ में, और रेडियो-टीवी की लगाम सरकार के हाथ में रही।

नब्बे के दशक में भूमण्डलीकरण के आगमन के साथ तीसरे दौर की शुरुआत हुई जो आज तक जारी है। यह राष्ट्र-निर्माण और जन-राजनीति के प्रचलित मुहावरे में हुए आमूल-चूल परिवर्तन का समय था जिसके कारण मीडिया की शक्ल-सूरत और रुझानों में भारी तब्दीलियाँ आयीं। टीवी और रेडियो पर सरकारी जकड़ ढीली पड़ी।  निजी क्षेत्र में चौबीस घंटे चलने वाले उपग्रहीय टीवी चैनलों और एफ़एम रेडियो चैनलों का बहुत तेज़ी से प्रसार हुआ। बढ़ती हुई साक्षरता और निरंतर जारी आधुनिकीकरण के तहत भारतीय भाषाओं के मीडिया ने अंग्रेज़ी-मीडिया को प्रसार और लोकप्रियता में बहुत पीछे छोड़ दिया। मीडिया का कुल आकार अभूतपूर्व ढंग से बढ़ा। नयी मीडिया प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई। महज़ दस साल के भीतर-भीतर भारत में भी लगभग वही स्थिति बन गयी जिसे पश्चिम में ‘मीडियास्फ़ेयर’ 

पहला चरण- भारत में मीडिया के विकास के पहले चरण को तीन हिस्सों में बाँट कर समझा जा सकता है। पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी में ईसाई मिशनरी धार्मिक साहित्य का प्रकाशन करने के लिए भारत में प्रिंटिंग प्रेस ला चुके थे। भारत का पहला अख़बार बंगाल गज़ट भी 29 जनवरी 1780 को एक अंग्रेज़ जेम्स ऑगस्टस हिकी ने निकाला। चूँकि हिकी इस साप्ताहिक के ज़रिये भारत में ब्रिटिश समुदाय के अंतर्विरोधों को कटाक्ष भरी भाषा में व्यक्त करते थे, इसलिए जल्दी ही उन्हें गिरफ्तातार कर लिया गया और दो साल में अख़बार का प्रकाशन बंद हो गया।  हिकी के बाद किसी अंग्रेज़ ने औपनिवेशिक हितों पर चोट करने वाला प्रकाशन नहीं किया।

उन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक में कलकत्ता के पास श्रीरामपुर के मिशनरियों ने और तीसरे दशक में राजा राममोहन राय ने साप्ताहिक, मासिक और द्वैमासिक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ किया। पत्रकारिता के ज़रिये यह दो दृष्टिकोणों का टकराव था। श्रीरामपुर के मिशनरी भारतीय परम्परा को निम्नतर साबित करते हुए ईसाइयत की श्रेष्ठता स्थापित करना चाहते थे, जबकि राजा राममोहन राय की भूमिका हिंदू धर्म और भारतीय समाज के आंतरिक आलोचक की थी। वे परम्परा के उन रूपों की आलोचना कर रहे थे जो आधुनिकता के प्रति सहज नहीं थे। साथ में राजा राममोहन परम्परा के उपयोगी आयामों को ईसाई प्रेरणाओं से जोड़ कर एक नये धर्म की स्थापना की कोशिश में भी लगे थे। इस अवधि में मीडिया की सारवस्तु पर धार्मिक प्रश्नों और समाज सुधार के आग्रहों से संबंधित विश्लेषण और बहसें हावी रहीं।

समाज सुधार के प्रश्न पर व्यक्त होने वाला मीडिया का यह द्वि-ध्रुवीय चरित्र आगे चल कर औपनिवेशिक बनाम राष्ट्रीय के स्पष्ट विरोधाभास में विकसित हो गया और 1947 में सत्ता के हस्तांतरण तक कायम रहा।  तीस के दशक तक अंग्रेज़ी के ऐसे अख़बारों की संख्या बढ़ती रही जिनका उद्देश्य अंग्रेज़ों के शासन की तरफ़दारी करना था। इनका स्वामित्व भी अंग्रेज़ों के हाथ में ही था। 1861 में बम्बई के तीन अख़बारों का विलय करके टाइम्स ऑफ़ इण्डिया की स्थापना भी ब्रिटिश हितों की सेवा करने के लिए रॉबर्ट नाइट ने की थी। 1849 में गिरीश चंद्र घोष ने पहला बंगाल रिकॉर्डर नाम से ऐसा पहला अख़बार निकाला जिसका स्वामित्व भारतीय हाथों में था। 1853 में इसका नाम बदल कर 'हिंदू पैट्रियट' हो गया। 

हरिश्चंद्र मुखर्जी के पराक्रमी सम्पादन में निकलने वाले इस पत्र  ने विभिन्न प्रश्नों पर ब्रिटिश सरकार की कड़ी आलोचना की परम्परा का सूत्रपात किया। सदी के अंत तक एक तरफ़ तो उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय नेतृत्व का आधार बन चुका था, और दूसरी ओर स्वाधीनता की कामना का संचार करने के लिए सारे देश में विभिन्न भाषाओं में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन होने लगा था। भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता ब्रिटिश शासन को आड़े हाथों लेने में कतई नहीं चूकती थी।  इसी कारण 1878 में अंग्रेज़ों ने वरनाकुलर प्रेस एक्ट बनाया ताकि अपनी आलोचना करने वाले प्रेस का मुँह बंद कर सकें। इसका भारत और ब्रिटेन में जम कर विरोध हुआ। 

