Saturday, 19 December 2020

मानो या ना मानो, अगली सरकार किसान मज़दूर की...?

किसान का अपना अख़बार, अपनी आई टी सेल और अब अपनी होगी पार्टी, सरकार ने अगर वक़्त रहते बात ना मानी, तब सरकार गिराकर किसान ख़ुद लड़ेगा अपना चुनाव, क्या आपको नहीं लगता है, अब भी नहीं समझे किसानों की रणनीति...?

किसानों की रणनीति और भाषा बता रही है कि अगला चुनाव किसान ख़ुद लड़ेगा, ना भाजपा ना कांग्रेस और ना ही कोई और ख़ुश होने वाली पार्टी...??

केजरीवाल और औवेसी तैयारी कर रहे हैं देश मैं एक बार फिर

किसान मज़दूरों को सत्ता अपने हाथ मैं लेकर अपने ही नहीं देश पर अहसान करना होगा...?

दोस्तों बात बहुत ही अजीब सी लग रही होगी मगर ये सच है, आज जनता ही नहीं देश भी ख़ून को आंसू रो रहा है, किसान अपनी मांगों को लेकर इस कड़कड़ाती ठंड मैं अपनी जान पर ही नहीं खेल रहे बल्कि जान वहां भी रहे हैं, मगर सत्ता मैं बैठे लोग जिनके सहारे या यूं कहूं जिनको बहकाकर सत्ता तक पहुंचे वो गूंगे बहरे बने बैठे हैं, जबकि कड़वा सच यही है वो भी पिछली सरकार को आन्दोलन से घेर कर सत्ता पाने मैं सफ़ल हुए थे.

मगर आज वही सत्ता को नशे मैं चूर अपने ख़ुद को कानून को जबरन किसानों पर थोपने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं, क्यूंकि सत्ता और सत्ताधारियों की पोशाक ही बस साफ़

शहंशाह औरंगज़ेब ने मन्दिर तोड़ा तो मस्जिद भी तोड़ी लेकिन क्यूं...?

पेशकश- एस एम फ़रीद भारतीय 
पुस्‍तक का नाम ‘‘इतिहास के साथ यह अन्याय‘‘ लेखक प्रो.बी.एन पाण्डेय, भूतपूर्व राज्यपाल उड़ीसा, राज्यसभा के सदस्य, इलाहाबाद नगरपालिका के चेयरमैन एवं इतिहासकार भी रहे हैं...!

पाण्डेय जी लिखते हैं कि जब में इलाहाबाद नगरपालिका का चेयरमैन था (1948 ई. से 1953 ई. तक) तो मेरे सामने दाखिल-खारिज का एक मामला लाया गया। यह मामला सोमेश्वर नाथ महादेव मन्दिर से संबंधित जायदाद के बारे में था। मन्दिर के महंत की मृत्यु के बाद उस जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए थे। एक दावेदार ने कुछ दस्तावेज़ दाखिल किये जो उसके खानदान में बहुत दिनों से चले आ रहे थे। इन दस्तावेज़ों में शहंशाह औरंगज़ेब के फ़रमान भी थे। औरंगज़ेब ने इस मन्दिर को जागीर और नक़द अनुदान दिया था। मैंने सोचा कि ये फ़रमान जाली होंगे। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कैसे हो सकता है कि औरंगज़ेब जो मन्दिरों को तोड़ने के लिए प्रसिद्ध है, वह एक मन्दिर को यह कह कर जागीर दे सकता हे यह जागीर पूजा और भोग के लिए दी जा रही है। आखि़र औरंगज़ेब कैस बुतपरस्ती के साथ अपने को शरीक कर सकता था। मुझे यक़ीन था कि ये दस्तावेज़ जाली हैं, परन्तु कोई निर्णय लेने से पहले मैंने डा. सर तेज बहादुर सप्रु से राय लेना उचित समझा। वे अरबी और फ़ारसी के अच्छे जानकार थे। मैंने दस्तावेज़ें उनके सामने पेश करके उनकी राय मालूम की तो उन्होंने दस्तावेज़ों का अध्ययन करने के बाद कहा कि औरंगजे़ब के ये फ़रमान असली और वास्तविक हैं। इसके बाद उन्होंने अपने मुन्शी से बनारस के जंगमबाडी शिव मन्दिर की फ़ाइल लाने को कहा। यह मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल से विचाराधीन था। जंगमबाड़ी मन्दिर के महंत के पास भी औरंगज़ेब के कई फ़रमान थे, जिनमें मन्दिर को जागीर दी गई थी।

इन दस्तावेज़ों ने औरंगज़ेब की एक नई तस्वीर मेरे सामने पेश की, उससे मैं आश्चर्य में पड़ गया। डाक्टर सप्रू की सलाह पर मैंने भारत के पिभिन्न प्रमुख मन्दिरों के महंतो के पास पत्र भेजकर उनसे निवेदन किया कि यदि उनके पास औरंगज़ेब के कुछ फ़रमान हों जिनमें उन मन्दिरों को जागीरें दी गई हों तो वे कृपा करके उनकी फोटो-स्टेट कापियां मेरे पास भेज दें। अब मेरे सामने एक और आश्चर्य की बात आई। उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर, चित्रकूट के बालाजी मन्दिर, गौहाटी के उमानन्द मन्दिर, शत्रुन्जाई के जैन मन्दिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मन्दिरों एवं गुरूद्वारों से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फरमानों की नक़लें मुझे प्राप्त हुई। यह फ़रमान 1065 हि. से 1091 हि., अर्थात 1659 से 1685 ई. के बीच जारी किए गए थे। 

हालांकि हिन्दुओं और उनके मन्दिरों के प्रति औरंगज़ेब के उदार रवैये की ये कुछ मिसालें हैं, फिर भी इनसे यह प्रमाण्ति हो जाता है कि इतिहासकारों ने उसके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह पक्षपात पर आधारित है और इससे उसकी तस्वीर का एक ही रूख सामने लाया गया है। भारत एक विशाल देश है, जिसमें हज़ारों मन्दिर चारों ओर फैले हुए हैं। यदि सही ढ़ंग से खोजबीन की जाए तो मुझे विश्वास है कि और बहुत-से ऐसे उदाहरण मिल जाऐंगे जिनसे औरंगज़ेब का गै़र-मुस्लिमों के प्रति उदार व्यवहार का पता चलेगा। औरंगज़ेब के फरमानों की जांच-पड़ताल के सिलसिले में मेरा सम्पर्क श्री ज्ञानचंद और पटना म्यूजियम के भूतपूर्व क्यूरेटर डा. पी एल. गुप्ता से हुआ। ये महानुभाव भी औरंगज़ेब के विषय में ऐतिहासिक दृस्टि से अति महत्वपूर्ण रिसर्च कर रहे थे। मुझे खुशी हुई कि कुछ अन्य अनुसन्धानकर्ता भी सच्चाई को तलाश करने में व्यस्त हैं और काफ़ी बदनाम औरंगज़ेब की तस्वीर को साफ़ करने में अपना योगदान दे रहे हैं। औरंगज़ेब, जिसे पक्षपाती इतिहासकारों ने भारत में मुस्लिम हकूमत का प्रतीक मान रखा है। उसके बारें में वे क्या विचार रखते हैं इसके विषय में यहां तक कि ‘शिबली’ जैसे इतिहास गवेषी कवि को कहना पड़ाः

तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना।
कि औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था।।

दोस्तों औरंगज़ेब (रअ) पर हिन्दू-दुश्मनी के आरोप के सम्बन्ध में जिस फरमान को बहुत उछाला गया है, वह ‘फ़रमाने-बनारस’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह फ़रमान बनारस के मुहल्ला गौरी के एक ब्राहमण परिवार से संबंधित है। 1905 ई. में इसे गोपी उपाघ्याय के नवासे मंगल पाण्डेय ने सिटि मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया था। एसे पहली बार ‘एसियाटिक- सोसाइटी’ बंगाल के जर्नल (पत्रिका) ने 1911 ई. में प्रकाशित किया था। फलस्वरूप रिसर्च करनेवालों का ध्यान इधर गया। तब से इतिहासकार प्रायः इसका हवाला देते आ रहे हैं और वे इसके आधार पर औरंगज़ेब पर आरोप लगाते हैं कि उसने हिन्दू मन्दिरों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था, जबकि इस फ़रमान का वास्तविक महत्व उनकी निगाहों से आझल रह जाता है। यह लिखित फ़रमान औरंगज़ेब ने 15 जुमादुल-अव्वल 1065 हि. (10 मार्च 1659 ई.) को बनारस के स्थानिय अधिकारी के नाम भेजा था जो एक ब्राहम्ण की शिकायत के सिलसिले में जारी किया गया था। वह ब्राहमण एक मन्दिर का महंत था और कुछ लोग उसे परेशान कर रहे थे। फ़रमान में कहा गया हैः

 ‘‘अबुल हसन को हमारी शाही उदारता का क़ायल रहते हुए यह जानना चाहिए कि हमारी स्वाभाविक दयालुता और प्राकृतिक न्याय के अनुसार हमारा सारा अनथक संघर्ष और न्यायप्रिय इरादों का उद्देश्य जन-कल्याण को अढ़ावा देना है और प्रत्येक उच्च एवं निम्न वर्गों के हालात को बेहतर बनाना है। अपने पवित्र कानून के अनुसार हमने फैसला किया है कि प्राचीन मन्दिरों को तबाह और बरबाद नहीं किया जाय, अलबत्ता नए मन्दिर न बनए जाएँ। हमारे इस न्याय पर आधारित काल में हमारे प्रतिष्ठित एवं पवित्र दरबार में यह सूचना पहुंची है कि कुछ लोग बनारस शहर और उसके आस-पास के हिन्दू नागरिकों और मन्दिरों के ब्राहम्णों-पुरोहितों को परेशान कर रहे हैं तथा उनके मामलों में दख़ल दे रहे हैं, जबकि ये प्राचीन मन्दिर उन्हीं की देख-रेख में हैं। इसके अतिरिक्त वे चाहते हैं कि इन ब्राहम्णों को इनके पुराने पदों से हटा दें। यह दखलंदाज़ी इस समुदाय के लिए परेशानी का कारण है। इसलिए यह हमारा फ़रमान है कि हमारा शाही हुक्म पहुंचते ही तुम हिदायत जारी कर दो कि कोई भी व्यक्ति ग़ैर-कानूनी रूप से दखलंदाजी न करे और न उन स्थानों के ब्राहम्णों एवं अन्य हिन्दु नागरिकों को परेशान करे। ताकि पहले की तरह उनका क़ब्ज़ा बरक़रार रहे और पूरे मनोयोग से वे हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के लिए प्रार्थना करते रहें। इस हुक्म को तुरन्त लागू किया जाये।’’

इस फरमान से बिल्कुल स्पष्ट हैं कि औरंगज़ेब ने नए मन्दिरों के निर्माण के विरूद्ध कोई नया हुक्म जारी नहीं किया, बल्कि उसने केवल पहले से चली आ रही परम्परा का हवाला दिया और उस परम्परा की पाबन्दी पर ज़ोर दिया। पहले से मौजूद मन्दिरों को ध्वस्त करने का उसने कठोरता से विरोध किया। इस फ़रमान से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह हिन्दू प्रजा को सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर देने का इच्छुक था। यह अपने जैसा केवल एक ही फरमान नहीं है। बनारस में ही एक और फरमान मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि औरंगज़ेब वास्तव में चाहता था कि हिन्दू सुख-शान्ति के साथ जीवन व्यतीत कर सकें। यह फरमान इस प्रकार हैः ‘‘रामनगर (बनारस) के महाराजाधिराज राजा रामसिंह ने हमारे दरबार में अर्ज़ी पेश की हैं कि उनके पिता ने गंगा नदी के किनारे अपने धार्मिक गुरू भगवत गोसाईं के निवास के लिए एक मकान बनवाया था। अब कुछ लोग गोसाईं को परेशान कर रहे हैं। अतः यह शाही फ़रमान जारी किया जाता है कि इस फरमान के पहुंचते ही सभी वर्तमान एवं आने वाले अधिकारी इस बात का पूरा ध्यान रखें कि कोई भी व्यक्ति गोसाईं को परेशान एवं डरा-धमका न सके, और न उनके मामलें में हस्तक्षेप करे, ताकि वे पूरे मनोयोग के साथ हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए प्रार्थना करते रहें। इस फरमान पर तुरं अमल गिया जाए।’’ (तीरीख-17 बबी उस्सानी 1091 हिजरी) जंगमबाड़ी मठ के महंत के पास मौजूद कुछ फरमानों से पता चलता है कि

