Saturday, 28 October 2017

आज़ादी की पहली चिंगारी सैफ़ी ओर राजपूतों ने मिलकर लगाई ?

1857 का स्वाधीनता संग्राम एक सैनिक विद्रोह था, सैनिको ने ही इस विद्रोह की शुरुआत की थी और बढ़-चढ़कर इसमें हिस्सा लिया था, सही मायनों मैं सैनिक ही इस विद्रोह की रीड थे और गंभीरता से अंग्रेज हुकूमत को उखाड़ने के लिए अपने काम को अंजाम दे रहे थे.

ज़्यादातर सैनिको ने विद्रोह कर अपने घर जाने के बजाए (जो कि वो आसानी से कर सकते थे और ज़िंदा बचे रहते) आखिर तक लड़ाई करना कबूल किया और कुछ लड़ते हुए शहीद हुए, कुछ को अंग्रेजों ने फांसी पर लटकाकर शहीद कर दिया.

जबकि कई जाति समूहों ने इस विद्रोह में सिर्फ लूटपाट ही की जिन्हें खुद विद्रोही सैनिको ने सजाए भी दी और कइयो ने व्यक्तिगत कारणों से विद्रोह किया और उनके नाम इतिहास में क्रांतिकारियों में अमर हो गए.

लेकिन जिन लाखो सैनिको ने बिना किसी लालच के निस्वार्थ और निडरता से अंग्रेजो से युद्ध किया उनमे से बहुत ही कम सैनिको के नाम लोगो को मालूम हैं, लाखो सैनिक अपने घरों से दूर गुमनाम मौत मरे जिनकी लाशो को भी सही सम्मान ना मिल सका, हजारो सैनिको ने लड़ते हुए वीरता की अद्भुत मिसाले पेश की लेकिन इनके नाम पते कभी इतिहास में जगह नही बना पाए.

इन सैनिको में अधिकतर उत्तर प्रदेश विशेषकर अवध, बिहार के भोजपुर क्षेत्र के राजपूत, ब्राह्मण और मुसलमान थे, बगावत करने वाले सैनिको में सबसे बड़ा धड़ा अवध के बैसवाड़ा, पूर्वांचल, बिहार के शाहाबाद क्षेत्र के राजपूतो का था.

1857 में सबसे भीषण लड़ाई इन्ही क्षेत्रो में लड़ी गई थी, यहां का हर एक सक्षम राजपूत हथियार उठाए हुए था, यहां स्वाधीनता संग्राम का वास्तविक रूप देखने को मिला, अंग्रेजो को विद्रोह कुचलने में सबसे ज्यादा मुश्किलें इन्ही क्षेत्रो में आई, इसकी वजह यहां से बड़ी संख्या में भर्ती होने वाले सैनिको का बगावत करना था, जब सैनिको ने बगावत की तो उनके गाँव में रहने वाले भाई बंधुओं ने भी हथियार उठा लिए.

वीर कुंवर सिंह जी और राणा बेनी माधव सिंह की सेना में अधिकतर लोग इन क्षेत्रो के बागी सैनिक थे, जगह जगह जाकर इन सैनिको ने क्रांति की अलख जगाई, राजाओ, जमींदारों को संग्राम में कूदने के लिए प्रेरित किया और उनको नेता बनाकर उनकी सेना में शामिल हुए.

अंग्रेजो को सबसे भीषण प्रतिरोध इन्ही सैनिको से युद्धों में झेलना पड़ा जो हार निश्चित होने के बाद भी हथियार डालने की बजाए मरते दम तक लड़े, दिल्ली की घेराबंदी इसका उदाहरण है जिसमे सुदूर पूर्वांचल से आए सैनिक हार निश्चित होने के बाद भी अंतिम सांस तक लड़े, इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा से भर्ती होने वालो में मुस्लिम शेख यानि आज के सैफ़ी ओर रांगढ़ यानि (मुस्लिम राजपूत) सबसे प्रमुख थे, इन क्षेत्रो में इन मुस्लिम सैफ़ी व राजपूतो ने ही सबसे मुखर विद्रोह किया था.

इन लाखो सैनिको के नाम इतिहास में गुम हो गए, इनके कुछ नेताओ के नाम पता है लेकिन उनका भी पता ठिकाना नही मालूम, हर साल हर जिले कस्बे में सैकड़ो क्रांतिकारियों का नाम लेकर उन्हें श्रद्धांजली दी जाती है लेकिन 1857 के इन वास्तविक नायको को आज तक किसी ने याद नही किया क्यूंकि वो सभी गुमनाम शहीद थे, लेकिन इत्तेफ़ाक़ से मेरठ में जिन सैनिको ने सर्वप्रथम विद्रोह कर चिंगारी भड़काई थी, उनके नाम आज भी इतिहास में दर्ज हैं.

24 अप्रेल 1857 को मेरठ में 3 लाइट कैवेलरी के 85 जवानों ने परेड में चर्बीयुक्त कारतूसो का इस्तेमाल करने से मना कर दिया, बार बार दबाव डालने के बाद भी हुकुम उदूली करने पर इन जवानो को तुरंत डिसमिस करके जेल में डाल दिया गया और इनपर कोर्ट मार्शल की कार्यवाई शुरू की गई जिसके बाद इन्हें कठोर सजा दी जानी थी, इनके इस काम से इनके बाकी साथियो में हलचल मच गई और उन्होंने भी अपनी बारी आने पर कारतूस लेने से इनकार कर दिया.

आखिर में 10 मई 1857 की शाम को भारतीय सैनिको के गुस्से का लावा फूट पड़ा और 20 नेटिव इन्फेंट्री और 11 नेटिव इन्फेंट्री के जवानों ने अपने अफसरों पर गोली चलाकर खुले विद्रोह की शुरुआत कर दी.

3 लाइट कैवेलरी के जवान भी अपने घोड़ो पर सवार होकर जेल से अपने साथियो को आजाद कराने के लिए निकल पड़े, वहा शहर कोतवाल ने डर कर कोई विरोध नही किया और सैनिको को चाबिया पकड़ा दी, सैनिको ने अपने 85 साथियो के साथ जेल के बाकी 1200 कैदी भी आजाद करा लिए.