1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ जिसकी गतिविधियाँ उत्तरोत्तर मुखर राष्ट्रवाद की तरफ़ झुकती चली गयीं। भारतीय भाषाओं के प्रेस ने भी इसी रुझान के साथ ताल में ताल मिला कर अपना विकास किया। मीडिया के लिहाज़ से बीसवीं सदी को एक उल्लेखनीय विरासत मिली जिसके तहत तिलक, गोखले, दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, मदनमोहन मालवीय और रवींद्रनाथ ठाकुर के नेतृत्व में अख़बारों और पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा था। बीस के दशक में गाँधी के दिशा-निर्देश में कांग्रेस एक जनांदोलन में बदल गयी। स्वयं गाँधी ने राष्ट्रीय पत्रकारिता में तीन-तीन अख़बार निकाल कर योगदान दिया।

लेकिन इस विकासक्रम का एक दूसरा ध्रुव भी था। अगर इन राष्ट्रीय हस्तियों के नेतृत्व में मराठा, केसरी, बेंगाली, हरिजन, नवजीवन, यंग इण्डिया, अमृत बाज़ार पत्रिका, हिंदुस्तानी, एडवोकेट, ट्रिब्यून, अख़बार-ए-आम, साधना, प्रबासी, हिंदुस्तान रिव्यू, रिव्यू और अभ्युदय जैसे प्रकाशन उपनिवेशवाद विरोधी तर्कों और स्वाधीनता के विचार को अपना आधार बना रहे थे, तो कलकत्ता का स्टेट्समैन, बम्बई का टाइम्स ऑफ़ इण्डिया, मद्रास का मेल, लाहौर का सिविल ऐंड मिलिट्री गज़ट और इलाहाबाद का पायनियर खुले तौर पर अंग्रेज़ी शासन के गुण गाने में विश्वास करता था।

मीडिया-संस्कृति का यह द्विभाजन भाषाई आधार पर ही और आगे बढ़ा। राष्ट्रीय भावनाओं का पक्ष लेने वाले अंग्रेज़ी के अख़बारों की संख्या गिनी-चुनी ही रह गयी। अंग्रेज़ी के बाकी अख़बार अंग्रजों के पिट्ठू बन गये। भारतीय भाषाओं के अख़बारों ने खुल कर उपनिवेशवादविरोधी आवाज़ उठानी शुरू कर दी।  अंग्रेज़ समर्थक अख़बारों के पत्रकारों के वेतन और सुविधाओं का स्तर भारतीय भाषाओं के प्रकाशनों में कार्यरत पत्रकारों के वेतन आदि से बहुत अच्छा था। ब्रिटिश समर्थक अख़बारों को खूब विज्ञापन मिलते थे और उनके लिए संसाधनों की कोई कमी न थी।

वहीं उपनिवेशवाद विरोधी अख़बारों का पूँजी-आधार कमज़ोर था। बहरहाल, अंग्रेज़ी पत्रकारिता के महत्त्व को देखते हुए जल्दी ही मालवीय, मुहम्मद अली, ऐनी बेसेंट, मोतीलाल नेहरू आदि ने राष्ट्रवादी विचारों वाले अंग्रेज़ी अख़बारों (लीडर, कॉमरेड, मद्रास स्टेंडर्ड, न्यूज, इंडिपेंडेंट, सिंध ऑब्ज़र्वर) की शुरुआत की। दिल्ली से 1923 में कांग्रेस का समर्थन करने वाले भारतीय पूँजीपति घनश्याम दास बिड़ला ने द हिंदुस्तान टाइम्स का प्रकाशन शुरू किया। 1938 में जवाहरलाल नेहरू ने अंग्रेज़ी के राष्ट्रवादी अख़बार नैशनल हैरल्ड की स्थापना की। 

1826 में कलकत्ता से जुगल किशोर सुकुल ने उदंत मार्तण्ड नामक पहला हिंदी समाचार पत्र प्रकाशित किया था। हिंदी मीडिया ने अपनी दावेदारी बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में पेश की जब गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप , बालमुकुंद गुप्त और अम्बिका शरण वाजपेयी ने भारत मित्र , महेशचंद्र अग्रवाल ने विश्वमित्र और शिवप्रसाद गुप्त ने आज की स्थापना की। एक तरह से यह हिंदी-प्रेस की शुरुआत थी। इसी दौरान उर्दू-प्रेस की नींव पड़ी। अबुल कलाम आज़ाद ने अल-हिलाल और अल-बिलाग़ का प्रकाशन शुरू किया, मुहम्मद अली ने हमदर्द का। लखनऊ से हकीकत, लाहौर से प्रताप और मिलाप और दिल्ली से तेज़ का प्रकाशन होने लगा।  

बांग्ला में संध्या, नायक, बसुमती, हितबादी, नबशक्ति, आनंद बाज़ार पत्रिका, जुगांतर, कृषक और नबजुग जैसे प्रकाशन अपने-अपने दृष्टिकोणों से उपनिवेशवाद विरोधी अभियान में भागीदारी कर रहे थे। मराठी में इंदुप्रकाश, नवकाल, नवशक्ति और लोकमान्य ; गुजराती में गुजराती पंच, सेवक, गुजराती और समाचार , वंदेमातरम्; दक्षिण भारत में मलयाला मनोरमा, मातृभूमि, स्वराज, अल-अमीन, मलयाला राज्यम, देशाभिमानी, संयुक्त कर्नाटक, आंध्र पत्रिका, कल्कि, तंति, स्वदेशमित्रम्, देशभक्तम् और दिनामणि यही भूमिका निभा रहे थे।