औरंगज़ैब कभी यह सहन नहीं करता था कि उसकी प्रजा के अधिकार किसी प्रकार से भी छीने जाएँ, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान। वह अपराधियों के साथ सख़्ती से पेश आता था। इन फरमानों में एक जंगम लोंगों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) की ओर से एक मुसलमान नागरिक के दरबार में लाया गया, जिस पर शाही हुक्म दिया गया कि बनारस सूबा इलाहाबाद के अफ़सरों को सूचित किया जाता है कि पुराना बनारस के नागरिकों अर्जुनमल और जंगमियों ने शिकायत की है कि बनारस के एक नागरिक नज़ीर बेग ने क़स्बा बनारस में उनकी पांच हवेलियों पर क़ब्जा कर लिया है। उन्हें हुक्म दिया जाता है कि यदि शिकायत सच्ची पाई जाए और जायदा की मिल्कियत का अधिकार प्रमानिण हो जाए तो नज़ीर बेग को उन हवेलियों में दाखि़ल न होने दया जाए, ताकि जंगमियों को भविष्य में अपनी शिकायत दूर करवाने के लिएए हमारे दरबार में ने आना पडे। इस फ़रमान पर 11 शाबान, 13 जुलूस (1672 ई.) की तारीख़ दर्ज है। इसी मठ के पास मौजूद एक-दूसरे फ़रमान में जिस पर पहली नबीउल-अव्वल 1078 हि. की तारीख दर्ज़ है, यह उल्लेख है कि ज़मीन का क़ब्ज़ा जंगमियों को दया गया। फ़रमान में है- ‘‘परगना हवेली बनारस के सभी वर्तमान और भावी जागीरदारों एवं करोडियों को सूचित किया जाता है कि शहंशाह के हुक्म से 178 बीघा ज़मीन जंगमियों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) को दी गई। पुराने अफसरों ने इसकी पुष्टि की थी और उस समय के परगना के मालिक की मुहर के साथ यह सबूत पेश किया है कि ज़मीन पर उन्हीं का हक़ है। अतः शहंशाह की जान के सदक़े के रूप में यह ज़मीन उन्हें दे दी गई। ख़रीफ की फसल के प्रारम्भ से ज़मीन पर उनका क़ब्ज़ा बहाल किया जाय और फिर किसीप्रकार की दखलंदाज़ी न होने दी जाए, ताकि जंगमी लोग (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) उसकी आमदनी से अपने देख-रेख कर सकें।

’’इस फ़रमान से केवल यही ता नहीं चलता कि औरंगज़ेब स्वभाव से न्यायप्रिय था, बल्कि यह भी साफ़ नज़र आता है कि वह इस तरह की जायदादों के बंटवारे में हिन्दू धार्मिक सेवकों के साथ कोई भेदभा नहीं बरता था। जंगमियों को 178 बीघा ज़मीन संभवतः स्वयं औरंगज़ेब ही ने प्रान की थी, क्योंकि एक दूसरे फ़रमान (तिथि 5 रमज़ान, 1071 हि.) में इसका स्पष्टीकरण किया गया है कि यह ज़मीन मालगुज़ारी मुक्त है।

औरंगज़ेब ने एक दूसरे फरमान (1098 हि.) के द्वारा एक-दूसरी हिन्दू धार्मिक संस्था को भी जागीर प्रदान की। फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘बनारस में गंगा नदी के किनारे बेनी-माधो घाट पर दो प्लाट खाली हैं एक मर्क़जी मस्जिद के किनारे रामजीवन गोसाईं के घर के सामने और दूसरा उससे पहले। ये प्लाट बैतुल-माल की मिल्कियत है। हमने यह प्लाट रामजीवन गोसाईं और उनके लड़के को ‘‘इनाम’ के रूप में प्रदान किया, ताकि उक्त प्लाटों पर बाहम्णें एवं फ़क़ीरों के लिए रिहायशी मकान बनाने के बाद वे खुदा की इबादत और हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए दूआ और प्रार्थना कने में लग जाएं। हमारे बेटों, वज़ीरों, अमीरों, उच्च पदाधिकारियों, दरोग़ा और वर्तमान एवं भावी कोतवालों के अनिवार्य है कि वे इस आदेश के पालन का ध्यान रखें और उक्त प्लाट, उपर्युक्त व्यक्ति और उसके वारिसों के क़ब्ज़े ही मे रहने दें और उनसे न कोई मालगुज़ारी या टैक्स लिया जसए और न उनसे हर साल नई सनद मांगी जाए।’’ लगता है औरंगज़ेब को अपनी प्रजा की धार्मिक भावनाओं के सम्मान का बहुत अधिक ध्यान रहता था।
 
हमारे पास औरंगज़ेब का एक फ़रमान (2 सफ़र, 9 जुलूस) है जो असम के शह गोहाटी के उमानन्द मन्दिर के पुजारी सुदामन ब्राहम्ण के नाम है। असम के हिन्दू राजाओं की ओर से इस मन्दिर और उसके पुजारी को ज़मीन का एक टुकड़ा और कुछ जंगलों की आमदनी जागीर के रूप में दी गई थी, ताकि भोग का खर्च पूरा किया जा सके और पुजारी की आजीविका चल सके। जब यह प्रांत औरंगजेब के शासन-क्षेत्र में आया, तो उसने तुरंत ही एक फरमान के द्वारा इस जागीर को यथावत रखने का आदेश दिया। हिन्दुओं और उनके धर्म के साथ औरंगज़ेब की सहिष्ण्ता और उदारता का एक और सबूत उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर के पुजारियों से मिलता है। यह शिवजी के प्रमुख मन्दिरों में से एक है, जहां दिन-रात दीप प्रज्वलित रहता है। इसके लिए काफ़ी दिनों से पतिदिन चार सेर घी वहां की सरकार की ओर से उपलब्ध कराया जाथा था और पुजारी कहते हैं कि यह सिलसिला मुगल काल में भी जारी रहा। 

औरंगजेब ने भी इस परम्परा का सम्मान किया। इस सिलसिले में पुजारियों के पास दुर्भाग्य से कोई फ़रमान तो उपलब्ध नहीं है, परन्तु एक आदेश की नक़ल ज़रूर है जो औरंगज़ब के काल में शहज़ादा मुराद बख़्श की तरफ से जारी किया गया था। (5 शव्वाल 1061 हि. को यह आदेश शहंशाह की ओर से शहज़ादा ने मन्दिर के पुजारी देव नारायण के एक आवेदन पर जारी किया था। वास्तविकता की पुष्टि के बाद इस आदेश में कहा गया हैं कि मन्दिर के दीप के लिए चबूतरा कोतवाल के तहसीलदार चार सेर (अकबरी घी प्रतिदिन के हिसाब से उपल्ब्ध कराएँ। इसकी नक़ल मूल आदेश के जारी होने के 93 साल बाद (1153 हिजरी) में मुहम्मद सअदुल्लाह ने पुनः जारी की। साधारण्तः इतिहासकार इसका बहुत उल्लेख करते हैं कि अहमदाबाद में नागर सेठ के बनवाए हुए चिन्तामणि मन्दिर को ध्वस्त किया गया, परन्तु इस वास्तविकता पर पर्दा डाल देते हैं कि उसी औरंगज़ेब ने उसी नागर सेठ के बनवाए हुए शत्रुन्जया और आबू मन्दिरों को काफ़ी बड़ी जागीरें प्रदान कीं।

निःसंदेह इतिहास से यह प्रमाण्ति होता हैं कि औरंगजेब ने बनारस के विश्वनाथ मन्दिर और गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद को ढा देने का आदेश दिया था, परन्तु इसका कारण कुछ और ही था। विश्वनाथ मन्दिर के सिलसिले में घटनाक्रम यह बयान किया जाता है कि जब औरंगज़ेब बंगाल जाते हुए बनारस के पास से गुज़र रहा था, तो उसके काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं ने बादशाह से निवेदन किया कि वहा। क़ाफ़िला एक दिन ठहर जाए तो उनकी रानियां बनारस जा कर गंगा दनी में स्नान कर लेंगी और विश्वनाथ जी के मन्दिर में श्रद्धा सुमन भी अर्पित कर आएँगी। औरंगज़ेब ने तुरंत ही यह निवेदन स्वीकार कर लिया और क़ाफिले के पडाव से बनारस तक पांच मील के रास्ते पर फ़ौजी पहरा बैठा दिया। रानियां पालकियों में सवार होकर गईं और स्नान एवं पूजा के बाद वापस आ गईं, परन्तु एक रानी (कच्छ की महारानी) वापस नहीं आई, तो उनकी बडी तलाश हुई, लेकिन पता नहीं चल सका। जब औरंगजै़ब को मालूम हुआ तो उसे बहुत गुस्सा आया और उसने अपने फ़ौज के बड़े-बड़े अफ़सरों को तलाश के लिए भेजा। आखिर में उन अफ़सरों ने देखा कि गणेश की मूर्ति जो दीवार में जड़ी हुई है, हिलती है। 

उन्होंने मूर्ति हटवा कर देख तो तहखाने की सीढी मिली और गुमशुदा रानी उसी में पड़ी रो रही थी। उसकी इज़्ज़त भी लूटी गई थी और उसके आभूषण भी छीन लिए गए थे। यह तहखाना विश्वनाथ जी की मूर्ति के ठीक नीचे था। राजाओं ने इस हरकत पर अपनी नाराज़गी जताई और विरोघ प्रकट किया। चूंकि यह बहुत घिनौना अपराध था, इसलिए उन्होंने कड़ी से कड़ी कार्रवाई कने की मांग की। उनकी मांग पर औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि चूंकि पवित्र-स्थल को अपवित्र किया जा चुका है। अतः विश्नाथ जी की मूर्ति को कहीं और लेजा कर स्थापित कर दिया जाए और मन्दिर को गिरा कर ज़मीन को बराबर कर दिया जाय और महंत को मिरफतर कर लिया जाए। डाक्टर पट्ठाभि सीता रमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ मे इस घटना को दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया है। पटना म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर डा. पी. एल. गुप्ता ने भी इस घटना की पुस्टि की है।

गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद की घटना यह है कि वहां के राजा जो तानाशाह के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालगुज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालुगज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली का हिस्सा नहीं भेजते थे। कुछ ही वर्षों  में यह रक़म करोड़ों की हो गई। तानाशाह न यह ख़ज़ाना एक जगह ज़मीन में गाड़ कर उस पर मस्जिद बनवा दी। जब औरंज़ेब को इसका पता चला तो उसने आदेश दे दिया कि यह मस्जिद गिरा दी जाए। अतः गड़ा हुआ खज़ाना निकाल कर उसे जन-कल्याण के कामों में ख़र्च किया जाये, ये दोनों मिसालें यह साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि औरंगज़ेब न्याय के मामले में मन्दिर और मस्जिद में कोई फ़र्क़ नहीं समझता था। ‘‘दर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा, और उन लोगों को दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और मनगढंत बातों में अन्तर करते हैं। आज भी साम्प्रदायिक एवं स्वार्थी तत्व इतिहास को तोड़ने-मरोडने और उसे ग़लत रंग देने में लगे हुए हैं।

ये लेख उन लोगों के गाल पर आज भी तमाचा है जो नफ़रत की फ़सल बोने के बाद देश को तरक्की और उन्नति से भटकाकर अपना उल्लू सीधा कर देश की जनता को गुमराह कर रहे हैं, ख़ैर नाम वाम मैं क्या रखा है कुछ भी हो मगर, ध्येय सिर्फ़ एक होना चाहिए देश की तरक्की के साथ उन्नति, उम्मीद है इस लेख से गुमराह हुए लोग कुछ सीख हासिल कर अपने को ठगे जाने से बचा सकें.
जय हिंद जय भारत 

Monday, 7 December 2020

जाने यूपी के पहले मुख्यमंत्री का नाम क्या है...?

"एस एम फ़रीद भारतीय"

आज हम आपको वो बताने जा रहे हैं जो आप शायद अब तक नहीं जानते, बात कर रहे हैं मुहम्मद अहमद सैयद छतारी जिनको अप्रैल से नवंबर 1933 तक सात महीनों के लिए राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया गया था। जो गोल सम्मेलनों की एक श्रृंखला के बाद, 1 अप्रैल 1937 को लागू हुआ, और राष्ट्रीय कृषक दलों के नेता छतरी के नवाब को मंत्रिमंडल बनाने के लिए आमंत्रित किया गया, और 1937 के दौरान वे मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने जल्द ही संयुक्त प्रांत सरकार में गृह मंत्रालय के मंत्री बनने के लिए रु 2,500 का वेतन प्राप्त किया। छतरी जुलाई से अगस्त 1941 तक भारत की राष्ट्रीय रक्षा परिषद का सदस्य थे। उन्होने हैदराबाद कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष के पद को स्वीकार करने के लिए इससे इस्तीफा दे दिया है, जो प्रभावी रूप से हैदराबाद की महत्वपूर्ण रियासत के प्रधानमंत्री हैं। तो आइए आज इस आर्टिकल में हम आपको मुहम्मद अहमद सैयद छतरी के जीवन के बारे में बताएगे.