11 मई को इन क्रांतिकारी सैनिको ने दिल्ली पहुचने के बाद 12 मई को दिल्ली पर अधिकार कर मुग़ल सम्राट बहादुरशाह दित्यीय को सम्राट घोषित कर दिया और उन्हें अंग्रेजो के विरुद्ध बगावत करने के लिए मजबूर किया, इसकी सूचना मिलते ही विद्रोह लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बरेली, बनारस, बिहार तथा झांसी में भी फैल गया, 3 लाइट कैवेलरी के जवानों ने अकेले दम पर एक सैन्य विद्रोह को स्वाधीनता आन्दोलन में तब्दील कर दिया.

इस 3 लाइट कैवेलरी में अधिकतर उत्तर प्रदेश के राजपूत और हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रांगड़ (मुस्लिम राजपूत) थे, इनमे से अधिकतर लड़ते हुए शहीद हो गए या फिर नेपाल की तराई में बिमारी और भूख से मारे गए, जो कुछ लोग वापिस अपने गाँव पहुचे उन्हें स्वीकार नही किया गया, जिन 85 जवानों ने सर्वप्रथम चर्बीयुक्त कारतूस लेने से मना कर इस स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत की, उन सभी के नाम उपलब्ध हैं.
इन 85 सैनिको में 36 हिन्दू थे जिनमे 34 राजपूत थे बाकी शेख मुसलमान यानि आज के सैफ़ी थे.

इन सैनिको के नाम इस प्रकार हैं-
शैख़ हुसनूद्दीन (सैफ़ी), शैख़ नूर मोहम्मद (सैफ़ी), शैख़ हुसैन बक्स (सैफ़ी), शैख़ नंदू (सैफ़ी), शैख़ रमजान अली (सैफ़ी), शैख़ सदूल्लाह (सैफ़ी), शैख़ राहत अली (सैफ़ी), शैख़ फजल इमाम (सैफ़ी), शैख़ आराम अली (सैफ़ी), शैख़ रुस्तम (सैफ़ी), शैख़ इमामबक्स (सैफ़ी), शैख़ घसीबक्स (सैफ़ी), शैख़ उमेद अली (सैफ़ी), शैख़ इजाद अली (सैफ़ी), शैख़ मुहम्मद एवाज़ (सैफ़ी), शैख़ कासिम अली (सैफ़ी)

ये सभी भारत की पहली क्रांति के शहीद आज के सैफ़ी क़बीले के लोग हैं, जबकि सैफ़ी सरनेम से पहले सैफ़ी क़बीले के लोगों के मुस्लिम शेख कहा जाता था, पेशे के लिहाज़ से जंग मैं शेखों को बड़ा इज़्ज़त दी जाती थी, आला से आला सिपाही बड़ी इज़्ज़त से पुकारा करते थे !

शीतल सिंह, मथुरा सिंह, नारायण सिंह, लाल सिंह, शिवदीन सिंह, बिशन सिंह, बलदेव सिंह, माखन सिंह, दुर्गा सिंह प्रथम, दुर्गा सिंह दितीय, जुराखन सिंह प्रथम, जुराखन सिंह दितीय, बरजौर सिंह, द्वारका सिंह, कालका सिंह, रघुबीर सिंह, बलदेव सिंह, दर्शन सिंह, मोती सिंह, हीरा सिंह, सेवा सिंह, काशी सिंह, भगवान् सिंह, शिवबक्स सिंह, लक्ष्मण सिंह, रामसहाय सिंह, रामसवरण सिंह, शिव सिंह, शीतल सिंह, मोहन सिंह, इन्दर सिंह, मैकू सिंह, रामचरण सिंह, दरियाव सिंह, मातादीन, लक्षमन दुबे.

ओर शेख पीर अली, अमीर कुदरत अली, जहाँगीर खान, मीर मोसिम अली, अली नूर खान, मीर हुसैन बक्स, साहिबदाद खान, नवाब खान, अली मुहम्मद खान, नसरुल्लाह बेग, मीराहिब खान, नबीबक्स खान, नद्जू खान, अब्दुल्लाह खान, यासीन खान, जबरदस्त खान, मुर्तजा खान, अजीमुल्लाह खान, कल्ला खान, सलारबक्स खान, इमदाद हुसैन, पीर खान, मुराद शेर खान, अशरफ अली खान, खादुर्दाद खान, मीर इमदाद अली, उस्मान खान, मक़सूद अली खान, अब्दुल वहाब खान, पनाह अली खान, विलायत अली खान ओर फ़तेह खान.

Friday, 27 October 2017

वक़्त, समय, टाईम क्या है ?

सोचकर जवाब दीजिये, क्या करते हैं आप ?

एक बैंक अकाउंट की जिसमे रोज सुबह आपके लिए कोई 50,000 पचास हज़ार रुपये जमा कर देता है ।

लेकिन शर्त ये है की इस अकाउंट का बैलेंस कैरी फॉरवर्ड नहीं होगा, यानि दिन के अंत में बचे पैसे आपके लिए अगले दिन उपलब्ध नहीं रहेंगे ओके.

और हर रोज़ इस अकाउंट में बचे हुए पैसे आपसे वापस ले लिए जाते हैं ?
ऐसी सिचुएशन में आप क्या करेंगे ?
ज़ाहिर है आप एक-एक पैसा निकल लेंगे.
क्यूँ है ना ?
हम सब के पास एक ऐसा ही बैंक है, इस बैंक का नाम है

" समय, वक्त, टाईम " ?
हर सुबह ईश्वर, ख़ुदा, गाॅड हम सबको 86,400 सैकेंडस देता है, ओर हर रात ये उन सारे बचे हुए सेकेंड्स जिनको आपने किसी बहतरीन मक़सद के लिए इस्तेमाल नहीं किया है, हमसे छीन लेता है, ये कुछ भी बकाया वक़्त (समय) आगे नहीं ले जाती है.

हर सुबह आपके लिए एक नया अकाउंट खुलता है ओर अगर आप हर दिन के जमा किये गए सैकेंडस को ठीक से इस्तेमाल करने में असफल होते हैं तो ये हमेशा के लिए आपसे छीन लिया जाता है.

अब फ़ैसला आपको करना है कि दिए गए 86,400 सैकेंडस का आप उपयोग करना चाहते हैं, या फिर, इन्हें भी गंवाना चाहते हैं, क्यूंकि एक बार खोने पर ये वक़्त आपको कभी वापस नहीं मिलेगा.