यहाँ एक सवाल उठ सकता है कि यह राष्ट्रीय मीडिया किन मायनों में राष्ट्रीय था? इसमें कोई शक नहीं कि ये सभी पत्र-पत्रिकाएँ ब्रिटिश शासन की विरोधी थीं, लेकिन उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन की दशा और दिशा को लेकर उनके बीच वैसे ही मतभेद थे जैसे कांग्रेस और अन्य राजनीतिक शक्तियों के बीच दिखाई पड़ते थे। ब्रिटिश प्रशासन ने 1924 में मद्रास में एक शौकिया रेडियो क्लब बनाने की अनुमति दी। तीन साल बाद निजी क्षेत्र में ब्रॉडकास्ट कम्पनी ने बम्बई और कलकत्ता में नियमित रेडियो प्रसारण शुरू किया। लेकिन साथ में शौकिया रेडियो क्लब भी चलते रहे।  प्रेक्षकों की मान्यता है कि जिस तरह इन शौकिया क्लबों के कारण अंग्रेज़ों को रेडियो की बाकायदा स्थापना करनी पड़ी, कुछ-कुछ इसी तर्ज़ पर प्राइवेट केबिल ऑपरेटरों के कारण नब्बे के दशक में सरकार को टेलिविज़न का आंशिक निजीकरण करने की इजाज़त देनी पड़ी। 

बहरहाल, औपनिवेशिक सरकार ने 1930 में ब्रॉडकास्टिंग को अपने हाथ में ले लिया और 1936 में उसका नामकरण ‘आल इण्डिया रेडियो’ या ‘आकाशवाणी’ कर दिया गया।  हैदराबाद, त्रावणकोर, मैसूर, बड़ोदरा, त्रिवेंद्रम और औरंगाबाद जैसी देशी रियासतों में भी प्रसारण चालू हो गया। रेडियो पूरी तरह से अंग्रेज़ सरकार के प्रचारतंत्र का अंग था। सेंसरशिप, सलाहकार बोर्ड और विभागीय निगरानी जैसे संस्थागत नियंत्रक उपायों द्वारा अंग्रेज़ों ने यह सुनिश्चित किया कि उपनिवेशवाद विरोधी राजनीति के पक्ष में रेडियो से एक शब्द भी प्रसारित न होने पाये।  दिलचस्प बात यह है कि यह अंग्रेज़ी विरासत भारत के आज़ाद होने के बाद भी जारी रही। अंग्रेज़ों के बाद आकाशवाणी को भारत सरकार ने उस समय तक अपना ताबेदार बनाये रखा जब तक 1997 में आकाशवाणी एक स्वायत्त संगठन का अंग नहीं बन गयी।

दूसरा चरण- चूँकि भारतीय मीडिया के दोनों ध्रुवों ने उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष के पक्ष या विपक्ष में रह कर ही अपनी पहचान बनायी थी, इसलिए स्वाभाविक रूप से राजनीति उसका केंद्रीय सरोकार बनती चली गयी। 15 अगस्त 1947 को जैसे ही सत्ता का हस्तांतरण हुआ और अंग्रेज़ भारत से जाने के लिए अपना बोरिया-बिस्तर समेटने लगे, मीडिया और सरकार के संबंध बुनियादी तौर से बदल गये।  एक तरफ़ तो अंग्रेज़ों द्वारा लगायी गयी पाबंदियाँ प्रभावी नहीं रह गयीं, और दूसरी तरफ़ ब्रिटिश शासन की पैरोकारी करने वाले ज़्यादातर अख़बारों का स्वामित्व भारतीयों के हाथ में चल गया।  लेकिन इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण यह था कि मीडिया ने राजनीतिक नेतृत्व के साथ कंधे से कंधा मिला कर आधुनिक भारतीय राष्ट्र का निर्माण करना शुरू किया। मीडिया के विकास का यह दूसरा चरण अस्सी के दशक तक जारी रहा।  इस लम्बे दौर के चार उल्लेखनीय आयाम थे :

एक सुपरिभाषित ‘राष्ट्र-हित’ के आधार पर आधुनिक भारत के निर्माण में सचेत और सतर्क भागीदारी की परियोजना,
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कटौती करने की सरकारी कोशिशों के ख़िलाफ़ संघर्ष,
विविधता एवं प्रसार की ज़बरदस्त उपलब्धि के साथ-साथ भाषाई पत्रकारिता द्वारा अपने महत्त्व और श्रेष्ठता की स्थापना, और
प्रसारण-मीडिया की सरकारी नियंत्रण से एक सीमा तक मुक्ति।

स्वतंत्र भारत में सरकार को गिराने या बदनाम करने में प्रेस ने कोई रुचि नहीं दिखाई। लेकिन साथ ही वह सत्ता का ताबेदार बनने के लिए तैयार नहीं था। उसका रवैया रेडियो और टीवी से अलग तरह का था। रेडियो-प्रसारण करने वाली 'आकाशवाणी' पूरी तरह से सरकार के हाथ में थी। 1959 में ‘शिक्षात्मक उद्देश्यों’ से शुरू हुए टेलिविज़न (दूरदर्शन) की प्रोग्रामिंग की ज़िम्मेदारी भी रेडियो को थमा दी गयी थी। इसके विपरीत शुरू से ही निजी क्षेत्र के स्वामित्व में विकसित हुए प्रेस ने सरकार, सत्तारूढ़ कांग्रेस, विपक्षी दलों और अधिकारीतंत्र को बार-बार स्व-परिभाषित राष्ट्र-हित की कसौटी पर कस कर देखा। यह प्रक्रिया उसे व्यवस्था का अंग बन कर उसकी आंतरिक आलोचना करने वाली सतर्क एजेंसी की भूमिका में ले गयी। भारतीय मीडिया के कुछ अध्येताओं ने माना भी है कि अंग्रेज़ों के बाद सरकार को दिया गया प्रेस का समर्थन एक ‘सतर्क समर्थन’ ही था।