मुहम्मद अहमद सैयद छतरी का जन्म 12 दिसंबर 1888 को छतरी, उत्तर-पश्चिमी प्रांत में हुआ था। उन्होने अपने ही अब्दुस समद खान चाचा नवाब बहादुर, Talibnagar के नवाब की बेटी से शादी की थी। उनके दो बेटे राहत सयैद खान और फरहत खान सयैद है । उनके छोटे बेटे फरहत खान सयैद, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उनकी रुचि के लिए विख्यात है।

उन्होने अलीगढ़ मुसलमान एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की थी । और उन्होने संगीत अनुसंधान अकादमी, कोलकाता में संगीत का अध्ययन किया। उनका परिवार जल्द ही भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान में चले गए , और बड़े बेटे राहत सईद पाकिस्तान राष्ट्रीय सीनेट के सीनेटर बन गया।

12 नवंबर 1930 को लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में आयोजित पहले गोलमेज सम्मेलन में नवाब छतरी ने भाग लिया। मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व आगा खान और अन्य लोगों ने किया था, जिनमें मुहम्मद अली जिन्ना, सर मोहम्मद शफी, मौलाना मुहम्मद अली, डॉ। शफत अली, सर मुहम्मद जफरुल्ला खान, छतरी के नवाब और फजलुल हक शामिल थे।

17 मई 1923 से 11 जनवरी 1926 तक नवाब संयुक्त प्रांत के मंत्रिमंडल में एक मंत्री थे और फिर 1931 में वे वहां कृषि मंत्री के रूप में वापस आये।  वे सलेमपुर के राजा सहित अन्य महान मुस्लिम जमींदारों की तरह, संयुक्त प्रांत के ब्रिटिश प्रशासन के एक विश्वसनीय सहयोगी थे और उन्हे अप्रैल से नवंबर 1933 तक सात महीनों के लिए राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया गया था। जो गोल सम्मेलनों की एक श्रृंखला के बाद, 1 अप्रैल 1937 को लागू हुआ, और राष्ट्रीय कृषक दलों के नेता छतरी के नवाब को मंत्रिमंडल बनाने के लिए आमंत्रित किया गया, और नवाब साहब 3 अप्रैल 1937 से 16 जुलाई 1937 के दौरान प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने जल्द ही संयुक्त प्रांत सरकार में गृह मंत्रालय के मंत्री बनने के लिए रु 2,500 का वेतन प्राप्त किया।

छतरी  जुलाई से अगस्त 1941 तक भारत की राष्ट्रीय रक्षा परिषद का सदस्य थे। उन्होने हैदराबाद कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष के पद को स्वीकार करने के लिए इससे इस्तीफा दे दिया है, जो प्रभावी रूप से हैदराबाद की महत्वपूर्ण रियासत के प्रधानमंत्री हैं।

17 अक्टूबर 1936 को लखनऊ के पंडाल में आयोजित जिन्ना की अध्यक्षता में मुहम्मद अहमद सैयद छतरी ने अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के तीसरे खुले सत्र में भाग लिया। इस बैठक में मौलाना शौकत अली, मौलाना हसरत मोहानी, मौलाना जफर अली खान, डॉ। सैयद हुसैन, राजा गजनफर अली खान, खान बहादुर कुली खान, फजल हुसैन, नवाब जमशेद अली खान और अन्य शामिल थे।

मुहम्मद अहमद सैयद छतरी  को अगस्त 1941 में  हैदराबाद के प्रधानमंत्री की कार्यकारी परिषद का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। उन्होने इस पद पर सितंबर 1941 से 1 नवंबर 1947 तक कार्य किया।

6 सितंबर 1941 को हैदराबाद के निज़ाम बहादुर यार जंग ने सक्षम प्रशासक के रूप में छतरी के नवाब की प्रशंसा की। 1944 में मुहम्मद अहमद सैयद छतरी को HEE द्वारा सयैद-उल-मुल्क की उपाधि दी गई।

1946 में हैदराबाद के निज़ाम ने भारत के वाइसराय को सुझाव दिया कि छतरी के नवाब को मध्य प्रांत और बेरा के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया जाए।

11 जुलाई 1947, के बाद निजाम लंबित भारतीय स्वतंत्रता बिल, जो रियासतों, एक विकल्प में के लिए दबाव था की किसी भी करने के लिए डोमिनियन स्थिति की संभावना की पेशकश नहीं देखा था, उनके के नेतृत्व में दिल्ली में एक प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया के  अहमद सैयद छतरी नवाब वायसराय, बर्मा के लॉर्ड माउंटबेटन को पूरा करने के लिए 17 अगस्त 1947 नवाब माउंटबेटन को पत्र लिखकर  हैदराबाद के भविष्य पर बातचीत में प्रवेश करने की इच्छा व्यक्त किया

अगस्त 1947 में सर वाल्टर Monckton, निजाम और अहमद सैयद छतरी के लिए एक संवैधानिक सलाहकार, निजाम, रजाकार और इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन द्वारा एक हमले से प्रेरित करने के लिए उन्होने इस्तीफा दे दिया है, लेकिन इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया।

27 अक्टूबर 1947 रजाकार और इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों, Monckton, नवाब, और सर सुल्तान अहमद के घरों में एक प्रदर्शन का मंचन किया, यह असंभव उन्हें दिल्ली के रूप में उद्देश्य के लिए रवाना होने के लिए कर रही है और 1 नवंबर को अहमद सैयद छतरी के नवाब उनकी स्थिति असहनीय खोजने, कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया।

21 दिसंबर 1947, गांधी अहमद सैयद छतरी के नवाब एच एस सुहरावर्दी बृजलाल नेहरू, रमेश्वारी नेहरू शेख अब्दुल्ला, बेगम अब्दुल्ला, डॉ सैफुद्डीन किचल्यू, बख्शी गुलाम मोहम्मद, कच्छ के राजकुमार, भावनगर, पट्टानी और Anantrai के महाराजा के साथ वार्ता दूसरों 23 सितंबर 1948 को हुई।

और मुहम्मद अहमद सैयद छतारी नवाब साहब की मृत्यु 1982 में हो गई.


नोट- ये सभी जानकारी सरकारी दस्तावेज़ों के आधार पर है...!

Thursday, 12 November 2020

फिर भी बदनाम इस्लाम क्यूं...?

दोस्तों एक बड़ा सवाल आज आपके साथ देश और दुनियां के उन लोगों के सामने है जो सिर्फ़ ज़ुबानी तौर पर इस्लाम पर इल्ज़ाम लगाते हैं, ये जानकारी हर उस आदमी के पास होनी चाहिए जो  अहिंसा मैं विश्वास रखता है, जैसे मुस्लिमों और इस्लाम को आतंकवादी कहा जाता है जबकि दुनियां मैं सबसे बड़ा आतंकवाद हिरोशिमा और नागासाक़ी था, अब आते है ऐसे मुल्कों पर जहां हर तरहां का जुर्म आसमान को छू रहा है मगर बदनाम मुस्लमान और इस्लाम को किया जाता है क्यूं...?

*दुनिया में वेश्यावृत्ति की उच्चतम दर वाले 10 देश.*
  1. थाईलैंड (बुद्ध)
  2. डेनमार्क (ईसाई)
  3. इतालवी (ईसाई)
  4. जर्मन (ईसाई)
  5. फ्रेंच (ईसाई)
  6. नॉर्वे (क्रिस्टन)
  7. बेल्जियम (ईसाई)
  8. स्पेनिश (ईसाई)
  9. यूनाइटेड किंगडम (ईसाई)
  10. फ़िनलैंड (ईसाई)
<iframe width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/XQ9MYrphEI4?start=4" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe>

  *दुनिया के सबसे ज्यादा डकैती दर वाले 10 देश.*
  10. डेनमार्क और फिनलैंड (ईसाई)
  9. जिम्बाब्वे (क्रिस्टन)
  8. ऑस्ट्रेलिया (क्रिस्टन)
  7. कनाडा (ईसाई)
  6. न्यूजीलैंड (ईसाई)
  5. भारत (हिंदू)
  4. इंग्लैंड और वेल्स (ईसाई)
  3. संयुक्त राज्य अमेरिका (ईसाई)
  2. स्वीडन (क्रिस्टन)
  1. दक्षिण अफ्रीका (ईसाई)

  *दुनिया में सबसे ज्यादा शराब की लत वाले देश.*
  1) मोल्दोवा (क्रिस्टन)
  2) बेलारूसी (ईसाई)
  3) लेथुआनिया (ईसाई)
  4) रूस (क्रिस्टन)
  5) चेक गणराज्य (ईसाई)
  6) यूक्रेनी (ईसाई)
  7) अंडोरा (ईसाई)
  Christian रोमानियाई (ईसाई)
  9) सर्बियाई (ईसाई)
  10) ऑस्ट्रेलिया (ईसाई)

  *दुनिया में सबसे अधिक हत्या दर के साथ है.*
  1. होंडुरास (ईसाई)
  2. वेनेजुएला (ईसाई)
  3 बेलीज (ईसाई)
  4 अल सवडोर (ईसाई)
  5 गीतामाला (ईसाई)

  *दुनिया में सबसे खतरनाक गैंगस्टरवाद का.*
  1 यक़ुज़ा (गैर मुस्लिम)
  2 एगबरोस (ईसाई)
  3 वाह Cing (ईसाई)
  4 जमैका पॉज़ (ईसाई)
  5 प्रायरियो (ईसाई)
  6 आर्यन ब्रदरहुड (क्रिस्टन)
  7 रक्त (क्रिस्टन)
  8 18 वीं स्ट्रीट गैंग (क्रिस्टन)
  9 द मुंगिकी (ईसाई)
  10 मारा साल्वारुचा (ईसाई)

  *दुनिया में ड्रग कार्टेल्स के बड़े नाम.*
  1 पाब्लो एस्कोबार-कोलंबिया (ईसाई)
  2 Amado carello-Columbia (क्रिस्टन)
  3 कार्लोस लेहदर-जर्मन (ईसाई)
  4 ग्रिसेल्दा ब्लैंको-कोलंबिया (ईसाई)
  5 जोकिन गुज़मैन-मेक्सिको (क्रिस्टन)
  6 राफेल कारो- मेक्सिको (क्रिस्टन)

  *फिर भी दुनियां मैं इस्लाम को हिंसा का कारण क्यों कहा जाता है, अगर किसी के पास इस सवाल कि जवाब है तब हमको ज़रूर बतायें, ये सभी जानकारी दुनियां के देशों के बारे मैं गूगल से ली गई हैं, इन जानकारियों को दुनियां का हर देश अपने यहां जुर्म के आधार पर सरकारी आंकड़ों मैं दर्ज करता है...?*

न्यूज़ पोर्टल और नये नियम कानून क्या हैं आईये जानते हैं...?

"एस एम फ़रीद भारतीय"
दोस्तों सुना ही होगा डॉटा सस्ता और आटा महंगा, मगर इसी डॉटा से आटा कमाया जा सकता है कैसे यही आज हम आपको बतायेंगे ही नहीं बल्कि अगर आप हमारी मदद लेना चाहेंगे तब हम पूरी ईमानदारी से आपकी मदद भी करेंगे, तो चलिए आगे बढ़ते हैं.
जब से भारत में जिओ (Jio) आया है तभी से भारत मैं  सस्ती इंटरनेट सेवा (Internet) शुरू हो चुकी है, या यूं कहें कि नेट क्रांति के बाद से इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या में अचानक से भारी मात्रा में वृद्धि हुई है, अब पहले की तुलना में और भी अधिक लोग इंटरनेट से रूबरू हो चुके है, बड़े-२ शहरों की बात को तो छोड़िये अब तो गांव कस्बे और गली मुहल्ले के लोगो के लिए भी इंटरनेट बड़ी ही आसान और सस्ती चीज़ हो गई है.

अगर सच माने तो एक कंपनी के आंकलन के मुताबिक 2025 में भारत में इंटरनेट उपभोगताओं (Internet Users) की संख्या लगभग 10 करोड़ 10 लाख (110 Million) होने वाली है.

अगर हम बताये जा रहे आंकड़ों की माने तो भारत ही नहीं दुनियां मैं इंटरनेट पर लोग सबसे अधिक समय समाचार पढ़ने, देखने के लिए बीताते है, ऐसे में जो भी लोग समाचार तथा इस इंडस्ट्री (News Industry) से जुड़े है उन्हें काफी अधिक फायदा हो रहा है, लोगों को मनचाही ख़बर आसानी से मिल जाती है.

हर दिन समाचार वाली वेबसाइट (Website) पर आने वाले लोगो की संख्या बढ़ते ही जा रही है, ऐसे में जो भी लोग न्यूज़ वेबसाइट (News Website / News Portal) चला रहे है इससे काफी अच्छी कमाई भी कर रहे है। तो आइये समझते है की आखिर न्यूज़ पोर्टल (News Portal) क्या होता है?  और न्यूज़ पोर्टल से किस तरह से कमाई की जा सकती है? (News Portal Earning).

न्यूज़ पोर्टल क्या होता है? News Portal Kya Hota Hai...?
न्यूज़ पोर्टल (news portal) एक खास तरह की वेबसाइट होती है जहां पर आप किसी भी तरहां के छोटे बड़े समाचार (ख़बरों) को पढ़ते है, दूसरे शब्दों में कहे तो जो वेबसाइट नियमित तरीके से ताजा ख़बरों और समाचारों से आपको अवगत कराने के लिए सोशल मीडिया यानि इंटरनेट पर प्रकाशित (publish) करते हैं, उसे सरल भाषा मैं कहें या देहाती भाषा मैं, लोग न्यूज़ पोर्टल (news portal) कहते हैं.

अगर आप इंटरनेट पर समाचार पढ़ते होंगे तो आपको नीचे दिए गए किसी ने किसी न्यूज़ पोर्टल से सामना जरूर हुआ होगा, सीधे शब्दों में कहते तो आज हर टीवी चैनल, समाचार पत्र अपना न्यूज़ पोर्टल चला रही है और उसके माध्यम से पाठकों तक लेटेस्ट अपडेट (latest update) पंहुचा रही है।

न्यूज़ पोर्टल के उदहारण हैं...?
https://www.nbtvindia.in 
या अन्य कोई और वेबसाइट.