दोस्तों हर दिन आप दिए गए 86,400 सैंकेंड्स का बेहतरीन इस्तेमाल कैसे करना चाहेंगे?

Wednesday, 25 October 2017

आज़ादी किस चिड़िया का नाम है ?

*बिलकिस सैफ़ी भारतीय*
हिंदुस्तान आज़ाद है तो क्या इसका यह मतलब है कि यहाँ कोई कानून ही न हो, जिसका जो दिल चाहे वो करे? सभी का जवाब होगा कि नहीं, आज़ादी का यह मतलब हरगिज़ नहीं है, मगर हाँ आप किसी भी कानून पर बहस कर सकते हैं और उसमे सुधार का मशविरा भी दे सकते हैं यह आप का अधिकार है और यही आज़ादी का नाम है.

आज हमारे समाज में बहुत जगहों पे ज़ुल्म देखा जाता है, ज़ुल्म हमेशा कमज़ोरों पे ताक़तवर किया करता है, इसी कारण से ज़ुल्म का शिकार या तो गरीब होता है या फिर महिलाएं, यह और बात है कि मैं यह बात कभी समझ नहीं सका कि औरत कमज़ोर कब से हो गयी और इसे कमज़ोर बनाया किसने?

अक्सर ऊँगली इस पुरुष प्रधान समाज के बनाये कानून पर ही उठा करती है जबकि खुद को कमज़ोर बनाने में औरत खुद भी उतनी ही ज़िम्मेदार है जितना कि पुरुष, इस समाज में महिला और पुरुष एक सामान हैं और दोनों कि अपनी अपनी ज़िमेदारियाँ हैं, दोनों यदि अपनी अपनी ज़िमेदारियां इमानदारी से निभाएं तो कौन कमज़ोर और कौन ताक़तवर का सवाल ही पैदा नहीं होगा.

अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि क्यूँ लोग केवल उन लड़कियों से शादी करना चाहते हैं जो पढ़ी लिखी हैं, दहेज़ भी ला सकती हैं, वक्त जरुरत नौकरी भी कर सकती हैं और बच्चे भी संभाल सकती हैं, लेकिन क्या ऐसा करने में केवल मर्द ज़िम्मेदार है ?

लड़के की माता भी शादी करते समय ऐसी ही लड़की तलाशती देखी जाती है ,और शादी के बाद सास के रूप में ज़ुल्म करती भी यही औरत देखी जाती है, दहेज़ लेना, लड़की से शादी के समय उसकी मर्ज़ी का ख्याल ना करना, शादी के बाद गुलाम की तरह औरत से बर्ताव करना इत्यादि एक सामाजिक बुराई है और इसके खिलाफ आवाज़ उठाई जानी चाहिए.

ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने का नाम है आज़ादी, लड़की या लड़का इस बात के लिए तो आज़ाद है कि उन्हें शादी कब और किस्से करनी है क्यों कि यदि साथ साथ रहना है तो शादी जैसे सामाजिक बंधन में बंधना ज़रूरी है.

लेकिन यदि कोई लड़की या लड़का यह कहे कि मुझे शादी ही नहीं करनी और जब जहां जिसके साथ दिल चाहा शारीरिक सम्बन्ध बनाया और जब चाहा अलग हो गए उचित नहीं ?

इसे आज़ादी नहीं बल्कि आज़ादी के नाम पे समाज को भ्रष्ट करने की पहल ही कहा जा सकता है, मानसिक विकृति का नाम आजादी हरगिज़ नहीं हो सकता सोचना होगा आज़ादी क्या है.

Tuesday, 24 October 2017

दिल्ली दुनियां का सबसे जाम वाला राज्य होगा ?

सम्पादकीय

दिल्ली जाम ओर प्रदुषण की समस्या, सरकार कुछ कहती है कोर्ट कुछ कहती है, कानून बनाकर राज्य को जाम ओर प्रदुषण से मुक्त करना चाहते हैं, लेकिन जितने कानून बनते ओर लागू होते हैं उतना ही दिल्ली पर बोझ बढ़ता जा रहा है जाम ओर प्रदुषण का ?

दिल्ली मैं जाम ओर प्रदुषण की समस्या असल मैं 1980 के दशक से शुरू हुई, क्यूं हुई या हो रही है आज तक इस असल मुद्दे पर कोई सोचने ओर विचार करने को तैयार नहीं है, बस असल मुद्दे को अनदेखा कर दिल्ली जाम ओर प्रदुषण से छुटाकारा पाने के फ़र्जी उपायों पर अमल करने मैं लगे पड़े हैं, जितना उपाय ओर तरीके दिल्ली मैं आज़माये जा रहे हैं सब के सब मौजूदा हालात को लेकर अपनाये जा रहे हैं, ना तो आगे दिल्ली क्या होगी इसपर काम किया जा रहा है ओर ना ही इसपर कि दिल्ली जैसी है वैसी रहे ओर मौजूद समस्याओं पर काम कर परेशानियों को दूर कर आगे भी ऐसी ही रहे उस पर काम किया जाये?

दिल्ली मैं दो सरकारें हैं एक दिल्ली को चलाती है दूसरी दिल्ली मैं बेठकर देश को चलाती है, दोनो ही सरकारें अपने काम को सही तौर पर अंजाम नहीं दे पा रही हैं, वरना आज दिल्ली को जाम ओर प्रदुषण से छुटकारे के लिए जितना बजट हर साल बनाया जाता है मगर कोई काम नहीं आता समस्या विकट ओर विकट होती चली जाती है क्यूं भाई क्यूं ?

वजह है ठोस प्लान से काम ना करना, ओर ना ही भविष्य के बारे मैं सोचना कि आगे दिल्ली का भविष्य कैसा होगा हमको अच्छे भविष्य के लिए काम करना है तैयारी करनी है, हम दिल्ली सरकार देखती है मौजूदा समस्याओं को ओर दूर करने के प्रयास भी कर रही है.