प्रेस ने ‘राष्ट्र-हित’ की एक सर्वमान्य परिभाषा तैयार की जिसे मनवाने के लिए न कोई मीटिंग की गयी और न ही कोई दस्तावेज़ पारित किया गया। पर इस बारे में कोई मतभेद नहीं था कि उदीयमान राष्ट्र-राज्य जिस ढाँचे के आधार पर खड़ा होगा, उसका चरित्र  लोकतांत्रिक और सेकुलर ही होना चाहिए। उसने यह भी मान लिया था कि ऐसा करने के लिए उत्पीड़ित सामाजिक तबकों और समुदायों का लगातार सबलीकरण अनिवार्य है। प्रेस-मालिक, प्रबंधक और प्रमुख पत्रकार अपने-अपने ढंग से यह भी मानते थे कि इस लक्ष्य को वेधने के लिए ग़रीबी को समृद्धि में बदलना पड़ेगा जिसका रास्ता वैकासिक अर्थशास्त्र और मिश्रित अर्थव्यवस्था से हो कर जाता है।  स्वतंत्र भारत की विदेश नीति (गुटनिरपेक्षता और अन्य देशों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व) के प्रति भी मीडिया ने सकारात्मक सहमति दर्ज करायी।

दूसरी तरफ़ सरकार ने अपनी तरफ़ से प्रेस के कामकाज को विनियमित करने के लिए एक संस्थागत ढाँचा बनाना शुरू कर दिया। 1952 और 1977 में दो प्रेस आयोग गठित किये गये। 1965 में एक संविधानगत संस्था प्रेस परिषद् की स्थापना हुई। 1956 में 'रजिस्ट्रेशन ऑफ़ बुक्स एक्ट' के तहत प्रेस रजिस्ट्रार ऑफ़ इण्डिया की स्थापना की गयी। इन उपायों में प्रेस की आज़ादी को सीमित करने के अंदेशे भी देखे जा सकते थे, पर प्रेस ने इन कदमों पर आपत्ति नहीं की। उसे यकीन था कि सरकार किसी भी परिस्थिति में संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी का उल्लंघन नहीं करेगी। संविधान में स्पष्ट उल्लेख न होने के बावजूद सर्वोच्च कोर्ट ने इस गारंटी में प्रेस की स्वतंत्रता को भी शामिल मान लिया था।

 लेकिन प्रेस का यह यकीन 1975 में टूट गया जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने अपने राजनीतिक संकट से उबरने के लिए देश पर आंतरिक आपातकाल थोप दिया। नतीजे के तौर पर नागरिक अधिकार मुल्तवी कर दिये गये, स्वतंत्र अभिव्यक्ति और प्रेस पर पाबंदियाँ लगा दी गयीं। 253 पत्रकार नज़रबंद किये गये, सात विदेशी संवाददाता निष्कासित कर दिये गये, सेंसरशिप थोपी गयी और प्रेस परिषद् भंग कर दी गयी। भारतीय प्रेस अपने ऊपर होने वाले इस आक्रमण का उतना विरोध नहीं कर पाया, जितना उसे करना चाहिए था। किन्तु कुछ ने सरकार के सामने घुटने टेक दिये, पर कुछ ने नुकसान सह कर भी आपातकाल की पाबंदियों का प्रतिरोध किया।

उन्नीस महीने बाद यह आपातकाल चुनाव की कसौटी पर पराजित हो गया, पर इस झटके के कारण पहली बार भारतीय प्रेस ने अपनी आज़ादी के लिए लड़ने की ज़रूरत महसूस की।  राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में हिस्सेदारी करने की उसकी भूमिका पहले से भी अधिक ‘सतर्क’ हो गयी। पत्रकारों की सतर्क निगाह ने देखा कि आपातकाल की पराजय के बाद भी राजनीतिक और सत्ता प्रतिष्ठान में प्रेस की स्वतंत्रता में कटौती करने की प्रवृत्ति ख़त्म नहीं हुई है।  इसके बाद अस्सी का दशक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए चलाये गये संघर्षों का दशक साबित हुआ।  1982 में बिहार प्रेस विधेयक और 1988 में लोकसभा द्वारा पारित किये गये मानहानि विधेयक को राजसत्ता पत्रकारों द्वारा किये गये आंदोलनों के कारण कानून में नहीं बदल पाये।  दूसरी तरफ़ इंदिरा गाँधी की सरकार द्वारा एक्सप्रेस समाचार-पत्र समूह को सताने के लिए चलाये गये अभियान से यह भी साफ़ हुआ कि किसी अख़बार द्वारा किये जा रहे विरोध को दबाने के लिए कानून बदलने के बजाय सत्ता का थोड़ा सा दुरुपयोग ही काफ़ी है।

आपातकाल के विरुद्ध चले लोकप्रिय संघर्ष के परिणामस्वरूप सारे देश में राजनीतीकरण की प्रक्रिया पहले के मुकाबले कहीं तेज़ हो गयी। लोकतंत्र और उसकी अनिवार्यता के प्रति नयी जागरूकता ने अख़बारों की तरफ़ नये पाठकों का ध्यान आकर्षित किया। ये नये पाठक निरंतर बढ़ती जा रही साक्षरता की देन थे। बढ़ती हुई प्रसार संख्याओं के फलस्वरूप मुद्रित मीडिया का दृष्टिकोण व्यावसायिक और बाज़ारोन्मुख  हुआ। राजनीतीकरण, साक्षरता और पेशेवराना दृष्टिकोण के साथ इसी समय एक सुखद संयोग के रूप में नयी प्रिंटिंग प्रौद्योगिकी जुड़ गयी। डेक्स-टॉप पब्लिशिंग सिस्टम और कम्प्यूटर आधारित डिज़ाइनिंग ने अख़बारों और पत्रिकाओं के प्रस्तुतीकरण में नया आकर्षण पैदा कर दिया। इस प्रक्रिया ने विज्ञापन से होने वाली आमदनी में बढ़ोतरी की। 