न्यूज़ पोर्टल से कमाई कैसे होती है...? 
(News Portal Earning)
एक न्यूज़ पोर्टल को शुरू (Start a News Portal) करने के बाद आप कई तरीकों से कमाई कर सकते है, हालाँकि न्यूज़ पोर्टल से कमाई करने में जो सबसे अधिक प्रचलित तरीका है वह है विज्ञापन (Advertisements) के जरिए ही है.

यानि आपके वेब पोर्टल पर ख़बरों के बीच में विज्ञापन (Ads) होगा जिसके माध्यम से आप कमाई कर सकते है, लेकिन अब यह प्रश्न उठता है की आखिर न्यूज़ पोर्टल पर विज्ञापन देगा कौन, ये आयेगा कहां से...?

इस सवाल का जवाब है, विज्ञापन एजेंसी (Ad Agency) से, जैसे आप नेट पर अपनी वेबसाइट बनाकर ख़बरों से नाम व पैसा कमाना चाहते हैं ऐसे ही बहुत से लोग इंटरनेट पर बहुत सी ऐसी विज्ञापन एजेंसी बनाकर पैसा कमा रहे हैं जो इस फ़ील्ड के माहिर हैं, वही आपकी मदद करेंगे, वही आपके न्यूज़ पोर्टल पर पाठकों की संख्या (Traffic) के आधार पर आपको विज्ञापन (advertisements) दिलायेंगे, बस आपको ज़रूरत है अपने समाचार और ख़बरों से अपने पोर्टल पर भीड़ को लाना यानि देखने सुनने वालों को जमा करना.

इसके साथ ही दूसरा तरीका यह भी है कि आप खुद अपने शहर, कस्बे, गांव व ज़िले की विभिन्न कम्पनियों व अलग-२ तरह के छोटे बड़े दुकानों से विज्ञापन लेकर अपने पोर्टल की ख़बरों के बीच लगा सकते है.

विज्ञापन के अलावे भी न्यूज़ पोर्टल से कमाई करने के कई तरीके है जिसमे एफिलिएट मार्केटिंग (Affiliate Marketing) अदि शामिल है.

अब सवाल है कि आप न्यूज़ पोर्टल कैसे शुरू करे...? Start News Portal, न्यूज़ पोर्टल को शुरू करने के लिए कई तरह की मूलभूत जरूरते है जिसे आपको पूरा करना होता है, सबसे पहले बजट और ख़ुद को पत्रकारिता का ज्ञान होना ज़रूरी है.

अभी से डरिए मत ये सभी जरूरते काफी साधारण है...!
सबसे पहले तो आपको पत्रकारिता के ज्ञान के साथ अपने आसपास की ख़बरों से अपडेट रहना होगा, यानि सही ख़बरों को जानना और समझना होगा, जिस भी तरह का न्यूज़ वेबसाइट या पोर्टल आप शुरू करेंगे उस क्षेत्र से जुड़ी हर छोटी बड़ी ख़बर के बारे में आपको पता होनी चाहिए, साथ ही ख़बर की सच्चाई और ईमानदारी ही आपको पत्रकारिता मैं यक़ीन और विश्वास के काबिल बनाती है.

लिहाज़ा इसके लिए आपकी लेखनी अच्छी होनी चाहिए, जिससे आप ऐसा लिख सके जो आपके पाठकों के बहुत आसानी से समझ मैं आ सकें, आपको पत्रकारिता के मूल सिद्धांत और नियमों की जानकारी भी होना ज़रूरी है, इसी के साथ आपको कंप्यूटर और इंटरनेट के बारे में आम लोगों से थोड़ी अधिक जानकारी होनी चाहिए, लेकिन यहां आप किसी को आप पत्रकार के रूप मैं नियुक्त नहीं कर सकते हैं ये सोचने का विषय है.

क्यूं भागीदार नहीं कर सकते तब आईये ये भी आपको बताते हैं...?
मान लो आप अगर किसी बस मैं मुफ़्त की सवारी कर रहे हैं तब क्या आप उस बस की बाकी सवारियों से पैसा वसूल कर सकते हैं, जिसमें आप ख़ुद मुफ़्त सवारी कर रहे हैं...?

नहीं कर सकते सही कहा ना, ऐसे ही अगर आप किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर फ़्री मै अपने लेख, समाचार या कोई वीडियो बनाकर डाल रहे हैं तब आप अपने किसी दोस्त साथी भाई या भारत देश के नागरिक को अपने लिए कैसे काम करने वाला यानि पत्रकार नियुक्त कर सकते हैं, ये ग़ैर कानूनी और ठगी माना जायेगा...?

इसके अलावा अगर आप एक डोमेन लेकर एक छोटी सी वेबसाइट बना भी लेते हैं तब भी आप उसूलों को हिसाब से सही से पत्रकारिता को नियम के साथ देश के संविधान को नहीं समझ रहे हैं, क्यूंकि हर नागरिक आपकी तरहां आज़ाद है, जब तक उसकी मर्ज़ी ना हो तब तक आप उसे अपने से छोटा सहभागी नहीं बना सकते, वो भी सोशल नेटवर्किंग साइट पर, जैसा कि अधिकतर लोग कर रहे हैं, वो एक छोटी सी वेबसाइट बनाकर ख़ुद को सम्पादक के साथ ना जाने क्या क्या समझने लगते हैं और पत्रकार बनाने की घोषणा भी करते रहते हैं, ये सब भी ग़ैर कानूनी और ठगी मैं ही आता है.

न्यूज़ पोर्टल शुरू करने में कितना खर्च लगता है...?
कहने को आप न्यूज़ पोर्टल को बिना एक पैसे खर्च किए भी शुरू किया जा सकता है जैसे यूट्यूब पर, फ़ेसबुक पर या फिर किसी और सोशल नेटवर्किंग साइट पर, लेकिन अगर आप डोमेन और होस्टिंग लेते है तो कुछ खर्च जरूर आता है, शुरुआती दौर में यह खर्च 5 हजार सालाना से भी कम होता है, मगर असल मैं ये न्यूज़ पोर्टल नहीं न्यूज़ की वेबसाइट होती है, मगर इसी को अधिकतर लोग पोर्टल कहते भी और समझते भी हैं लेकिन हम आपको समझाते हैं फ़र्क क्या है.

दोस्तों असल मैं न्यूज़ पोर्टल एक तरहां से सैटेलाइट चैनल का छोटा रूप है, जैसे न्यूज़ चैनल का बजट आठ करोड़ से लेकर बीस करोड़ है, ऐसे ही असल न्यूज़ पोर्टल का बजट भी पचास लाख से दो करोड़ के बीच होता है, बस फ़र्क इतना है कि सेटेलाइट चैनल आपके घर मैं टीवी पर बिना नेट के चलता है, जबकि न्यूज़ पोर्टल इन्टरनेट के साथ मोबाइल, टीवी या कम्प्यूटर पर भी देखा जा सकता है, जिसको एक हैवी या मध्यम नेट सर्वर के साथ प्रसारित किया जाता है, यही असल मैं न्यूज़ पोर्टल होता है इसके लिए आपके पास अपनी एक कम्प्लीट वेबसाइट और मध्यम वेब सर्वर तो ज़रूर होना चाहिए, जिसपर आपकी ख़बर बिना किसी सहारे के अपलोड की जा सके, जबकि छोटी वेबसाइट वालों को बाकी सोशल नेटवर्किंग साइटों का सहारा लेना पड़ता है, ये न्यूज़ पोर्टल नहीं कही जा सकती.

अगर आपको अपना ख़ुद ता नेटवर्क खड़ा करना है और पत्रकारों की टीम के साथ बिजनेस की टीम भी बनानी है तब आपको सही मैं मध्यम सर्वर के साथ वेब पोर्टल बनाना चाहिए, इसके लिए सबसे पहला रास्ता अपनी एक अच्छी वेबसाइट के साथ एक अच्छा वेब सर्वर होना ज़रूरी है, शुरू मैं आप छोटे सर्वर से काम चला सकते हैं मगर बढ़ती जिसको वीवर्स और ट्रेफ़िक भी कहा जाता है,  जिसके बढ़ने के साथ ही आपको अपने इस सर्वर को भी बड़ा और मज़बूत करना होगा, तब आप बाकी सोशल नेटवर्किंग साइटों का सहारा अपने विस्तार यानि ट्रेफ़िक भीड़ बढ़ाने के लिए ले सकते हैं.

 दोस्तों अगर आपके अंदर भी ऊपर दिए गए कुछ मूलभूत गुण और बजट है तब आप भी एक कामयाब कमाई वाला न्यूज़ पोर्टल शुरू करके घर बैठे पैसे कमा सकते है और अपने पाठकों के बीच समाचार और ज्ञान की परंपरा का विस्तार कर सकते है, जो समाचारपत्र या पत्ररिकाओं से बेहतर और कम मेहनत वाला है, अगर आप कोई  पत्रिका निकालते हैं तब आपको बड़ी मेहनत करनी होगी इसे छापने से लेकर बेचने तक, जो बहुत मुश्किल काम है, क्यूंकि पत्रिका वही बिकेगी जिसकी ख़बरें दमदार होंगी वरना आपको घर से पैसा लगाना होगा, जबकि न्यूज़ पोर्टल मैं बस आपको दिमाग के साथ एक जगह मेहनत करनी होगी.

न्यूज़ पोर्टल कैसे शुरू करे...?
अगर आप न्यूज़ पोर्टल शुरू करना चाहते है तो आप हमारे फ़ोन नंबर 9808123436 पर संपर्क कर पूरी जानकारी ले सकते है.

सवाल क्या न्यूज़ पोर्टल का रजिस्ट्रेशन करना होता है...?

जी अभी तक भारत में न्यूज़ पोर्टल को रजिस्टर करने के लिए कोई मज़बूत नियम कानून मौजूद नहीं था, ऐसे में लोगों ने बिना किसी रजिस्ट्रेशन के आराम से न्यूज़ पोर्टल चलाये हैं, लेकिन आज ही केंद्र सरकार ने कानून बनाया है, लेकिन अभी पूरे नियम कानून तय नहीं हुए हैं, लिहाज़ा फिर भी पत्रकारिता के नियम व कानूनों के साथ भारतीय संविधान का अध्ययन ज़रूर कर लें, वरना ऐसा ना हो आप किसी मुसीबत या परेशानी मैं घिर जायें.

नया नियम कानून 2020 क्या है...?
सरकार अब ऑनलाइन न्यूज प्लेटफॉर्म्स और कंटेंट प्रोवाइडर्स को ‘सूचना-प्रसारण मंत्रालय’ (MIB) के दायरे में ले आई है। इसके लिए सरकार की ओर से अधिसूचना जारी कर दी गई है। नौ नवंबर को जारी इस अधिसूचना के अनुसार, राष्ट्रपति ने वेब फिल्म्स, डिजिटल न्यूज और करेंट अफेयर्स कंटेंट को सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन लाने के आदेश को मंजूरी दे दी है.

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में एक मामले में वकालत की थी कि ऑनलाइन माध्यमों का नियमन (Regulation of Digital Media) टीवी से ज्यादा जरूरी है। अब सरकार ने ऑनलाइन फिल्मों के साथ ऑडियो-विजुअल कार्यक्रम, ऑनलाइन समाचार और करंट अफेयर्स के कंटेंट को सूचना प्रसारण मंत्रालय के तहत लाने का कदम उठाया है।

इस बारे में सरकार की ओर से जारी अधिसूचना को आप यहां पढ़ सकते हैं.


आपको ये जानकारी कैसी लगी हमको ज़रूर बतायें, हमें आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा...!

Monday, 2 November 2020

नया समाचारपत्र या पत्रिका शुरू करने के लिए क्या करें...?

यहां बताया जा रहा है कि आप कैसे शुरू करें अपना नया समाचार पत्र...?

"एस एरम फ़रीद भारतीय"
अकसर लोगों के पास यह जानकारी नहीं होती है कि नया समाचारपत्र या पत्रिका निकालते वक़्त करना क्या चाहिए. कृपया एक बार पढ़कर या इसे कापी करके ना रखें बल्कि लगातार इसके अपडेट्स सरकारी ऑफिसियल वेबसाईट http://www.rni.nic.in पर देखते रहें ताकि आप बदलते नियमों से भी परिचित हो सकें.

इस जानकारी देने का मक़सद आपको उन दलालों से भी दूर रखना है जो आपको आरएनआई के नाम पर ठगते हैं, आपको बता दें आरएनआई समाचारपत्र या पत्रिका के रेजिस्ट्रेशन के लिए ना तो कोई फ़ीस लेता है और ना ही आप वहां बिना समय लिए मिलने जा सकते हैं, क्यूंकि आरएनआई बाकी सरकारी कार्यालयों से अलग या यूं समझें जैसे पासपोर्ट कार्यालय का काम होता है ठीक इसी तरहां या इससे भी अधिक नियमों का पालन करता है, आरएनआई की चेतावनी के बाद भी अकसर सुनने को मिलता है कि समाचारपत्रों के नामांकन के पर ठगी की जा रही है, लिहाज़ा ऐसे लोगों से सावधान ही ना रहें, बल्कि इसकी सूचना आरएनआई के अधिकारियों को या हमको दें हम उनकी शिकायत आरएनआई से करेंगे.


1. रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया के पूर्व यदि किसी भी प्रकार का प्रकाशन किया जाता है तो वह न केवल अवैध होगा बल्कि कलेक्टर या कलेक्टर द्वारा अधिकृत एडीशनल कलेक्टर या एसडीएम को यह अधिकार होगा कि वह उसके मुद्रक, प्रकाशक एवं संपादक के खिलाफ संवैधानिक कार्रवाई करे एवं संबंधित प्रकाशन तत्काल प्रभाव से बंद कराकर बाजार में उपलब्ध उसकी सभी प्रतियां जब्त कर ले. बिना रजिस्ट्रेशन के किसी भी प्रकार का प्रकाशन अवैध माना जाएगा, चाहे वह किसी समाज की सामाजिक पत्रिका हो या किसी स्कूल की वार्षिक स्मारिका. इस श्रेणी में वे पर्चे भी आ जाते हैं जो दुकानदार भाईयों या नेताओं द्वारा अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए छपवाए जाते हैं. मजिस्ट्रेट उनके खिलाफ कार्रवाई संपादित कर सकते हैं.

2. भारत में छपने तथा प्रकाशि‍त होने वाले समाचारपत्र एवं आवधि‍क प्रेस एवं पुस्‍तक पंजीकरण अधि‍नि‍यम, 1867 तथा समाचारपत्रों के पंजीकरण(केन्‍द्रीय) नि‍यम, 1956 द्वारा नि‍यंत्रि‍त होते हैं। अधि‍नि‍यम के अनुसार, कि‍सी भी समाचार पत्र अथवा आवधि‍क का शीर्षक उसी भाषा या उसी राज्‍य में पहले से प्रकाशि‍त हो रहे कि‍सी अन्‍य समाचारपत्र या आवधि‍क के समान या मि‍लता‑जुलता न हो, जब तक कि‍ उस शीर्षक का स्‍वामि‍त्‍व उसी व्‍यक्‍ति‍ के पास न हो ।

इस शर्त के अनुपालन को सुनि‍श्‍चि‍त करने के लि‍ए, भारत सरकार ने समाचारपत्रों का पंजीयक नि‍युक्‍त कि‍या है, जि‍न्‍हें प्रेस पंजीयक भी कहा जाता है, जो भारत में प्रकाशि‍त होने वाले समाचारपत्रों एवं आवधि‍कों की पंजि‍का का रख‑ रखाव करते हैं। भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का कार्यालय का मुख्‍यालय नई दि‍ल्‍ली में है तथा देश के सभी क्षेत्रों की जरूरतों को पूरा करने के लि‍ए कोलकाता,मुंबई तथा चेन्‍नई में तीन क्षेत्रीय कार्यालय भी हैं। कार्यालयों के पते एवं कार्यक्षेत्र के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र नि‍म्‍नानुसार हैं?

आर.एन.आई. के वि‍भि‍न्‍न कार्यालयों के पता

भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का कार्यालय,
1. मुख्‍यालय,
पश्‍चि‍मी खंड‑8, स्‍कंध‑2,
आर.के.पुरम,नई दि‍ल्‍ली‑110066

2. भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का क्षेत्रीय कार्यालय,

    एम.एस.ओ.भवन,बलॉक डी एफ

   द्वि‍तीय तल , पो0 सी.सी.ब्‍लॉक,
सॉल्‍ट लेक,कोलकाता‑700064

3. भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का क्षेत्रीय कार्यालय,
ए‑1,वि‍गं,नि‍चला तल, नया सी.जी.ओ.कॉम्‍पलेक्‍स,
सी.बी.डी,बेलापुर, नवी मुंबई‑400614

4. भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का क्षेत्रीय कार्यालय,
बी‑ ब्‍लाक,बी स्‍कंध, (बी‑2‑बी) सी.जी.ओ.कॉम्‍पलेक्‍स
राजाजी भवन, बेसंत नगर,चेन्‍नई‑600090

प्रेस एवं पुस्‍तक पंजीकरण अधि‍नि‍यम के अनुसार, मुद्रक एवं प्रकाशक को जि‍ला/महाप्रांत/उप‑प्रखण्‍ड दण्‍डाधि‍कारी के समक्ष घोषणा करनी होती है, जि‍सके स्‍थानीय अधि‍कारक्षेत्र के अधीन समाचारपत्र मुद्रि‍त अथवा प्रकाशि‍त कि‍या जाएगा, कि‍ वह उक्‍त समाचारपत्र का मुद्रक/प्रकाशक है।

घोषणा पत्र में समाचारपत्र संबंधी सभी वि‍वरण शामि‍ल होने चाहि‍ए, जैसे कि‍ कि‍स भाषा में प्रकाशि‍त होगा, प्रकाशन का स्‍थान इत्‍यादि‍। समाचारपत्र के प्रकाशन से पहले दण्‍डाधि‍कारी द्वारा घोषणा पत्र को अधि‍प्रमाणि‍त कि‍या जाना चाहि‍ए।

अधि‍प्रमाणन से पहले, दण्‍डाधि‍कारी समाचारपत्रों के पंजीयक से छानबीन करने के बाद यह पुष्‍टि‍ करता है कि‍ प्रेस एवं पुस्‍तक पंजीकरण अधि‍नि‍यम की धारा 6 में उल्‍लि‍खि‍त शर्तों का पालन हो रहा है।

समाचार पत्र का पंजीकरण

समाचार पत्र के प्रथम अंक के प्रकाशन के बाद, आर.एन.आई. से समाचारपत्र को पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी करने का अनुरोध अवश्‍य कि‍या जाना चाहि‍ए । समाचार पत्रों/पत्रि‍काओं के पंजीकरण के लि‍ए जांच सूची/दि‍शा नि‍र्देश नि‍म्‍नलि‍खि‍त हैं :

1. आवश्‍यक दस्‍तावेज
(क) आर.एन.आई. द्वारा जारी शीर्षक सत्‍यापन पत्र की फोटोकापी ।
(ख) डी.एम./ए.डी एम/डी सी पी/सी एम एम/एस डी एम द्वारा प्रपत्र‑। में नि‍र्दिष्‍ट(देखें नि‍यम‑3) प्रमाणीकृत घोषणा की सत्‍यापि‍त प्रति‍ ।
(ग) प्रथम अंक में खंड‑1 और अंक­‑1 का उल्‍लेख करें !
(घ) नि‍र्धारि‍त प्रपत्र में ‘ कोई वि‍देशी बंधन नहीं ‘ के लि‍ए प्रकाशक का शपथ पत्र(देखें परि‍शि‍ष्‍ट‑IV) ।
2. यदि‍ मुद्रक और प्रकाशक भि‍न्‍न हों तो अलग घोषणा दाखि‍ल करनी होगी ।
3. प्रथम अंक में स्‍पष्‍ट रूप से खंड‑। और अंक‑1, दि‍नांक‑रेखा,पृष्‍ठसंख्‍या और प्रकाशन के शीर्षक का उल्‍लेख होना चाहि‍ए ।
4. घोषणा के प्रमाणीकरण की ति‍थि‍ से छह सप्‍ताह की अवधि‍ के भीतर (दैनिक‍/साप्‍ताहि‍क के लि‍ए) और तीन महीने के भीतर(अन्‍य अवधि‍यों वाले प्रकाशनों के लि‍ए) प्रकाशन प्रकाशि‍त हो जाना चाहि‍ए ।
5. इंम्‍प्रिं‍ट लाइन में(क) प्रकाशक का नाम(ख) मुद्रक का नाम,(ग) स्‍वामी का नाम,(घ) मुद्रणालय का नाम व पूरा पता,(ड.) प्रकाशन का स्‍थान व पता,और (च) सम्‍पादक का नाम शामि‍ल होना चाहि‍ए ।
2.11.2 यदि‍ उचि‍त जांच पड़ताल के पश्‍चात आवेदन संतोषजनक पाया जाता है तो प्रेस पंजीयक अपने यहां रखे गए रजि‍स्‍टर में समाचार पत्र के वि‍वरण दर्ज करेगा और प्रकाशक को पंजीकरण प्रमाण पत्र जारी करेगा ।
2.11 नई घोषणा करने पर नया/संशोधि‍त प्रमाण पत्र ले लें
2.12.1 जब भी कभी पैरा 2.6.1 के (क) से (ज) में उल्‍लि‍खि‍त परि‍स्‍थि‍ति‍यों में नई घोषणा की जाती है, तो संशोधि‍त पंजीकरण प्रमाण पत्र के लि‍ए प्रेस पंजीयक को आवेदन करना आवश्‍यक होगा । लेकि‍न यदि‍ नई घोषणा पैरा 2.6.1 के (झ) से (ड) में उल्‍लि‍खि‍त परि‍स्‍थि‍ति‍यों के अंतर्गत की गई हो तो संशोधि‍त प्रमाणपत्र जरूरी नहीं होगा ।

आवश्‍यक दस्‍तावेज नि‍म्‍नानुसार हैं :

(क) सम्‍बद्द मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा प्रमाणीकृत नई घोषणा की सत्‍यापि‍त फोटोकापी, जि‍समें परि‍वर्तन(परि‍वर्तनों) का उल्‍लेख होगा ।
(ख) प्रकाशन के नवीनतम अंक की प्रति‍, जि‍समें सही इम्‍प्रिं‍ट लाइन,प्रकाशन का नाम तथा दि‍नांक रेखा हर पृष्‍ठ पर मुद्रि‍त हो ।
(ग) आर.एन.आई. कार्यालय द्वारा जारी मूल पंजीकरण प्रमाणपत्र ।
(घ) यदि‍ मूल पंजीकरण प्रमाणपत्र खो गया हो, नष्‍ट हो गया हो, चोरी चला गया हो, तो मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा हस्‍ताक्षरि‍त शपथपत्र तथा उसके साथ आर.एन.आई. के नाम पर 5 रूपए का भारतीय पोस्‍टल आर्डर देना होगा।
(ड.) स्‍वामि‍त्‍व के परि‍वर्तन की स्‍थि‍ति‍ में सम्‍बद्द मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा प्रमाणीकृत स्‍वामि‍त्‍व सम्‍बन्‍धी अंतरण‑पत्र (ट्रांसफर डीड) की सत्‍यापि‍त फोटोकापी भी प्रस्‍तुत करनी होगी ।
(च) प्रकाशन के शीर्षक/भाषा के परि‍वर्तन की स्‍थि‍ति‍ में शीर्षक सत्‍यापन पत्र की एक प्रति‍ प्रस्‍तुत करनी होगी ।
2.13 प्रमाण पत्र खो गया है ? डुप्‍लि‍केट प्रमाण पत्र ले लें
2.13.1 जब मूल पंजीकरण प्रमाण पत्र खो जाए या खराब हो जाए या चोरी चला जाए तथा ऐसी परि‍स्‍थि‍ति‍ न हो, जि‍समें ऊपर बताए अनुसार नई घोषणा की जा सकती हो तो डुप्‍लीकेट पंजीकरण प्रमाण पत्र जारी करने के लि‍ए प्रेस पंजीयक को आवेदन दि‍या जा सकता है, जि‍सके साथ एक अलग पृष्‍ठ पर पूरा वि‍वरण देना होगा । कृपया ध्‍यान रखें यदि‍ प्रमाण पत्र खो गया है या चोरी चला गया है, तो पुलि‍स द्वारा दर्ज की गई प्राथमि‍की की एक प्रति‍ या पुलि‍स की मुहर लगी शि‍कायत की एक प्रति‍ जैसा पर्याप्‍त दस्‍तावेजी सबूत प्रस्‍तुत करना जरूरी होगा , जो दर्शाए कि‍ मामला सम्‍बद्द पुलि‍स अधि‍कारि‍यों को सूचि‍त कर दि‍या गया है।

वांछि‍त दस्‍तावेज नि‍म्‍नानुसार हैं:

(क) नोटरी या सम्‍बद्द मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा उसके हस्‍ताक्षर व कार्यालय मुहर के साथ प्रमाणीकृत इस आशय का एक शपथपत्र ।
(ख) सम्‍बद्द मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा प्रमाणीकृत नवीनतम घोषणा की सत्‍यापि‍त फोटोकापी ।
(ग) सही इम्‍प्रिं‍ट लाइन सहि‍त प्रकाशन के नवीनतम अंक की एक प्रति‍ 1
(घ) आर.एन.आई. के नाम पर 5 रूपए का भारतीय पोस्‍टल आर्डर ।
(ड.) ‘ कोई वि‍देशी बंधन नहीं ‘ के लि‍ए एक शपथ पत्र (देखें परि‍शि‍ष्‍ट‑।V) प्रकाशक द्वारा भेजी जाने वाली
नि‍यत कालि‍क सूचना/रि‍टर्न 1. प्रपत्र ‑II में वार्षि‍क वि‍वरण (देखें नि‍यम 6(i)
2. प्रपत्र‑IV में समाचारपत्र के स्‍वामि‍त्‍व का तथा अन्‍य वि‍वरण(देखें नि‍यम 8)
3. परि‍शि‍ष्‍ट‑ VIII के अनुसार दैनि‍क प्रेस का वि‍वरण
4. आयाति‍त अखबारी कागज का इस्‍तेमाल करने वाले प्रकाशक को परि‍शि‍ष्‍ट IX के अनुसार आयाति‍त अखबारी कागज की खरीद और खपत के बारे में भी रि‍टर्न भरनी होगी ।