जबकि दिल्ली के जाम ओर प्रदुषण के बारे मैं सोचना चाहिए बड़ी सरकार को जो देश चला रही है, असल मैं आज जो दिल्ली की हालत है उसकी ज़िम्मेदार केंन्द्र सरकार है उसकी नीतियां रही हैं, सुप्रीमकोर्ट को तो चिंता है दिल्ली की लेकिन केन्द्र सरकार को बिल्कुल भी नहीं है ओर आज जो कुछ दिल्ली की हालत को सुधारने के लिए केन्द्र सरकार को ठोस नीति ओर कानून बनाने की ज़रूरत है ओर काम करने या कानून बनाने से पहले सोचना होगा कि दिल्ली का ये हाल क्यूं हुआ जब इस पर विचार करोगे तो उपाय अपने आप सामने होगा, अभी भी वक़्त है दिल्ली को इन परेशानियों के साथ आने वाली बड़ी परेशानियों से बचाया जा सकता है, वरना दिल्ली दुनियां का सबसे जाम वाला प्रदुषित राज्य होगा.

जाम सबसे बड़ी समस्या पैदा की दस रू ने ?

दस दस रूपये रोज़ पर बिकता है कानून ?

सैफ़ी पोस्ट न्यूज़
हमारे राज्य यूपी ओर दिल्ली मैं जाम एक बड़ी समस्या बना हुआ है, सरकार सैंकड़ों करोड़ रूपया जाम से छुटकारे के लिए ख़र्च कर रही है लेकिन जाम है कि खुलने का नाम ही नहीं लेता वजह क्या है कुछ तस्वीरों से आपको हम बताने की कोशिश कर रहे हैं.

तस्वीरे लालकुंआ, आनंदविहार, दादरी नोएडा मोड़, परीचौक नोएडा की हैं, बाकी हर चौराहे का यही हाल है जो इन तस्वीरों मैं है बल्कि कुछ का तो इससे भी बुरा है, जो हम समय समय पर आपको दिखाते रहेंगे.

अब आते हैं जाम पर जाम लगता क्यूं है जो हम लिखने जा रहे हैं वो आपने भी कभी ना कभी देखा ओर महसूस किया होगा, होता ये है कि हर चौराहे पर थ्रीव्हीलर ओर डग्गामार वाहन वाले बड़ी ही आज़ादी के साथ खड़े होते हैं, इनको किसी का डर नहीं उपर से एकता बहुत दिखाते हैं वजह है इनके पास जहां अपने वाहन का रजिस्ट्रेशन व्यवसायिक मैं होता है वहीं ये इलाके की पुलिस को भी महीना नज़राने के तौर पर देते हैं.

यहां ठेकेदारी प्रथा होती है ठेकेदार इनके मालिक ओर चालकों से रोज़ दस रूपया प्रति वाहन प्रति चक्कर के लेता है जो सप्ताह मैं इकठ्ठा होकर इलाके के थाने ओर चौकी मैं हिस्से के हिसाब से बांट दिया जाता है यानि इन्होंने सिर्फ़ दस रूपये देकर सरकारी पुलिस को अपना बना लिया अब ये आज़ाद हैं जो चाहे करें जहां चाहे अपने वाहनों को खड़ा करें इनको कोई कुछ नहीं कहेगा.

अगर किसी परेशान ने गुस्से मैं आकर इनसे कुछ कह दिया या सवाह दे दी तब ये उसपर पहले गालियों की बौछार करेंगे बाद मैं हमला भी कर देंगे, आपकी नकदी पैसा, मोबाइल चैन भी बात बढ़ने पर लुट सकती है, ओर अगर आपने पुलिस बुला ली तब भी ये नहीं डरेंगे ओर पुलिस इनका ही साथ देगी, हां वाहन भी ये बड़ी ही आज़ादी से चलातो हैं बचाना आपको अपना वाहन ख़ुद होगा, तब बिका ना कानून दस रूपये मैं ?

यही वजह है कि आज कानून के रखवाले कानून ओर सरकार की सेवा को छोड़, दस रूपये रोज़ देने वाले की सेवा जहां दिल खोलकर कर रहे हैं वहीं उन्हे पूरी छूट है कानून से खिलवाड़ करने की यहां पुलिस को ये दस रूपये वाले ग़रीब दिखते हैं ?

Monday, 23 October 2017

मानवाधिकारों के लिए फ़िक्रमंद फिर भी हनना ?

एस एम फ़रीद भारतीय

मानवाधिकार हर एक का हकधार होता है
मानव अधिकारों से अभिप्राय "मौलिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता से है जिसके सभी मानव प्राणी हकदार है। अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं के उदाहरण के रूप में जिनकी गणना की जाती है, उनमें नागरिक और राजनीतिक अधिकारों, नागरिक और राजनैतिक अधिकार सम्मिलित हैं जैसे कि जीवन और आजाद रहने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के सामने समानता एवं आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ ही साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार, भोजन का अधिकार काम करने का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार.

इतिहास अनेक प्राचीन दस्तावेजों एवं बाद के धार्मिक और दार्शनिक पुस्तकों में ऐसी अनेक अवधारणाएं है जिन्हें मानवाधिकार के रूप में चिन्हित किया जा सकता है, ऐसे प्रलेखों में उल्लेखनीय हैं अशोक के आदेश पत्र, मुहम्मद (saw) द्वारा निर्मित मदीना का संविधान (meesak-e-madeena) आदि.

आधुनिक मानवाधिकार कानून तथा मानवाधिकार की अधिकांश अपेक्षाकृत व्यवस्थाएं समसामयिक इतिहास से संबंध हैं। द ट्वेल्व आर्टिकल्स ऑफ़ द ब्लैक फॉरेस्ट (1525) को यूरोप में मानवाधिकारों का सर्वप्रथम दस्तावेज़ माना जाता है.

यह जर्मनी के किसान - विद्रोह (Peasants' War) स्वाबियन संघ के समक्ष उठाई गई किसानों की मांग का ही एक हिस्सा है, ब्रिटिश बिल ऑफ़ राइट्स ने युनाइटेड किंगडम में सिलसिलेवार तरीके से सरकारी दमनकारी कार्रवाइयों को अवैध करार दिया.

1776 में संयुक्त राज्य में और 1789 में फ्रांस में 18 वीं शताब्दी के दौरान दो प्रमुख क्रांतियां घटीं, जिसके फलस्वरूप क्रमशः संयुक्त राज्य की स्वतंत्रता की घोषणा एवं फ्रांसीसी मनुष्य की मानव तथा नागरिकों के अधिकारों की घोषणा का अभिग्रहण हुआ। इन दोनों क्रांतियों ने ही कुछ निश्चित कानूनी अधिकार की स्थापना की.