अस्सी के दशक के दौरान हुए इन परिवर्तनों में सबसे महत्त्वपूर्ण था भाषाई पत्रकारिता का विकास। हिंदी, पंजाबी, मराठी, गुजराती, बांग्ला, असमिया और दक्षिण भारतीय भाषाओं के अख़बारों को इस नयी परिस्थिति का सबसे ज़्यादा लाभ हुआ। अस्सी का दशक इन भाषाई क्षेत्रों में नये पत्रकारों के उदय का दशक भी था। इस विकासक्रम के बाद भाषाई पत्रकारिता ने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। नयी सदी में राष्ट्रीय पाठक सर्वेक्षण के आँकड़ों ने बताया कि अब अंग्रेज़ी प्रेस के हाथों में मीडिया की लगाम नहीं रह गयी है। सबसे अधिक प्रसार संख्या वाले पहले दस अख़बारों में अंग्रेज़ी का केवल एक ही पत्र रह गया, वह भी नीचे से दूसरे स्थान पर।

अस्सी के दशक में ही प्रसारण-मीडिया के लिए एक सीमा तक सरकारी नियंत्रण से मुक्त होने की परिस्थितियाँ बनीं। 1948 में संविधान सभा में बोलते हुए जवाहरलाल नेहरू ने वायदा किया था कि आज़ाद भारत में ब्रॉडकास्टिंग का ढाँचा ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (बीबीसी) के तर्ज़ पर होगा। यह आश्वासन पूरा करने में स्वतंत्र भारत की सरकारों को पूरे 42 साल लग गये। इसके पीछे रेडियो और टीवी को सरकार द्वारा निर्देशित राजनीतिक-सामाजिक परिवर्तन के लिए ही इस्तेमाल करने की नीति थी। इस नीति के प्रभाव में रेडियो का तो एक माध्यम के रूप में थोड़ा-बहुत विकास हुआ, पर टीवी आगे नहीं बढ़ पाया। 

मगर इतना ज़रूर हुआ कि 1975-76 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अमेरिका से एक उपग्रह उधार लिया ताकि देश के विभिन्न हिस्सों में 2,400 गाँवों में कार्यक्रमों का प्रसारण हो सके। इसे 'सेटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलिविज़न एक्सपेरीमेंट' (साइट) कहा गया। इसकी सफलता से विभिन्न भाषाओं में टीवी कार्यक्रमों के निर्माण और प्रसारण की सम्भावनाएँ खुलीं। फिर 1982 में दिल्ली एशियाड का प्रसारण करने के लिए रंगीन टीवी की शुरुआत हुई। इसके कारण टीवी के प्रसार की गति बढ़ी। 1990 तक उसके ट्रांसमीटरों की संख्या 519 और 1997 तक 900 हो गयी। 

बीबीसी जैसा स्वायत्त कॉरपोरेशन बनाने के संदर्भ में 1966 तक केवल इतनी प्रगति हो पायी कि भारत के पूर्व महालेखा नियंत्रक ए.के. चंदा के नेतृत्व में बनी कमेटी द्वारा आकाशवाणी और दूरदर्शन को दो स्वायत्त निगमों के रूप में गठित करने की सिफ़ारिश कर दी गयी। बारह साल तक यह सिफ़ारिश भी ठंडे बस्ते में पड़ी रही। 1978 में बी.जी. वर्गीज की अध्यक्षता में गठित किये गये एक कार्यदल ने 'आकाश भारती' नामक संस्था गठित करने का सुझाव दिया। साल भार बाद मई, 1979 में प्रसार भारती नामक कॉरपोरेशन बनाने का विधेयक संसद में लाया गया जिसके तहत आकाशवाणी और दूरदर्शन को काम करना था। प्रस्तावित कॉरपोरेशन के लिए वर्गीज कमेटी द्वारा सुझाये गये आकाश भारती के मुकाबले कम अधिकारों का प्रावधान किया गया था। जो भी हो, जनता पार्टी की सरकार गिर जाने के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो पाया।

1985 से 1988 के बीच दूरदर्शन को आज़ादी का एक हल्का सा झोंका नसीब हुआ। इसका श्रेय भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी भास्कर घोष को जाता है जो इस दौरान दूरदर्शन के महानिदेशक रहे।  प्रसार भारती विधेयक पारित कराने की ज़िम्मेदारी विश्वनाथ प्रताप सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने 1990 में पूरी की। लेकिन प्रसार भारती गठित होते-होते सात साल और गुज़र गये। तकनीकी रूप से कहा जा सकता है कि आज दूरदर्शन और आकाशवाणी स्वायत्त हो गये हैं। लेकिन हकीकत में सूचना और प्रसारण मंत्रालय का एक अतिरिक्त सचिव ही प्रसार भारती का मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) होता है। अगर यह स्वायत्तता है तो बहुत सीमित किस्म की।