3.1 अखबारी कागज़

3.1.1 इनमें से एक भारत सरकार की अखबारी कागज की नीति‍ के बारे में है । सरकार की वर्तमान नीति‍ इस प्रकार है:
क) अखबारी कागज के वार्षि‍क स्‍वदेशी उत्‍पादन का कम से कम एक ति‍हाई हि‍स्‍सा,छोटे और
मझौले समाचारपत्रों के लि‍ए आरक्षि‍त रखा जाएगा ।
ख) वास्‍तवि‍क उपभोक्‍ताओं को अखबारी कागज के आयात की अनुमति‍ है 1
3.1.2 छोटे या मझौले ? आपको स्‍वदेशी अखबारी कागज मि‍ल सकता है
3.1.3 अखबारी कागज नीति‍ के उदेश्‍य के लि‍ए, उन समाचार पत्रों को छोटा और मझौला समाचारपत्र माना गया है, जि‍नकी अखबारी कागज की वार्षि‍क खपत 200 मीटरी टन से अधि‍क नहीं है । वर्तमान में स्‍वदेशी अखबारी कागज प्राय: उपलब्‍ध है तथा छोटे व मझौले समाचार पत्रों को इस सम्‍बन्‍ध में कोई समस्‍या नहीं होगी । फि‍र भी, यदि‍ आवश्‍यक हो, तो इस श्रेणी के समाचार पत्र,आर.एन.आई. से ‘ पात्रता प्रमाण पत्र ‘ के लि‍ए आवेदन कर सकते हैं, जो परि‍शि‍ष्‍ट में दि‍ए गए प्रपत्र में दि‍या गया है जि‍सके आधार पर वे अनुसूचि‍त कागज कारखानों से स्‍वदेशी अखबारी कागज प्राप्‍त कर सकेंगे ।
3.1.4 पर्याप्‍त नहीं ? आप अखबारी कागज आयात कर सकते हैं
3.1.5 सरकार की वर्तमान नीति‍, वाणि‍ज्‍य मंत्रालय की अधि‍सूचना दि‍नांक 5.3.1997 तथा सूचना एवं प्रसारण
मंत्रालय की सार्वजनि‍क सूचना दि‍नांक 26‑3‑98 में प्रस्‍तुत की गई है । इसके अनुसार प्रत्‍येक पंजीकृत समाचार पत्र अखबारी कागज का आयात कर सकता है । इसके लि‍ए, समाचार पत्र के प्रकाशक/स्‍वामी को समाचार पत्र के पंजीयन प्रमाण पत्र को आर.एन.आई. से प्रमाणीकृत कराना होगा, जि‍सके आधार पर आयात की अनुमति‍ प्रदान की जाएगी । इस प्रयोजन के लि‍ए परि‍शि‍ष्‍ट‑VI में दि‍ए गए प्रपत्रों में आवेदन दि‍ए जा सकते हैं । आवेदन के साथ (क) समाचारपत्र के नवीनतम पंजीकरण प्रमाणपत्र की दो प्रति‍यां (ख) पि‍छले कैलेंडर वर्ष के लि‍ए वार्षि‍क वि‍वरण की सत्‍यापि‍त प्रति‍, और (ग)आवेदन की ति‍थि‍ से पि‍छले 12 महीनों के प्रत्‍येक महीने के लि‍ए एक‑एक नमूना अंक भेजने होंगे । लेकि‍न उन समाचारपत्रों को जि‍नकी शुरूआत और पंजीकरण के बाद एक वर्ष पूरा न हुआ हो,उन्‍हें ऊपर(ख)और(ग) में नि‍र्दि‍ष्‍ट दस्‍तावेज भेजने की आवश्‍यकता नहीं है । ऐसे मामलों में (क) में नि‍र्दि‍ष्‍ट दस्‍तावेजों के अलावा,प्रकाशन के प्रत्‍येक पूर्ण महीने का नमूना अंक प्रस्‍तुत कि‍या जाना चाहि‍ए ।
4.2 वार्षि‍क वि‍वरण
प्रत्‍येक प्रकाशक को समाचार पत्र के बारे में एक वार्षि‍क वि‍वरण प्रेस पंजीयक को भेजना होगा । यह वि‍वरण, समाचार पत्र पंजीकरण(केन्‍द्रीय)नि‍यम,1956 की अनुसूची के प्रपत्र ।। में देना होगा । देखें नि‍यम 6(i) ।
4.2.2 कैलेंडर वर्ष के अनुसार भेजे जाने वाले यह वि‍वरण अगले वर्ष के फरवरी माह के अंति‍म दि‍वस
से पहले/तक पहुंच जाना चाहि‍ए ।
4.2.3 जहां समाचार पत्र की प्रसार संख्‍या,प्रति‍ प्रकाशन दि‍वस 2000 से अधि‍क हो, वहां वार्षि‍क वि‍वरण
के साथ नि‍र्धारि‍त प्रपत्र के नीचे खंड‑ख के अनुसार चार्टर्ड एकाऊटेंट या योग्‍यता प्राप्‍त लेखा परीक्षक का प्रमाण पत्र प्रस्‍तुत करना होगा ।
4.2.4 समय से वार्षि‍क वि‍वरण दाखि‍ल न करने पर पी आर बी अधि‍नि‍यम के अंतर्गत दंडात्‍मक कार्रवाई की जा सकती है ।
(टि‍प्‍पणी: प्रेस पंजीयक को हर वर्ष देश में समाचार पत्रों की स्‍थि‍ति‍ के बारे में एक रि‍पोर्ट सरकार को देनी
होती है ,जो प्राय: प्रकाशकों से प्राप्‍त वार्षि‍क वि‍वरण के आधार पर होती है । इसलि‍ए ,समाचार पत्र प्रकाशक,कृपया प्रपत्र ।। में अपने वार्षि‍क वि‍वरण की सम्‍पूर्ण व सही‑सही जानकारी दें (देखें नि‍यम 6(।) । दैनि‍क समाचारपत्रों द्वारा परि‍शि‍ष्‍ट‑VIII में दि‍ए अनुसार एक वि‍वरण भी देना होगा । )
4.3 स्‍वामि‍त्‍व वि‍वरण
4.3.1 प्रत्‍येक वर्ष फरवरी के अंति‍म दि‍न के बाद नि‍कलने वाले प्रथम अंक में समाचार पत्र के
स्‍वामि‍त्‍व तथा अन्‍य सम्‍बन्‍धि‍त वि‍वरण प्रकाशि‍त कि‍या जाना चाहि‍ए । वि‍वरण समाचार पत्र पंजीकरण(केन्‍द्रीय)नि‍यम,1956 की अनुसूची में दि‍ए गए प्रपत्र IV में देना होगा(देखें नि‍यम 8) ।
4.5 क्‍या आपने अखबारी कागज आयात कि‍या है ? रि‍टर्न भरि‍ए !!!
4.5.1 समाचार पत्र के प्रकाशक/स्‍वामी को 30 सि‍तम्‍बर को समाप्‍त छमाही की
अर्ध‑वार्षि‍क रि‍टर्न और 31 मार्च को समाप्‍त वर्ष की वार्षि‍क रि‍टर्न क्रमश: 31 अक्‍टूबर और 30 अप्रैल तक भेजनी होगी, जि‍समें सम्‍बद्व अवधि‍यों में खरीदी तथा उपयोग की गई आयाति‍त अखबारी कागज की मात्राएं दि‍खाई जाएंगी । छमाही रि‍पोर्ट प्रकाशक/स्‍वामी द्वारा और वार्षिक रि‍पोर्ट चार्टर्ड एकाउंटेंट द्वारा प्रमाणि‍त की जाएगी । रि‍टर्न का नमूना प्रपत्र परि‍शि‍ष्‍ट‑IX में दि‍या गया है ।
4.5.2 समय पर रि‍टर्न दाखि‍ल न करने या गलत जानकारी देने पर समाचार पत्र अखबारी कागज के
आयात के लि‍ए, पंजीयन प्रमाणपत्र के प्रमाणीकरण के लि‍ए अयोग्‍य हो जाएगा ।

जरूरी दस्‍तावेज इस प्रकार हैं :
(क) वर्ष‑‑‑‑‑‑‑‑के लि‍ए वार्षिक वि‍वरण की एक फोटोस्‍टेट प्रति‍ । दैनि‍क समाचारपत्रों के
प्रकाशक परि‍शि‍ष्‍ट VIII में नि‍र्धारि‍त प्रपत्र पर दैनि‍क प्रेस का वि‍वरण भी भेज सकते हैं ।
(ख) दैनि‍कों के मामलों में दि‍नांक ‑‑‑‑‑‑‑‑के लि‍ए कैलेंडर वर्ष ‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑के प्रत्‍येक
महीने के सात‑सात अंक और अन्‍य नि‍यतकालि‍क पत्रों के मामलें में सभी अकों का एक सैट । नवीनतम अंक की एक प्रति‍ भी भेजी जानी चाहि‍ए ।
(ग) मुद्रण मशीनों का वि‍वरण अर्थात् प्रत्‍येक मशीन का मेक,साइज,प्रति‍ घंटा गति आदि‍,मुद्रण
सारणी(पृष्‍ठवार) तथा अन्‍य मुद्रण कार्यों का वि‍वरण ,यदि‍ हो तो, साथ ही प्रिंट आर्डरों,मुद्रण प्रभार के बि‍लों और ‑‑‑‑‑‑‑‑महीने के लि‍ए भुगतान के प्रमाण स्‍वरूप प्राप्‍तकर्ता की रसीदों की फोटोस्‍टेट प्रति‍यां ।
(घ) अखबारी कागज का वि‍वरण जि‍समें प्रथम दि‍वस का प्रारंभि‍क अधि‍शेष,वर्ष‑‑‑‑‑‑के
दौरान खरीदी मात्रा, वर्ष के दौरान कुल खपत तथा आलोच्‍य वर्ष के अंति‍म दि‍न
का अंति‍म अधि‍शेष ।
(ड.) आलोच्‍य वर्ष के लि‍ए कागज खरीदने के बि‍लों की फोटोस्‍टेट प्रति‍यां तथा साथ ही
भुगतान के प्रमाण स्‍वरूप प्राप्‍तकर्ता की रसीदों की प्रति‍यां ।
(च) आपूर्ति स्‍त्रोत से प्रकाशन स्‍थान तक अखबारी कागज की ढुलाई से सम्‍बन्‍धि‍त बि‍लों की
फोटोस्‍टेट प्रति‍यां ।
(छ) एजेंट/हॉकर का नाम, स्‍टेशन,प्रेषि‍त प्रति‍यों की संख्‍या,प्रेषण माध्‍यम अर्थात् रेल,सड़क,डाक आदि‍,
प्राप्‍त भुगतान ,की प्रति‍यों के वि‍तरण का ब्‍यौरा देने वाला एक वि‍वरण जि‍सके साथ‑‑‑‑‑‑महीने के लि‍ए एजेंसी बि‍लों,एजेंटों/हॉकरों को जारी भुगतान रसीदों,प्रेषण रसीदों आदि‍ की फोटोस्‍टेट प्रति‍यां 1
(ज) कैलेंडर वर्ष ‑‑‑‑‑‑‑के लि‍ए लाभ‑हानि‍ खाता । यदि‍ लाभ‑हानि‍ खाता वि‍त्‍तीय वर्ष आधार पर
बनाया गया है, तो जनवरी से दि‍सम्‍बर‑‑‑‑‑‑‑तक माह‑वार बि‍क्री आय की प्रति‍यां प्रस्‍तुत की जानी चाहि‍ए, जि‍समें बेची गई प्रति‍यों की माह‑वार बि‍ल राशि‍ का उल्‍लेख हो ।
(झ) स्‍वामी की स्‍थायी आयकर संख्‍या, यदि‍ हो तो, लि‍खें ।
टि‍प्‍पणी: कृपया ध्‍यान दें कि‍ दस्‍तावेजों की प्रति‍यां और उनकी फोटोस्‍टेट प्रति‍ राजपत्रि‍त अधि‍कारी द्वारा
सत्‍यापि‍त कराके भेजी जाएंगी, यदि‍ असत्‍यापि‍त प्रति‍यां प्राप्‍त होती हैं, तो उन पर वि‍चार नहीं कि‍या जाएगा यही नियम है.

कभी भी कोई जानकारी इसके अलावा चाहिए तब आप मुझे इस नम्बर +919808123436 पर कॉल या व्हाटसऐप करके जानकारी हासिल कर सकते हैं...!
आपको ये जानकारी कैसी लगी हमको ज़रूर बतायें
धन्यवाद...!

Wednesday, 30 September 2020

देश मैं बलात्कार के बाद होने वाली मेडिकल जांच भी पीड़ित को शर्मशार करती है...?

"एस एम फ़रीद भारतीय"
रेप के 20 साल बाद मेडिकल होना बताता है कि यातनाएं झेलना तो पीड़िता की नियति मैं शामिल हो चुका है.

इस बारे मैं सबसे पहले हम बात करते हैं विनता नंदा की जिनके साथ आलोक नाथ ने 20 साल पहले कथित रूप से बलात्कार किया था. मामला भले ही पुराना हो लेकिन उन्हें किसी भी सूरत में बख्शा नहीं गया. बलात्कार कल होता तब भी मेडिकल टेस्ट होता, 20 साल पहले हुआ, तब भी होगा.

विनता नंदा आज एक सफल राइटर और प्रोड्यूसर हैं, वो सशक्त हैं और हिम्मती भी, लेकिन ऐसा नहीं है कि उनके इतना हिम्मती होने से यातनाएं उनके हिस्से नहीं आएंगी, सच तो ये है कि हमारे देश का सिस्टम इतना लचर है कि रेप पीड़िता की नियति बन जाता है, हर कदम पर यातनाएं झेलना, विनता भी झेल रही हैं, चूंकि रेप हुआ है तो 20 साल के बाद भी उन्हें अपना मेडिकल टेस्ट कराना होगा, तभी तो मामला आगे बढ़ेगा.