कोइ भी देश अपने "मानवाधिकारों" को लेकर अक्सर विवाद बना रहता है, ये समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि क्या वाकई में मानवाधिकारों की सार्थकता है, यह कितना दुर्भाग्यपू्र्ण है कि तमाम प्रादेशिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकारी और गैर सरकारी मानवाधिकार संगठनों के बावजूद मानवाधिकारों का परिदृश्य तमाम तरह की विसंगतियों और विद्रूपताओं से भरा पड़ा है ?

किसी भी इंसान की जिंदगी, आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार है मानवाधिकार है, भारतीय संविधान इस अधिकार की न सिर्फ गारंटी देता है, बल्कि इसे तोड़ने वाले को अदालत सजा देती है.

क्या है मानवाधिकार की परिभाषा ?

एस एम फ़रीद भारतीय
देश के विशाल आकार और विविधता ,
विकसनशील तथा संप्रभुता संपन्न धर्म-निरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणतंत्र के रूप में इसकी प्रतिष्ठा, तथा एक भूतपूर्व औपनिवेशिक राष्ट्र के रूप में इसके इतिहास के परिणामस्वरूप भारत में
मानवाधिकारों की परिस्थिति एक प्रकार से जटिल हो गई है.

भारत का संविधान हमें मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जिसमें धर्म की स्वतंत्रता भी अंतर्भूक्त है, संविधान की धाराओं में बोलने की आजादी के साथ-साथ कार्यपालिका और न्यायपालिका का विभाजन तथा देश के अन्दर एवं बाहर आने-जाने की भी आजादी दी गई है, यह अक्सर मान लिया जाता है, विशेषकर मानवाधिकार दलों और कार्यकर्ताओं के द्वारा कि दलित अथवा अछूत जाति के सदस्य पीड़ित हुए हैं एवं लगातार पर्याप्त भेदभाव झेलते रहे हैं.

हालांकि मानवाधिकार की समस्याएं भारत में मौजूद हैं, फिर भी इस देश को दक्षिण एशिया के दूसरे देशों की तरह आमतौर पर मानवाधिकारों को लेकर चिंता का विषय नहीं माना जाता है, इन विचारों के आधार पर, फ्रीडम हाउस द्वारा फ्रीडम इन द वर्ल्ड 2006 को दिए गए रिपोर्ट में भारत को राजनीतिक अधिकारों के लिए दर्जा 2, एवं नागरिक अधिकारों के लिए दर्जा 3 दिया गया है, जिससे इसने स्वाधीन की संभतः उच्चतम दर्जा (रेटिंग) अर्जित की है.

भारत में मानवाधिकारों से संबंधित घटनाओं के कालक्रम
1829 - पति की मृत्यु के बाद रुढ़िवादी हिन्दू दाह संस्कार के समय उसकी विधवा के आत्म-दाह की चली आ रही सती-प्रथा को राममोहन राय के ब्रह्मों समाज जैसे हिन्दू सुधारवादी आंदोलनों के वर्षों प्रचार के पश्चाद गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक ने औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया.

वहीं 1929 - बाल-विवाह निषेध अधिनियम में 14 साल से कम उम्र के नाबालिकों के विवाह पर निषेद्याज्ञा पारित कर दी गई.

1947 - भारत ने ब्रिटिश राज से राजनीतिक आजादी हासिल की.
1950 - भारत के संविधान ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के साथ संप्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना की, संविधान के खण्ड 3 में उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय मौलिक अधिकारों का विधेयक अन्तर्भुक्त है, यह शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से पूर्ववर्ती वंचित वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान भी करता है.

1952 - आपराधिक जनजाति अधिनियम को पूर्ववर्ती " आपराधिक जनजातियों को " अनधिसूचित " के रूप में सरकार द्वारा वर्गीकृत किया गया तथा आभ्यासिक अपराधियों का अधिनियम (1952) पारित हुआ.

1955 - हिन्दुओं से संबंधित परिवार के कानून में सुधार ने हिन्दू महिलाओं को अधिक अधिकार प्रदान किए.
1958 - सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 1958-
1973 - भारत का उच्चतम न्यायालय
केशवानन्द भारती के मामले में यह कानून लागू करता है कि संविधान की मौलिक संरचना (कई मौलिक अधिकारों सहित संवैधानिक संशोधन के द्वारा अपरिवर्तनीय है.

1975-77- भारत में आपात काल की स्थिति-अधिकारों के व्यापक उल्लंघन की घटनाएं घटीं.

1978 - मेनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह कानून लागू किया कि आपात-स्थिति में भी अनुच्छेद 21 के तहत जीवन (जीने) के अधिकार को निलंबित नहीं किया जा सकता.

1978-जम्मू और कश्मीर जन सुरक्षा अधिनियम, 1978
1984 - ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके तत्काल बाद 1984 के सिख विरोधी दंगे
1985-6 - शाहबानो मामला जिसमें उच्चता न्यायालय ने तलाक-शुदा मुस्लिम महिला के अधिकार को मान्यता प्रदान की जिसने मौलानाओं में विरोध की चिंगारी भड़का दी.

उच्चतम न्यायालय के फैसले को अमान्य करार करने के लिए राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिमा (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) अधिनियम 1986 पारित किया .

1989 - अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पारित किया गया .
1989-वर्तमान- कश्मीरी बगावत ने कश्मीरी पंडितों का नस्ली तौर पर सफाया, हिन्दू मंदिरों को नष्ट-भ्रष्ट कर देना, हिन्दुओं और सिखों की हत्या तथा विदेशी पर्यटकों और सरकारी कार्यकर्ताओं का अपहरण देखा.

1992 - संविधानिक संशोधन ने स्थानीय स्व-शासन (पंचायती राज) की स्थापना तीसरे तले (दर्जे) के शासन के ग्रामीण स्तर पर की गई जिसमें महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीट आरक्षित की गई। साथ ही साथ अनुसूचित जातियों के लिए प्रावधान किए गए.

1992 - हिन्दू-जनसमूह द्वारा बाबरी मस्जिद ध्वस्त कर दिया गया, परिणामस्वरूप देश भर में दंगे हुए.
1993 - मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई.

2001 - उच्चतम न्यायालय ने भोजन का अधिकार लागू करने के लिए व्यापक आदेश जारी किए.
2002 - गुजरात में हिंसा, मुख्य रूप से मुस्लिम अल्पसंख्यक को लक्ष्य कर, कई लोगों की जाने गईं.
2005 - एक सशक्त सूचना का अधिकार अधिनियम पारित हुआ ताकि सार्वजनिक अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में संघटित सूचना तक नागरिक की पहुंच हो सके.