तीसरा चरण- नब्बे के दशक में कदम रखने के साथ ही भारतीय मीडिया को बहुत बड़ी हद तक बदली हुई दुनिया का साक्षात्कार करना पड़ा। इस परिवर्तन के केंद्र में 1990-91 की तीन परिघटनाएँ थीं : मण्डल आयोग की सिफ़ारिशों से निकली राजनीति, मंदिर आंदोलन की राजनीति और भूमण्डलीकरण के तहत होने वाले आर्थिक सुधार।  इन तीनों ने मिल कर सार्वजनिक जीवन के वामोन्मुख रुझानों को नेपथ्य में धकेल दिया और दक्षिणपंथी लहज़ा मंच पर आ गया।  यही वह क्षण था जब सरकार ने प्रसारण के क्षेत्र में 'खुला आकाश' की नीति अपनानी शुरू की। नब्बे के दशक में उसने न केवल प्रसार भारती निगम बना कर आकाशवाणी और दूरदर्शन को एक हद तक स्वायत्तता दी, बल्कि स्वदेशी निजी पूँजी और विदेशी पूँजी को प्रसारण के क्षेत्र में कदम रखने की अनुमति भी दी। प्रिंट मीडिया में विदेशी पूँजी को प्रवेश करने का रास्ता खोलने में उसे कुछ वक्त लगा लेकिन इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में उसने यह फ़ैसला भी ले लिया। 

मीडिया अब पहले की तरह ‘सिंगल-सेक्टर’ यानी मुद्रण-प्रधान नहीं रह गया। उपभोक्ता-क्रांति के कारण विज्ञापन से होने वाली आमदनी में कई गुना बढ़ोतरी हुई जिससे हर तरह के मीडिया के लिए विस्तार हेतु पूँजी की कोई कमी नहीं रह गयी। सेटेलाइट टीवी पहले केबिल टीवी के माध्यम से दर्शकों तक पहुँचा जो प्रौद्योगिकी और उद्यमशीलता की दृष्टि से स्थानीय पहलकदमी और प्रतिभा का असाधारण नमूना था। इसके बाद आयी डीटीएच प्रौद्योगिकी जिसने समाचार प्रसारण और मनोरंजन की दुनिया को पूरी तरह से बदल डाला। एफ़एम रेडियो चैनलों की कामयाबी से रेडियो का माध्यम मोटर वाहनों से आक्रांत नागर संस्कृति का एक पर्याय बन गया। 

1995 में भारत में इंटरनेट की शुरुआत हुई और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के अंत तक बड़ी संख्या में लोगों के निजी और व्यावसायिक जीवन का एक अहम हिस्सा नेट के ज़रिये संसाधित होने लगा। नयी मीडिया प्रौद्योगिकियों ने अपने उपभोक्ताओं को ‘कनवर्जेंस’ का उपहार दिया जो जादू की डिबिया की तरह हाथ में थमे मोबाइल फ़ोन के ज़रिये उन तक पहुँचने लगा। इन तमाम पहलुओं ने मिल कर मीडिया का दायरा इतना बड़ा और विविध बना दिया कि उसके आग़ोश में सार्वजनिक जीवन के अधिकतर आयाम आ गये। इसे ‘मीडियास्फ़ेयर’ जैसी स्थिति का नाम दिया गया। 

प्रिंट मीडिया में विदेशी पूँजी को इजाज़त मिलने का पहला असर यह पड़ा कि रियूतर, सीएनयेन और बीबीसी जैसे विदेशी मीडिया संगठन भारतीय मीडियास्फ़ेयर की तरफ़ आकर्षित होने लगे। उन्होंने देखा कि भारत में श्रम का बाज़ार बहुत सस्ता है और अंतराष्ट्रीय मानकों के मुकाबले यहाँ वेतन पर अधिक से अधिक एक-चौथाई ही ख़र्च करना पड़ता है।  इसलिए इन ग्लोबल संस्थाओं ने भारत को अपने मीडिया प्रोजेक्टों के लिए आउटसोर्सिंग का केंद्र बनाया भारतीय बाज़ार में मौजूद मीडिया के विशाल और असाधारण टेलेंट-पूल का ग्लोबल बाज़ार के लिए दोहन होने लगा। दूसरी तरफ़ भारत की प्रमुख मीडिया कम्पनियाँ (टाइम्स ग्रुप, आनंद बाज़ार पत्रिका, जागरण, भास्कर, हिंदुस्तान टाइम्स) वाल स्ट्रीट जरनल, बीबीसी, फ़ाइनेंसियल टाइम्स, इंडिपेंडेंट न्यूज़ ऐंड मीडिया और ऑस्ट्रेलियाई प्रकाशनों के साथ सहयोग-समझौते करती नज़र आयीं। 

घराना-संचालित कम्पनियों पर आधारित मीडिया बिज़नेस ने पूँजी बाज़ार में जा कर अपने-अपने इनीशियल पब्लिक ऑफ़रिंग्स अर्थात् आईपीओ प्रस्ताव जारी करने शुरू कर दिये। इनकी शुरुआत पहले एनडीटीवी, टीवी टुडे, ज़ी टेलिफ़िल्म्स जैसे दृश्य-मीडिया ने की। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तर्ज़ पर प्रिंट-मीडिया ने भी पूँजी बाज़ार में छलाँग लगायी और अपने विस्तार के लिए निवेश हासिल करने में जुट गया। ऐसा पहला प्रयास ‘द डेकन क्रॉनिकल’ ने किया जिसकी सफलता ने प्रिंट-मीडिया के लिए पूँजी का संकट काफ़ी-कुछ हल कर दिया।