Me too आंदोलन के तहत तनुश्री दत्ता के बाद अगर किसी महिला का मामला सबसे ज्यादा चर्चित हुआ, तो वो हैं राइटर और प्रोड्यूसर विनता नंदा, विनता का मामला इसलिए भी चर्चित था क्योंकि ये मामला 20 साल पुराना था और टीवी के सबसे संस्कारी कहे जाने वाले शख्स आलोक नाथ के खिलाफ था.

20 साल पहले भी विनता यही सब झेल रही होतीं जो आज झेल रही हैं, ये तो शुरुआत है, अभी तो कोर्ट की फजीहत अलग बात है, विनता नंदा कहती हैं कि ' मैं एक पढ़ी-लिखी, आजाद और सशक्त महिला हूं, लेकिन मेरे साथ जो कुछ भी हुआ वो शायद उन महिलाओं की तुलना में बहुत कम होगा जो सशक्त नहीं हैं और आवाज नहीं उठा पातीं, वो तो इससे कहीं ज्यादा बुरा होता होगा.

सच ही कहा था ये विनता ने, और वो ये सब झेलने के लिए तैयार थीं, लेकिन उन महिलाओं के साथ क्या होता होगा जो उतनी मजबूत स्थिति में नहीं हैं, खैर, हम सब जानते हैं, पर अब सवाल ये है कि पुलिसिया कार्रवाई क्या रूप लेने जा रही है, और जब मेडिकल में कुछ नहीं मिलेगा, तो क्या विनता नंदा का केस खारिज हो जाएगा. इतनी हिम्मत के बाद जो सच विनता पूरी दुनिया के सामने लाईं क्या उसका अस्तित्व एक मेडिकल टेस्ट पर आधारित है? 

ये बातें साबित करती हैं कि रेप के मामले में हमारा समाज जितना असंवेदनशील है उससे भी कहीं ज़्यादा सुस्त हमारा कानून और हमारी कानून व्यवस्था भी है.

विनता नंदा के साथ आलोकनाथ ने 20 साल पहले दुष्कर्म किया था, बहुत हिम्मत लगी होगी विनता को जब उन्होंने फेसबुक पर ये बताया कि उनके साथ बलात्कार किया गया था, और उससे भी ज्यादा हिम्मत तब लगी जब उन्होंने आलोकनाथ के खिलाफ पुलिस में शिकायत की थी, हालांकि ये हिम्मत वो उस वक्त नहीं जुटा सकी थीं जब उनके साथ ये सब हुआ था, यानी 20 साल पहले, लेकिन जब अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का मन विनता ने बना लिया तो ये बात वहीं तय हो गई थी कि अब वो सबकुछ सहने के लिए तैयार हैं, वही सबकुछ जो बलात्कार सहने वाली हर महिला झेलती है.

विनता का मामला भले ही 20 साल पुराना हो, लेकिन उन्हें किसी भी सूरत में बख्शा नहीं गया, बलात्कार कल होता तब भी मेडिकल टेस्ट होता, 20 साल पहले हुआ, तब भी होगा, हालांकि ये टेस्ट अगर रेप के 72 घंटो के भीतर हो तो ही काम का होता है, ज्यादा से ज्यादा एक सप्ताह, लेकिन एक सप्ताह बाद ये टेस्ट किसी काम का नहीं रहता, लेकिन पुलिस की कार्रवाई आगे तभी बढ़ेगी जब मेडिकल करवाया जाएगा, सोचने वाली बात तो ये है कि मेडिकल में आखिर मिलेगा क्या, ये रटे रटाए सरकारी डायलॉग बोलकर पुलिस अगर खुद को प्रक्रिया के मुताबिक काम करते दिखाना चाहती है तब पुलिस को ये भी समझना होगा कि वो ये कहकर अपनी फ़जीहत खुद कराती रही है.

आपको बता दें कि, 8 अक्टूबर को विनता ने फेसबुक के जरिए रेप के बारे में दुनिया को बताया था और 19 अक्टूबर को पुलिस को, लेकिन पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की. रेप के मामले में शायद पुलिस जरूरत से ज्यदा सोचती है, इसलिए तुरंत एफआईआर कभी नहीं करती, शिकायत के लगभग एक महीने के बाद पुलिस ने कहा कि वो FIR दर्ज करेंगे, और 21 नवंबर को ओशीवारा पुलिस ने आलोकनाथ के खिलाफ बलात्कार की FIR दर्ज की, लेकिन मेडिकल कराए बिना केस आगे नहीं बढ़ सकता.

वहीं श्रंखला पांडेय 16 दिसंबर 2017 के साथ रेप के बाद की मेडिकल जांच से भी पीड़िता को शर्मशार किया जाता है। मध्य प्रदेश में 18 वर्षीय दलित महिला का अपहरण और बलात्कार किया गया। इस मामले में स्वास्थ्य पेशेवर ने पीड़िता पर दोष मढ़ा जिससे उसे और भी नुकसान पहुंचा। बेटी की मेडिकल जांच के दौरान उसके साथ कमरे में मौजूद उसकी मां ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि डॉक्टर ने कहा कि उसकी बेटी झूठ बोल रही है और सेक्स सहमति से हुआ है। डॉक्टर ने मेरी बेटी से कहा "यदि वे आप के साथ जबरदस्ती करते, तो आपके शरीर पर निशान होना चाहिए था, लेकिन आपके शरीर पर ऐसा कुछ नहीं है। आपने जरूर अपनी इच्छा से ऐसा किया होगा।" जांच के बाद मेरी बेटी और ज्यादा डर गई। बलात्कार के बाद पीड़िताओं को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं में कमी पाई गई। ये एक चिंता का विषय है कि जहां बलात्कार के बाद पीड़िता को कानून व स्वास्थ्य सेवाएं मिलनी चाहिए हमारे यहां उन्हें इसके लिए दर दर भटकना पड़ता है.

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में, ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि यौन हमले की पीड़िताओं की जांच करने वाले डॉक्टर उन्हें जाँच के बारे में पर्याप्त जानकारी देने में नाकाम रहे और उनके साथ डॉक्टरों के व्यवहार में संवेदनशीलता की कमी थी। 2014 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने पीड़िताओं के लिए चिकित्सीय-कानूनी सेवा हेतु दिशानिर्देश जारी किए जिससे कि स्वास्थ्य सेवा, जांच और इलाज को मानकीकृत किया जा सके। 

वहीं टू फिंगर टेस्ट पर लगी रोक भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बलात्कार पीड़ितों के संग व्यवहार करने के नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मंत्रालय ने टू फिंगर टेस्ट पर भी रोक लगाई है। नए दिशा-निर्देशों के तहत सभी अस्पतालों में बलात्कार पीड़ितों के लिए एक विशेष कक्ष बनाने के लिए कहा गया है जिसमें उनका फॉरेसिंक और चिकित्सकीय परीक्षण होगा। ये भी पढ़ें: इस स्केच ने बच्ची के साथ बलात्कार करने वाले को पहुंचाया जेल अर्चना सिंह बताती हैं, “बलात्कार के बाद होने वाले मेडिकल जांच में संवेदनशीलता बरती जाए इसके लिए अस्पतालों में नोडल ऑफिसर बनाए जाते हैं जिन्हें पूरी ट्रेनिंग दी जाती है कि वो इस दौरान संवदेनशीलता रखें.

लेकिन कई बार ऐसी शिकायतें आती हैं कि अस्पताल में पीड़िता व उसके परिवार के साथ गलत व्यवहार होता है।” ये एक अच्छी बात है कि टू फिंगर टेस्ट पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है ये बहुत ही शर्मनाक व गंदा तरीका था जांच का जो पीड़िता को शारीरिक व मानसिक दोनों रूप से कमजोर करता है, एक पीड़िता ने बताया, बलात्कार के बाद जब मेडिकल जांच के लिए ले गए तो वहां मुझे बहुत डर लग रहा था, उन्होंने इस तरह से बात की जैसे मैं झूठ बोल रही हूं, मुझे लगा था कि महिला डॉक्टर टेस्ट करेगीं लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। टेस्ट के दौरान जो पीड़ा होती है वो भी बलात्कार के दर्द को ताजा करने वाली थी.

 शर्म, तकलीफ और डर ये कोई नहीं समझ सकता जो मैंने झेला है, किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के क्वीन मेरी की स्त्रीरोग विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ अंजू अग्रवाल बताती हैं, “जब तक पुलिस केस नहीं होता डॉक्टर जांच नहीं कर सकता, उसके लिए अलग से दिशा निर्देश होते हैं जिसका पालन डॉक्टर करता है, इसके दौरान महिला पुलिस भी उपस्थित होती हैं,” मेडिकल जांच के नियमों में भी हुए बदलाव, अलग अलग राज्यों में अलग नियम कई राज्यों के अपने दिशानिर्देश हैं, लेकिन वे अक्सर पुराने होते हैं और 2014 के केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों जैसे विस्तृत और संवेदनशील नहीं होते हैं, इनमें ऐसी प्रक्रियाएं और चिकित्सा जांचें भी हैं जिनकी जरूरत नहीं होती.

उदाहरण के लिए, राजस्थान के अस्पतालों में इस्तेमाल किए जाने वाले मानक फॉर्म में एक ऐसा कॉलम अभी भी है जो योनिच्छद (हैमेन) की स्थिति के बारे में जानकारी मांगता है और डॉक्टर इसे भरने के लिए फिंगर टेस्ट करते हैं, जयपुर के एक अस्पताल में फॉरेंसिक साक्ष्य विभाग के एक मेडिकल कानूनविद ने कहा, "ये फॉर्म्स मेरे जन्म से पहले के हैं जो अभी तक वैसे के वैसे ही हैं.

हरियाणा राज्य सरकार ने 2014 के बेहतर दिशानिर्देशों से पहले 2012 में अपनी चिकित्सीय-कानूनी नियमावली जारी की थी, मगर अस्पताल हमेशा उन प्रोटोकॉल्स का पालन नहीं करते हैं, कोई भी डॉक्टर कर सकता है टेस्ट 1997 में कानून बनाया गया था कि सिर्फ महिला डॉक्टर ही बलात्कार के मामलों में मेडिकल जांच कर सकती है.

लेकिन महिला डॉक्टरों की कमी को देखते हुए 2005 में फिर से कानून में संशोधन हुआ, अब किसी भी लिंग और किसी भी विषय का रजिस्टर्ड मेडिकल डॉक्टर इस तरह की जांच कर सकता है, हालांकि इसके लिए पीड़ित की अनुमति जरूरी है, इस तरह के बदलावों ने इतनी संवेदनशील जांच के लिए ज्यादा डॉक्टर उपलब्ध करा दिए हैं, लेकिन उनमें से बहुतों के पास योग्यता ही नहीं है.

पीड़ित मनीषा या मनीषा के परिवार को बारे मैं बात करें तो ये बहुत ही दुखद है, अभी पीड़ित के परिवार को उसकी मौत के बाद भी इंसाफ़ नहीं मिल पाया है, जबकि पुलिस की कार्यवाही पीड़ित पर ज़ुल्म करने वालों के हौंसलों को नई उड़ान देने वाली है, यही वजह है बलात्कार करने वाले कानून से डरने के बजाये कानून को ठेंगा दिखाते हैं, जिसे बदलना ज़रूरी है...!

Sunday, 16 August 2020

चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मन के लिए फिर एक वीर शहीद अब्दुल हमीद पैदा करना होगा...?


"एस एम फ़रीद भारतीय"
जब देश भर में कल 74वां मनाया गया, कहते हैं अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुए देश को 73 साल पूरे हो गए, ऐसे में अब हम आपको एक ऐसे हीरो के बारे में बताते हैं, जिन्होंने केवल अपनी एक जीप से दुश्मन पाकिस्तान के 7 खतरनाक टैंकों के परखच्चे उड़ा दिए थे, जी हां दोस्तों, सही पढ़ रहे हैं आप, एक नहीं बल्कि पूरे सात टैंक, वो भी सिर्फ़ एक जीप से, यह कारनामा करने वाला कोई और नहीं बल्कि, परमवीर चक्र विजेता वीर शहीद अब्दुल हमीद मसऊदी (अब्दुल हमीद) थे, वीर शहीद अब्दुल हमीद के शौर्य और साहस ने उस समय पाकिस्तान की सेना में खलबली मचा दी थी, दुश्मन ने तब खुलकर कहा था कि लोहे को लोहा ही काटता है, और सच में ये उनके पराक्रम का नतीजा ही था, जिसने हताश हो चुकी भारतीय सेना के अंदर एक नई जान फूंक दी थी और 1965 की जंग में महान भारत ने दुश्मन पाकिस्तान को धूल चटा दी थी.

ये साल 1965 की बात है, तब पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' की शुरुआत की थी, पाकिस्तान का मक़सद बिल्कुल साफ़ था कि हमें भारत को दो मोर्चों पर घेरना है, इस ऑपरेशन के तहत जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी सेना ने आतंकियों की घुसपैठ करानी शुरू कर दी और भारत को दूसरे मोर्चों पर घेरना शुरू कर दिया था,  इस दौरान भारत को खुफिया जानकारी मिली कि पाकिस्तान कश्मीर पर कब्जा करना चाहता है और इसके लिए उसने अपने 30 हजार जवानों को गुरिल्ला वार का ट्रेनिंग भी दी है.
 