2005 - राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एनआरईजीए) रोजगार की सार्वभौमिक गारंटी प्रदान करता है।
2006 - उच्चतम न्यायालय भारतीय पुलिस के अपयार्प्त मानवाधिकारों के प्रतिक्रिया स्वरूप पुलिस सुधार के आदेश जारी किए.

2009 - दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 377 की घोषणा की जिसने अनिर्दिष्ट "अप्राकृतिक" यौनाचरणों के सिलसिले को ही गैरक़ानूनी करार कर दिया, लेकिन जब यह व्यक्तिगत तौर पर दो लोगों के बीच सहमति के साथ समलैंगिक यौनाचरण के मामले में लागू किया गया तो अंसवैद्यानिक हो गया, तथा भारत में इसने समलैंगिक संपर्क को प्रभावी तरीके से अलग-अलग भेद-भाव कर देखना शुरू किया, भारत में समलैंगिकता भी देखें:

हिरासत में मौतें
पुलिस के द्वारा हिरासत में यातना और दुराचरण के खिलाफ राज्य की निषेधाज्ञाओं के बावजूद, पुलिस हिरासत में यातना व्यापक रूप से फैली हुई है, जो हिरासत में मौतों के पीछे एक मुख्य कारण है, पुलिस अक्सर निर्दोष लोगों को घोर यातना देती रहती है जबतक कि प्रभावशाली और अमीर अपराधियों को बचाने के लिए उससे अपराध "कबूल" न करवा लिया जाय.

जी.पी. जोशी, राष्ट्रमंडल मानवाधिकारों की पहल की भारतीय शाखा के कार्यक्रम समन्वयक ने नई दिल्ली में टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस हिंसा से जुड़ा मुख्य मुद्दा है पुलिस की जवाबदेही का अभी भी अभाव.

वर्ष 2006 में, भारत के उच्चतम न्यायालय ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ के एक मामले में अपने एक फैसले में, केन्द्रीय और राज्य सरकारों को पुलिस विभाग में सुधार की प्रक्रिया प्रारम्भ करने के सात निर्देश दिए, निर्देशों के ये सेट दोहरे थे, पुलिस कर्मियों को कार्यकाल प्रदान करना तथा उनकी नियुक्ति/स्थानांतरण की प्रक्रिया को सरल और सुसंगत बनाना तथा पुलिस की जवाबदेही में इज़ाफा करना.

भारतीय प्रशासित कश्मीर
कई अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों और संयुक्त राष्ट्र ने भारतीय-प्रशासित कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन की रिपोर्ट दी है। हाल ही में एक प्रेस विज्ञप्ति में ओएचसीएचआर (OHCHR) के एक प्रवक्ता ने कहा, "मानवाधिकारों के उच्चायुक्त का कार्यालय भारतीय-प्रशासित कश्मीर में हाल-फिलहाल हुए हिंसक विरोधों के बारे अधिक चिंतित है सूचनानुसार जिसके कारण नागरिक तो मारे गए ही साथ ही साथ सभा आयोजित करने (एक साथ समूह में जमा होने) अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया.

वर्ष 1996 के
मानवाधिकारों की चौकसी के रिपोर्ट ने भारतीय सेनावाहिनी एवं भारतीय सरकार द्वारा समर्थित अर्द्धसैनिक बलों की कश्मीर में गंभीर और व्यापक मानवाधिकारों के उल्लंघन करने के आरोप लगाए हैं, ऐसा ही एक कथित नरसंहार सोपोर शहर में 6 जनवरी 1993 को घटित हुआ, टाइम पत्रिका ने इस घटना का विवरण इस प्रकार दिया, "केवल एक सैनिक की ह्त्या के प्रतिशोध में, अर्द्धसैनिक बलों ने पूरे सोपोर बाज़ार को रौंद डाला और आसपास खड़े दर्शकों को गोली मार दी. भारत सरकार ने इस घटना की निन्दा करते हुए इसे "दुर्भाग्यपूर्ण" कहा तथा दावा किया कि अस्त्र-शस्त्र के एक जखीरे में बारूद के गोले से आग लग गई जिससे अधिकांश लोग मौत के शिकार हुए, इसके अतिरिक्त कई मानवाधिकार संगठनों ने पुलिस अथवा सेना द्वारा कश्मीर में लोगों के गायब कर दिए जाने के दावे भी पेश किए हैं.

जनवरी 2009 में श्रीनगर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के बाहर सड़क के किनारे एक सैनिक चौकी गार्ड.
कई मानवाधिकार संगठनों , जैसे कि एमनेस्टी इंटरनैशनल एवं ह्युमन राइट्स वॉच (HRW) ने भारतीयों के द्वारा कश्मीर में किए जाने वाले मानवाधिकारों के हनन की निंदा की है जैसा कि "अतिरिक्त-न्यायायिक मृत्युदंड", "अचानक गायब हो जाना", एवं यातना, "सशस्त्र बलों के विशेष अधिकार अधिनियम", जो मानवाधिकारों के हनन और हिंसा के चक्र में ईंधन जुटाने में दण्ड से छुटकारा दिलाता है.

सशस्त्र बलों के विशेषाधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) सेनावाहिनी को गिरफ्तार करने, गोली मारकर जान से मार देने का अधिकार एवं जवाबी कार्रवाई के ऑपरेशनों में संपत्ति पर कब्ज़ा कर लेना या उसे नष्ट कर देने का व्यापक अधिकार प्रदान करता है.

भारतीय अधिकारियों का दावा है कि सैनिकों को ऐसी क्षमता की ही आवश्यकता है क्योंकि जब कभी भी हथियारबंद लड़ाकुओं से राष्ट्रीय सुरक्षा को संगीन खतरा पैदा हो जाता है तो सेना को ही मुकाबला करने के लिए तैनात किया जाता है, उनका कहना है कि, ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए असाधारण उपायों की जरुरत पड़ती है."

मानवाधिकार संगठनों ने भी भारत सरकार से जन सुरक्षा अधिनियम को निरसित कर देने की सिफारिश की है, चूंकि "एक बंदी को प्रशासनिक नजरबंदी (कारावास) के अदालत के आदेश के बिना अधिकतम दो सालों के लिए बंदी बनाए रखा जा सकता है".