दूसरी तरफ़ बाज़ारवाद के बढ़ते हुए प्रभाव और उपभोक्ता क्रांति में आये उछाल के परिणामस्वरूप विज्ञापन-जगत में दिन-दूनी-रात-चौगुनी बढ़ोतरी हुई। चालीस के दशक की शुरुआत में विज्ञापन एजेंसियों की संख्या चौदह से बीस के आस-पास रही होगी। 1979-80 में न्यूज़पेपर सोसाइटी (आईएनएस) की मान्यता प्राप्त एजेंसियों की संख्या केवल 168 तक ही बढ़ सकी थी। लेकिन, भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने अगले दो दशकों में उनकी संख्या 750 कर दी जो चार सौ करोड़ रुपये सालाना का धंधा कर रही थीं। 1997-98 में सबसे बड़ी पंद्रह विज्ञापन एजेंसियों ने ही कुल 4,105.58 करोड़ रुपये के बिल काटे। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उपभोक्ता-क्रांति का चक्का कितनी तेज़ी से घूम रहा था। विज्ञापन की रंगीन और मोहक हवाओं पर सवार हो कर दूर-दूर तक फैलते उपभोग के संदेशों ने उच्च वर्ग, उच्च-मध्यम वर्ग, समूचे मध्य वर्ग और मज़दूर वर्ग के ख़ुशहाल होते हुए महत्त्वाकांक्षी हिस्से को अपनी बाँहों में समेट लिया। मीडिया का विस्तार विज्ञापनों में हुई ज़बरदस्त बढ़ोतरी के बिना सम्भव नहीं था।

प्रिंट-मीडिया और रेडियो विज्ञापनों को उतना असरदार कभी नहीं बना सकता था जितना टीवी ने बनाया। टीवी का प्रसार भारत में देर से अवश्य हुआ, लेकिन एक बार शुरुआत होने पर उसने मीडिया की दुनिया में पहले से स्थापित मुद्रित-माध्यम को जल्दी ही व्यावसायिक रूप से असुरक्षाग्रस्त कर दिया। इस प्रक्रिया में केबिल और डीटीएच के योगदान का उल्लेख करना आवश्यक है। केबिल टीवी का प्रसार और सफलता भारतीयों की उद्यमी प्रतिभा का ज़ोरदार नमूना है। सरकार के पास चूँकि किसी सुसंगत संचार नीति का अभाव था इसलिए नब्बे के दशक की शुरुआत में बहुमंज़िली इमारतों में रहने वाली मध्यवर्गीय और निम्न-मध्यवर्गीय आबादियों में कुछ उत्साही और चतुर लोगों ने अपनी निजी पहलकदमी पर क्लोज़ सरकिट टेलिविज़न प्रसारण का प्रबन्ध किया जिसका केंद्र एक सेंट्रल कंट्रोल रूम हुआ करता था। इन लोगों ने वीडियो प्लेयरों के ज़रिये भारतीय और विदेशी फ़िल्में दिखाने की शुरुआत की। साथ में दर्शकों को मनोरंजन की चौबीस घंटे चलने वाली खुराक देने वाले विदेशी-देशी सेटेलाइट चैनल भी देखने को मिलते थे। जनवरी, 1992 में केबिल नेटवर्क के पास केवल 41 लाख ग्राहक थे। 

लेकिन केवल चार साल के भीतर 1996 में यह संख्या बानवे लाख हो गयी। अगले साल तक पूरे देश में टीवी वाले घरों में से 31 प्रतिशत घरों में केबिल प्रसारण देखा जा रहा था। सदी के अंत तक बड़े आकार के गाँवों और कस्बों के टीवी दर्शकों तक केबिल की पहुँच हो चुकी थी। केबिल और उपग्रहीय टीवी चैनलों की लोकप्रियता देख कर प्रमुख मीडिया कम्पनियों ने टीवी कार्यक्रम-निर्माण के व्यापार में छलाँग लगा दी। वे पब्लिक और प्राइवेट टीवी चैनलों को कार्यक्रमों की सप्लाई करने लगे।

स्पष्ट है कि केबिल और डीटीएच के कदम तभी जम सकते थे, जब पहले पब्लिक (सरकारी) और प्राइवेट (निजी पूँजी के स्वामित्व में) टेलिविज़न प्रसारण में हुई वृद्धि ने ज़मीन बना दी हो। 1982 में दिल्ली एशियाड के मार्फ़त रंगीन टीवी के कदम पड़ते ही भारत में टीवी ट्रांसमीटरों की संख्या तेज़ी से बढ़ी। पब्लिक टीवी के प्रसारण नेटवर्क दूरदर्शन ने नौ सौ ट्रांसमीटरों और तीन विभिन्न सेटेलाइटों की मदद से देश के 70 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र को और 87 % आबादी को अपने दायरे में ले लिया (पंद्रह साल में 230 फ़ीसदी की वृद्धि)। उसका मुख्य चैनल डीडी-वन तीस करोड़ लोगों (यानी अमेरिका की आबादी से भी अधिक) तक पहुँचने का दावा करने लगा। प्राइवेट टीवी प्रसारण केबिल और डीटीएच के द्वारा अपनी पहुँच लगातार बढ़ा रहा है। लगभग सभी ग्लोबल टीवी नेटवर्क अपनी बल पर या स्थानीय पार्टनरों के साथ अपने प्रसारण का विस्तार कर रहे हैं। 

भारतीय चैनल भी पीछे नहीं हैं और उनके साथ रात-दिन प्रतियोगिता में लगे हुए हैं। अंग्रेज़ी और हिंदी के चैनलों के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं (विशेषकर दक्षिण भारतीय) के मनोरंजन और न्यूज़ चैनलों की लोकप्रियता और व्यावसायिक कामयाबी भी उल्लेखनीय है। सरकार की दूरसंचार नीति इन मीडिया कम्पनियों को इजाज़त देती है कि वे सेटेलाइट के साथ सीधे अपलिंकिंग करके प्रसारण कर सकते हैं। अब उन्हें अपनी सामग्री विदेश संचार निगम (वीएसएनएल) के रास्ते लाने की मजबूरी का सामना नहीं करना पड़ता। 