तब पाकिस्तान ने 8 सितंबर 1965 को भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था, पाकिस्तानी सेना ने खेमकरण सेक्टर के उसल उताड़ गांव पर हमला कर दिया, पाकिस्तान की तैयारी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने भारत के खिलाफ अमेरिकन पैटन टैंकों को उतारा था, उस दौरान इन टैंकों को अपराजेय माना जाता था, यानि शुरू से ही अमेरिका ने पाकिस्तान को अपनी औलाद बनाकर रखा था, जबकि इसके जवाब में भारतीय जवानों के पास केवल थ्री नॉट थ्री रायफल और एलएमजी के साथ गन माउनटेड जीप हुआ करती थी.

तब की मिली जानकारियों के मुताबिक 8 सितंबर 1965 की सुबह अब्दुल हमीद की जीप चीमा गांव के बाहर गन्ने के खेतों से गुजर रही थी, जीप में अब्दुल हमीद ड्राइवर के बगल में बैठे थे, इस दौरान उन्हें दूर से आती टैंकों की आवाज सुनाई दी, कुछ देर बाद उन्हें टैंक भी दिखाई देने लगे, वीर अब्दुल हमीद ने तुरंत अपनी पोजिशन ली और अपनी रिकॉयलेस गन को टैंकों की तरफ सेट कर दिया, अब बस इंतजार था गन की रेंज में टैंकों के आने का, कुछ देर बाद जैसे ही रेंज में पाकिस्तानी टैंक आईं वैसे ही वीर अब्दुल हमीद की गन माउनटेड आरसीएल जीप ने आग उगलना शुरू कर दिया और देखते ही देखते पाकिस्तान के सात टैंकों के परखच्चे उड़ गए, वीर अब्दुल हमीद ने पाकिस्तान की आर्टिलरी को पूरी तरहां धवस्त कर दिया था.

गन्ने के खेत में पोजिशन लेने का अब्दुल हमीद को शुरुआती फायदा तो हुआ, लेकिन यह केवल कुछ समय के लिए था, इसके बाद पाकिस्तान की तरफ से वीर अब्दुल हमीद की गाड़ी पर जबरदस्त हमला शुरू हुआ, इस हमले में उनकी जीप पर सवार ड्राइवर की शहीद हो गये, लेकिन वीर सपूत हमीद ने हिम्मत नहीं हारी, वे लगातार लड़ते रहे और अपनी पोजीशन बदलते रहे, जबकि वीर अब्दुल हमीद हमले से काफी घायल हो चुके थे और लगातार लड़ने के कारण थकने भी लगे थे, लेकिन उन्होंने लड़ाई जारी रखी, क्यूंकि सवाल था मुल्क की हिफ़ाज़त का, इस बीच पाकिस्तानी टैंकों ने उनकी तरफ निशाना साधा और एक हमले में वीर अब्दुल हमीद की जीप के भी परखच्चे उड़ गए.

वीर अब्दुल हमीद की गन माउनटेड जीप द्वारा पैटन टैंकों को धवस्त करने की खबर ने दुनियाभर को हिला कर रख दिया था, यह घटना किसी अजूबे से कम नहीं थी, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि तब अमेरिका ने पाकिस्तान के पैटन टैंकों की दोबारा समीक्षा की थी.

आपको बता दें कि वीर शहीद अब्दुल हमीद 4 ग्रेनेडियर के सिपाही थे, और दुश्मन के ख़िलाफ़ 1965 की जंग में वीर अब्दुल हमीद ने अपनी जान की कुर्बानी दे दी थी, उनके इस ना भुलाने वाले साहस और बहादुरी के लिए वीर शहीद अब्दुल हमीद को 16 सितंबर 1965 को सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र दिया गया...!

मगर अफ़सोस आज उन्ही वीर सपूतों के वारिसों से मुल्क की वफ़ादारी के सबूत मांगे जा रहे है वो भी दुश्मन के बाप अमेरिका के इशारे पर, इससे साफ़ समझा जा सकता है कि अमेरिका की मंशा क्या है वो क्या चाहता है, कहते हैं जब अपने घर में दुश्मन हों तब बाहर वालों की ज़रूरत ही क्या है...!

Tuesday, 4 August 2020

प्रेस को हमेशा स्वतंत्रता के बावजूद मिलती आई हैं कई चुनौतियां क्यूं...?

पूरी दुनियां में अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस हर साल तीन मई को मनाया जाता है, प्रेस किसी भी समाज का आईना होता ये हमेशा कहा और सुना जाता ही नहीं माना भी जाता है, भारत जैसे महान लोकतांत्रिक देश में प्रेस की स्वतंत्रता देश की बुनियादी जरूरत रही है, आज भी हम प्रेस के माध्यम से देश और दुनिया में घटित होने वाली गतिविधियों से अवगत होकर अपना ज्ञान बढ़ाते हैं.

प्रेस की आजादी का मतलब है किसी भी व्यक्ति को अपनी राय कायम करने और सार्वजनिक तौर पर इसे जाहिर करने का पूरा अधिकार है, भारत में प्रेस की स्वतंत्रता भारतीय संविधान के अनुच्छेद−19 में भारतीयों को दिए गए अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार से सुनिश्चित होती है। विश्व स्तर पर प्रेस की आजादी को सम्मान देने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया, जिसे विश्व प्रेस दिवस के रूप में भी जाना जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन करना, प्रेस की स्वतंत्रता पर बाहरी तत्वों के हमले से बचाव करना एवं प्रेस की स्वतंत्रता के लिए शहीद हुए संवाददाताओं की यादों को सहेजना है। 

भारत में आजादी के आंदोलन में प्रेस की अहम् भूमिका रही थी। प्रेस ने तब बहुत ही जिम्मेदारी के साथ जनता की आवाज बुलंद की। इसीलिए यह माना और स्वीकार किया गया कि आजादी के आंदोलन में प्रेस की बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी जिसने बिना भय और लोभ लालच के अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया। महात्मा गाँधी से लेकर लोकमान्य तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी, लाला लाजपत राय, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, वियोगी हरि और डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे पत्रकारों का नाम हम आज भी बहुत ही सम्मान से लेते है। उन्होंने अपनी लेखनी के जरिये देशवासियों में आजादी के आंदोलन का जज़्बा पैदा किया था।

भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के साथ प्रेस को चौथा खंभा माना जाता है। प्रेस इनको जोड़ने का काम करती है। प्रेस की स्वतंत्रता के कारण ही कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को मजबूती के साथ आम अवाम की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का मौक़ा हासिल हुआ है। कभी-२ प्रेस पर तिल को ताड़ बनाने का आरोप लगाया जाता रहा है हालाँकि यह पूरी तरह सच नहीं, अधूरा सच है। 

आजादी के बाद प्रेस पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ गई थी जो आज भी है,भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनियां में  जनमत को जागृत करने का कार्य भी प्रेस ही करती आई है, यूं कहा जाये कि सोये हुए को जगाने का काम भी यही प्रेस करती आई है, और छोटे बड़े राजनीतिक दलों और नेताओं को राह दिखाने का काम भी हम प्रेस वालों को ही करना पड़ता है, आम आदमी को रोटी कपड़ा और मकान की बुनियादी सुविधाओं को दिलाने के काम में भी प्रेस की भूमिका हमेशा अहम रही है, वहीं भ्रष्टाचार से लड़ने का काम भी प्रेस ने बखूबी अंजाम दिया है। 

और सत्ता की नाराजगी का दंश भी हमेशा ही मीडिया को झेलना पड़ा है, इसकी सबसे बड़ी मिसाल 1975 में आम आवाम के हक की लड़ाई लड़ने वाले विपक्ष का समर्थन करने पर आपातकाल के नाम पर मीडिया का गला घोंट दिया गया था, तब सेंसरशिप का सामना भारतीय प्रेस को करना पड़ा था, अनेक अख़बारों पर सरकारी छापे पड़े, विज्ञापन रोक दिये गए, बहुत से अखबार जु़ल्म ज़्यादती के शिकार होकर अकाल मौत के शिकार हो गए, तब हमारे बहुत से वरिष्ठ पत्रकारों को जेलों में भी डाला गया, इसके बावजूद भारत की प्रेस कतई घबराई नहीं बल्कि इस आपदा का डटकर मुकाबला किया, ये सब इतिहास के काले पन्नों में सुनहरी शब्दों में दर्ज है, यह प्रेस की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने का ही फल था की एक सरकार का लोकतान्त्रिक तरीके से शांति के साथ तख्ता पलट भी हुआ था.

लेकिन आज समाज के आपसी रिश्तों के संयम के साथ वही संयम मीडिया को भी अपने संवाद में रखना होगा, इससे मीडिया के प्रति समाज में आदर और सम्मान बढ़ेगा और बड़ी से बड़ी ताकत भी मीडिया की आजादी को कुचल नहीं पाएगी, भारतीय संविधान और लोकतंत्र ने मीडिया को स्वतंत्रता दी है, इसलिए पत्रकारों को स्वतंत्रता और सुरक्षा मिलनी ही चाहिए, इसकी आवाज़ हमेशा उठती रही है, क्यूंकि प्रेस को खतरा दरअसल मीडिया घराने के मालिकों से नहीं है, बल्कि उन शक्तियों से है जो ज्यादा से ज्यादा पैसा जल्द बनाना चाहती हैं.

तब ऐसे में मीडिया को उच्च मानदंड और आदर्शों पर काम करना होगा ताकि कोई भी उस पर उंगलियां न उठा सके, क्योंकि एक पत्रकार सिर्फ खबरों को बताने वाला नहीं है बल्कि वह एक बुद्धिजीवी और सामाजिक प्राणी भी होता है, मीडिया जितना स्वतंत्र होगा, सरकारी कामकाज उतने पारदर्शी होंगे, ये भी सरकारों के साथ देश की आम जनता को नहीं भूलना चाहिए, तभी सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकारों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, मसलन पिछले तीन दशकों में दलित और महिला अधिकारों के प्रति मीडिया ने बड़ा कार्य किया था, बीते चुनावों में मीडिया की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है, सोशल मीडिया का दखल और इसका प्रयोग जिस तरह बढ़ रहा है, उसका लाभ भी पत्रकारिता को मिलेगा.

 आज मीडिया का प्रभाव काफी बढ़ गया है, कहा जाता है कि भारत के मीडिया पर पूंजीपतियों का आधिपत्य है जिसके कारण वह स्वतंत्र होकर कुछ भी लिखने को तैयार नहीं है, अब मीडिया केवल प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक तक सीमित होकर नहीं रहा, ना ही सरकार और पैसे वालों का उतना कब्जा है, वजह सोशल मीडिया ने जनमानस का विश्वास जीतने में सफलता हासिल कर ली है, अब मीडिया चंद हाथों में सीमित होकर नहीं रह गया है और न ही दारू और पैसे में बिकने वाला है, दरअसल इंटरनेट के विस्तार के बाद सोशल मीडिया का जबरदस्त प्रभाव देखने को मिला है अब कोई ख़बर दबाई नहीं जा सकती, सोशल मीडिया के कारण वह लोगों तक तुरंत पहुँच जाती है, हालांकि यह भी कड़वा सच है कि कुछ चालाक और धूर्त लोगों ने सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाकर मीडिया का दुरूपयोग भी शुरू कर दिया है.

वहीं आज सोशल मीडिया ने घर घर में पत्रकार खड़े कर दिए हैं जो पलक झपकते ही आप तक समाज में घटने वाली घटना ज्यों की त्यों परोस देता हैं, वह भी बिना लाग लपेट के, इसके अनेक खतरे भी उत्पन्न हो गए हैं जिससे समाज को लाभ कम और हानि अधिक होने की संभावनाऐं भी व्यक्त की जाने लगी हैं, देश दुनियां में मीडिया के बेहतर फैलाव के बाद यह महसूस किया जा रहा है कि प्रेस की आजादी को कायम रखा जाये मगर साथ ही जिम्मेदारी की भावनाओं का भी निर्वहन किया जाये, समाज के कमजोर और पिछड़े तबक़े तक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाया जाये.

साथ ही साम्प्रदायिकता और छद्म साम्प्रदायिकता की सच्चाई से लोगों को अवगत कराया जाये, समाज के कमजोर और पिछड़े वर्गों तक सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाया जाये। प्रेस की आजादी का मतलब हमारे सामाजिक नव निर्माण से है। प्रेस को अपनी स्वतंत्रता कायम रखते हुए समाज के जन जागरण में अपनी भूमिका तलाशनी होगी। प्रेस की चुनौतियां व्यापक हैं जिसे चंद शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि समाज में गैर बराबरी पर हमला बोल कर समता और न्याय का मार्ग प्रशस्त हो सके इसमें प्रेस के साथ हम सब की भलाई निहित है।
लेखक- बाल मुकुन्द ओझा
सम्पादित- एस एम फ़रीद भारतीय
सम्पादक एनबीटीवी इंडिया डॉट इन

गाज़ा में पत्रकार भूख से मर रहे हैं- अल जज़ीरा...?

नेशनल न्यूज़ 24 नेटवर्क इंडिया 'अपनी जान जोखिम में डालकर, अब ज़िंदा रहने की लड़ाई लड़ रहे हैं', अल जज़ीरा और एएफपी का कह...