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (युनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर रिफ्युज़िज़) के एक रिपोर्ट के मुताबिक यह तय किया गया कि भारतीय प्रशासित कश्मीर "आंशिक रूप से आजाद" है, जबकि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के बारे में निर्धारित किया गया कि "आजाद नहीं" है.

प्रेस की आजादी
मुख्य लेख : Freedom of press in India
सीमा के बिना संवाददाताओं (रिपोर्टर्स विदाउट बोर्डर्स) के अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में प्रेस की आजादी के सूचकांक में भारत का स्थान 105वां है (भारत के लिए प्रेस की आजादी का सूचकांक 2009 में 29.33 था). भारतीय संविधान में "प्रेस" शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन "भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार" का प्रावधान किया गया है (अनुच्छेद 19(1) a). हालांकि उप-अनुच्छेद (2), के अंतर्गत यह अधिकार प्रतिबंध के अधीन है, जिसके द्वारा भारत की प्रभुसत्ता एवं अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध जनता में श्रृंखला, शालीनता का संरक्षण, नैतिकता का संरक्षण, किसी अपराध के मामले में अदालत की अवमानना, मानहानि , अथवा किसी अपराध के लिए उकसाना आदि कारणों से इस अधिकार को प्रतिबंधित किया गया है".

जैसे कि सरकारी गोपनीयता अधिनियम एवं आतंकवाद निरोधक अधिनियम के कानून लाए गए हैं, प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाने के लिए पोटा (पीओटीए) का इस्तेमाल किया गया है, पोटा (पीओटीए) का इस्तेमाल किया गया है। पोटा (पीओटीए) के अंतर्गत पुलिस को आतंकवाद से संबंधित आरोप लाने से पूर्व किसी व्यक्ति को छः महीने तक के लिए हिरासत में बंदी बनाकर रखा जा सकता था। वर्ष 2004 में पोटा को निरस्त कर दिया गया, लेकिन युएपीए (UAPA) के संशोधन के जरिए पुनःप्रतिस्थापित कर दिया गया, सरकारी गोपनीयता अधिनियम 1923 कारगर रूप से बरकरार रहा.

स्वाधीनता की पहली आधी सदी के लिए, राज्य के द्वारा मीडिया पर नियंत्रण प्रेस की आजादी पर एक बहुत बड़ी बाधा थी,
इंदिरा गांधी ने वर्ष 1975 में एक लोकप्रिय घोषणा की कि "ऑल इण्डिया रेडियो" एक सरकारी अंग (संस्थान) है और यह सरकारी अंग के रूप में बरकरार रहेगा.

1990 में आरम्भ हुए उदारीकरण में, मीडिया पर निजी नियंत्रण फलने-फूलने के साथ-साथ स्वतंत्रता बढ़ गई और सरकार की अधिक से अधिक तहकीकात करने की गुंजाइश हो गई। तहलकाऔर एनडीटीवीजैसे संगठन विशेष रूप से प्रभावशाली रहे हैं, जैसे कि, हरियाणा के शक्तिशाली मंत्री विनोद शर्मा को इस्तीफा दिलाने के बारे में. इसके अलावा, हाल के वर्षों में प्रसार भारती के अधिनियम जैसे पारित कानूनों ने सरकार द्वारा प्रेस पर नियंत्रण को कम करने में उल्लेखनीय योगदान किया है.

एल जी बी टी (LGBT) अधिकार
मुख्य लेख : Homosexuality in India
जब तक दिल्ली हाई कोर्ट ने 2 जून 2009 को सम-सहमत वयस्कों के बीच सहमति-जन्य निजी यौनकर्मों को गैरआपराधिक नहीं मान लिया, तबतक 150 वर्ष पुरानी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की अस्पष्ट धारा 377, औपनिवेशिक ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा पारित कानून की व्याख्या के अनुसार समलैंगिकता को अपराधी माना जाता था.

बहरहाल, यह कानून यदा-कदा ही लागू किया जाता रहा, समलैंगिकता को गैरापराधिक करार करार करने के अपने आदेश में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि मौजूदा कानून भारतीय संविधान द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों के साथ प्रतिद्वन्द्व पैदा करती है और इस तरह के अपराधीकरण संविधान की धारा 21, 14 और 15 का उल्लंघन करते हैं.

दिसंबर 11 , 2013 को समलैंगिकता को एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आपराध माना गया.

मानव तस्करी
मानव तस्करी भारत में $ 8 मिलियन अमेरिकी डॉलर का एक अवैध व्यापार है। हर साल लगभग 10,000 नेपाली महिलाएं वाणिज्यिक यौन शोषण के लिए भारत लायी जाती हैं, हर साल 20,000- 25,000 महिलाओं और बच्चों की बांग्लादेश से अवैध तस्करी हो रही है.

बाबूभाई खिमाभाई कटारा एक सांसद थे जब एक बच्चे की कनाडा में तस्करी के लिए वे गिरफ्तार कर लिए गए.

धार्मिक हिंसा
मुख्य लेख : Religious violence in India
भारत में (अधिकतर हिंदुओं और मुसलमानों के धार्मिक गुटों के बीच) सांप्रदायिक संघर्ष, ब्रिटिश शासन से आज़ादी के आसपास के समय से ही प्रचलित हैं, भारत में सांप्रदायिक हिंसा की सबसे पुरानी घटनाओं में केरल मोप्लाह (Moplah) विद्रोह था, जब कट्टरपंथी इस्लामी जंगियों ने हिंदुओं की हत्या कर दी, भारत विभाजन के दौरान हिंदुओं/ सिखों और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगों में बड़े पैमाने पर हुई हिंसा में लोग बड़ी संख्या में मारे गए थे.

1984 के सिख विरोधी दंगों में चार दिन की अवधि के दौरान भारत की नरम दलवादी धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस पार्टी के सदस्यों द्वारा सिखों की हत्या होती रही, कुछ लोगों का अनुमान है कि 2,000 से अधिक मारे गए थे, अन्य घटनाओं में 1992 के मुंबई दंगे तथा 2002 के गुजरात की हिंसा की घटनाएं शामिल हैं- उत्तरार्द्ध वाली घटना में, इस्लामी आतंकवादियो ने हिंदू यात्रियों से भरी
गोधरा में खड़ी ट्रेन को एक हमले में जला डाला, जिसमे 58 हिंदू मारे गए थे, इस घटना के परिणामस्वरूप 1000 से अधिक मुसलमान मारे गए थे (जिसका कोई उल्लेख नहीं है).