अगस्त, 1995 से नवम्बर, 1998 के बीच सरकारी संस्था विदेश संचार निगम लिमिटेड (वीएसएनयेल) द्वारा ही इंटरनेट सेवाएँ मुहैया करायी जाती थीं। यह संस्था कलकत्ता, बम्बई, मद्रास और नयी दिल्ली स्थित चार इंटरनैशनल टेलिकम्युनिकेशन गेटवेज़ के माध्यम से काम करती थी। नैशनल इंफ़ोमेटिक्स सेंटर (एनआईसीनेट) और एजुकेशनल ऐंड रिसर्च नेटवर्क ऑफ़ द डिपार्टमेंट ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक्स (ईआरएनयीटी) कुछ विशेष प्रकार के 'क्लोज़्ड यूज़र ग्रुप्स' को ये सेवाएँ प्रदान करते थे। दिसम्बर, 1998 में दूरसंचार विभाग ने बीस प्राइवेट ऑपरेटरों को आईएसपी लाइसेंस प्रदान करके इस क्षेत्र का निजीकरण कर दिया। 1999 तक सरकार के तहत चलने वाले महानगर टेलिफ़ोन निगम सहित 116 आईएसपी कम्पनियाँ सक्रिय हो चुकी थीं। केबिल सर्विस देने वाले भी इंटरनेट उपलब्ध करा रहे थे।

जैसे-जैसे बीएसएनएल ने अपना शुल्क घटाया, इंटरनेट सेवाएँ सस्ती होती चली गयीं। देश भर में इंटरनेट कैफ़े दिखने लगे। जुलाई, 1999 तक भारत में 114,062 इंटरनेट होस्ट्स की पहचान हो चुकी थी। इनकी संख्या में 94 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी दर्ज की गयी। नयी सदी में कदम रखते ही सारे देश में कम्प्यूटर बूम की आहटें सुनी जाने लगीं। पर्सनल कम्प्यूटरों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी और साथ ही इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या भी। ई-कॉमर्स की भूमि तैयार होने लगी और बैंकों ने उसे प्रोत्साहित करना शुरू किया। देश के प्रमुख अख़बार ऑन लाइन संस्करण प्रकाशित करने लगे। विज्ञापन एजेंसियाँ भी अपने उत्पादों को नेट पर बेचने लगीं। नेट ने व्यक्तिगत जीवन की क्वालिटी में एक नये आयाम का समावेश किया। रेलवे और हवाई जहाज़ के टिकट बुक कराने से लेकर घर में लीक होती छत को दुरुस्त करने के लिए नेट की मदद ली जाने लगी। नौकरी दिलाने वाली और शादी-ब्याह संबंधी वेबसाइट्स अत्यंत लोकप्रिय साबित हुईं। वर-वधु खोजने में इंटरनेट एक बड़ा मददगार साबित हुआ। सोशल नेटवर्किंग साइट्स के सहारे नेट आधारित निजी रिश्तों की दुनिया में नये रूपों का समावेश हुआ।

Saturday, 18 July 2020

डाक्टर को भगवान का रूप क्यूं कहा जाता है...?

"एस एम फ़रीद भारतीय"
क्या आपने कभी भगवान को देखा है, नहीं ना चलो आज हम आपको एक भगवान रूपी इंसान से मिलाते हैं...?

उन्हें किसी भी दिन शहर के अन्नपूर्णा होटल में पच्चीस रुपए की थाली का खाना खाते हुए देखा जा सकता है। इसके साथ ही

Monday, 13 July 2020

तुर्की राष्ट्रपति के फ़ैसले पर आवाज़ उठाने या विरोध करने वालो को पहले समझ लेना चाहिए मामला क्या है...?


"एस एम फ़रीद भारतीय"

तुर्क (500-1300), रुम सल्तनत (1000–1300), अनातोली बिलिक्स, आटोमान साम्राज्य (1299–1922), तुर्की का स्वतंत्रता संग्राम (1919-1922), तुर्की गणतंत्र (1923–)

स्वतंत्रता की लड़ाई की शुरूआत 19 मई 1919, विजय दिवस 30 अगस्त 1922, गणराज्य की घोषणा 29 अक्टूबर 1923 को की गई, कस्तुनतुनिया का

Thursday, 11 June 2020

एक सवाल झग्गड़ क्या होता है के साथ बचपन की याद...?

"एस एम फ़रीद भारतीय"

कहानी पुरानी है मगर सौलहआना सच है, एक बड़े भाई जैसे दोस्त ने ये लेख लिखने का मौक़ा दिया है तो सोचा बहुत कुछ नहीं तो थोड़ा तो लिख ही दो दास्तान बचपन की बहुत याद हैं मगर ये दास्तान लिखने का मौक़ा एक सवाल और तस्वीर के साथ मिला है, तब कुछ यादें ताज़ा करते हैं.

पुराने ज़माने मैं पहले कुछ अमीर घरों में कुआँ होता था, जिस किसी को पानी चाहिए तो बाल्टी लीजिये और कुएं से पानी भर

Saturday, 6 June 2020

असली सैफ़ी कौन...?

सैफ़ी नाम के असल हक़दारों से एक परिचय...?

"एस एम फ़रीद भारतीय"
दाऊदी बोहरा समुदाय की विरासत फ़ातिमी इमामों से जुड़ी है, जो अपने को नबी ए करीम मुहम्मद सल्ललाहु अलेयहि वसल्लम (570-632) के असल वंशज मानते हैं, यह समुदाय मुख्य रूप से इमामों के प्रति ही अपना अक़ीदा (श्रद्धा) रखता है.

सुलेमानी जिन्हें सुन्नी बोहरा भी कहा

गाज़ा में पत्रकार भूख से मर रहे हैं- अल जज़ीरा...?

नेशनल न्यूज़ 24 नेटवर्क इंडिया 'अपनी जान जोखिम में डालकर, अब ज़िंदा रहने की लड़ाई लड़ रहे हैं', अल जज़ीरा और एएफपी का कह...