कई कस्बों और गांवों को छिटपुट छोटी-मोटी घटनाएं त्रस्त करती रही हैं; जिसमे से एक उदहारण स्वरुप उत्तर प्रदेश के मऊ में हिंदू-मुस्लिम दंगे के दौरान पांच लोगों की हत्या थी, जो एक प्रस्तावित हिंदू त्योहार के समारोह के उपलक्ष में भड़का दिया गया था, ऐसी ही एक अन्य घटना में को सांप्रदायिक दंगों में 2002 मराद नरसंहार शामिल है, जिसे उग्रवादी इस्लामी गुट राष्ट्रीय विकास मोर्चा द्वारा अंजाम दिया गया था, साथ ही साथ तमिलनाडु में इस्लामवादी तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कज़घम द्वारा निष्पादित हिन्दुओं के खिलाफ सांप्रदायिक दंगे हैं.

जाति से संबंधित मुद्दे
मुख्य लेख : Caste system in India , Caste politics in India, और Caste-related violence in India
ह्यूमन राइट्स वॉच के एक रिपोर्ट के अनुसार, दलितों और स्वदेशी लोगों (जो अनुसूचित जनजातियों या आदिवासियों के रूप में जाने जाते हैं) वे लगातार भेदभाव, बहिष्कार, एवं सांप्रदायिक हिंसा के कृत्यों का सामना कर रहे हैं। भारतीय सरकार द्वारा अपनाए गए क़ानून और नीतियां सुरक्षा के मजबूत आधार प्रदान करती हैं, लेकिन स्थानीय अधिकारियों द्वारा ईमानदारी से कार्यान्वित नहीं हो रही है।"

एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है, "यह भारतीय सरकार की जिम्मेदारी है कि जाति के आधार पर भेदभाव के खिलाफ कानूनी प्रावधानों को पूरी तरह से अधिनियमित और लागू करे.

कई खानाबदोश जनजातियों के साथ भारत की अनधिसूचित (डिनोटिफाइड) जनजातियों की जनसंख्या जो सामूहिक रूप से 60 मिलियन है, लगातार आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक कलंक का सामना कर रहे हैं, इस तथ्य के बावजूद कि आपराधिक जनजातियों के अधिनियम 1871 को सरकार द्वारा 1952 में निरसित कर दिया गया था और आभ्यासिक अपराधियों के अधिनियम (एचओए) (1952) द्वारा इतने प्रभावी रूप से प्रतिस्थापित कर दिया गया कि, तथाकथित "अपराधिक जनजातियों" की पुरानी सूची से एक नई सूची बनाई गई.

यहाँ तक कि आज भी ये जनजातियां असामाजिक गतिविधि निवारण अधिनियम' (PASA) के परिणामों को झेलती हैं, जो केवल उनके अस्तित्व में बने रहने के लिए उनके दैनन्दिन संघर्ष में इजाफा ही करते हैं क्योंकि उनमें से ज्यादातर लोग गरीबी रेखा के नीचे ही रहते हैं, नस्ली भेदभाव उन्मूलन (CERD) पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और संयुक्त राष्ट्र की भेदभाव विरोधी निकाय समिति ने सरकार से इस क़ानून को अच्छी तरह से निरसित कर देने को कहा है.

क्योंकि ये पहले की आपराधिक जन जातियां बड़े पैमाने पर उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार सहती रही हैं और कइयों को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़े वर्ग का दर्जा देने से इनकार कर दिया गया है ताकि उनके आरक्षण के अधिकार को नकार दिया जाय जो उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को ऊपर उठाता.

अन्य हिंसा
जैसे कि बिहारी-विरोधी मनोभाव के संघर्षों ने कभी-कभी हिंसा का रूप धारण कर लिया है, अपराध जांच के लिए आक्रामक तरीके जैसे कि 'नार्कोअनालिसिस' (नियंत्रित संज्ञाहरण) अर्थात अवचेतन में विश्लेषण की अब सामान्यतः भारतीय अदालतों ने अनुमति दी है.

हालांकि भारतीय संविधान के अनुसार "किसी को भी खुद उसी के खिलाफ एक गवाह नहीं बनाया जा सकता है", अदालतों ने हाल ही में घोषणा की है कि यहाँ तक कि इस प्रयोग के संचालन के लिए अदालत से अनुमति आवश्यक नहीं है। अवचेतानावस्था में विश्लेषण (Narcoanalysis) का अब व्यापक रूप से प्रयोग प्रतिस्थापित/प्रवंचना के लिए किया जाता है अपराध जांच के वैज्ञानिक तरीकों के संचालन के लिए कौशल और बुनियादी सुविधाओं की कमी है। [ मूल शोध? ] अवचेतानावस्था में विश्लेषण (Narcoanalysis) [ कौन? ] पर भी चिकित्सा की नैतिकता के खिलाफ आरोप लगाया गया है.

यह पाया गया है कि देश के आधे से अधिक कैदी पर्याप्त सबूत के बिना ही हिरासत में हैं, अन्य लोकतांत्रिक देशों के विपरीत, आम तौर पर भारत में आरोपी की गिरफ्तारी के साथ ही जांच की शुरूआत होती है, चूंकि न्यायिक प्रणाली में कर्मचारियों की कमी और सुस्ती है, अतः कई वर्षों से जेल में सड़ रहे निर्दोष नागरिकों का होना कोइ असामान्य बात नहीं है। उदाहरण के लिए, सितम्बर 2009 में मुम्बई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार से एक 40-वर्षीय व्यक्ति को मुआवजे के रूप में 1 लाख रुपये का भुगतान करने के लिए कहा क्योंकि जिस अपराध के लिए वह 10 साल से जेल में सजा काट रहा था दरअसल उसने वह अपराध किया ही नहीं था.

गाज़ा में पत्रकार भूख से मर रहे हैं- अल जज़ीरा...?

नेशनल न्यूज़ 24 नेटवर्क इंडिया 'अपनी जान जोखिम में डालकर, अब ज़िंदा रहने की लड़ाई लड़ रहे हैं', अल जज़ीरा और एएफपी का कह...