Friday, 13 October 2017

पत्रकारिता पवित्रता का दूसरा नाम है ?

हमारे देश में आज भी प्रेस अर्थात मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन आज देश में स्तंभ के लिए जहां से खूंटे तैयार किये जा रहे हैं, वहां की हालत कैसी है यह भी एक गंभीर मुद्दा है, दूसरे शिक्षा की तरहां इसे भी उसी भीड़ में शामिल करके देखा जा रहा है, जो किसी खतरे से कम नहीं है, मीडिया संस्थान मोटी रकम वसूल कर पत्रकार बनाने की बात करते हैं वहीं युवा रोजगार और मीडिया की बाहरी चका-चौंध से प्रेरित होकर पत्रकारिता के संस्थानों में दाखिला ले रहे हैं.

मुझे ये लिखते हुए बिल्कुल झिझक नहीं कि आज मीडिया की समाज के प्रति क्या जिम्मेदारियां है और मीडिया में चल रहे संक्रामण काल में उन्हें किस तरीके से अपने फ़र्ज़ को निभाते हुए एक ज़िंदा पत्रकार का रोल अदा करना चाहिए लेकिन वो कर क्या रहे हैं, आज उन्हें सच की तालीम (शिक्षा) न देकर प्रबंध की तालीम दी जा रही है जो गलत भी नहीं है लेकिन जिस तरीके से पत्रकार तैयार किये जा रहे हैं उसमें वहीं पर पत्रकारिता की आत्मा को मार दिया जा रहा है, हां कुछ बड़े मीडिया समूह इनमें से अधिकतर को अपने साथ रख लेते हैं लेकिन उनका क्या हो रहा है जो भारी भरकम फीस देकर इन संस्थानों में टीवी स्क्रीन पर चमकने का ख़्वाब लेकर पहुंचते हैं, मीडिया शिक्षा देश में अभी भी बचपने के हालात में है और पिछले कुछ सालों से भी इसका प्रचार प्रसार भी हुआ है.

साथियों मीडिया शिक्षा के लिए देश में दो सरकारी विश्वविद्यालय हैं, छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद रायपुर में स्थापित विश्वविद्यालय की स्थापना जिन उद्देश्यों के साथ वर्तमान दौर को देखते हुए की गई थी वह मीडिया के संक्रमण काल में पत्रकार तैयार करने के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है, लेकिन अभी भी इस ओर गंभीरता से बहुत कुछ करने की जरूरत है, देश में मीडिया शिक्षा संस्थानों की हालत कैसी है झांककर देखने की जरूरत है, कई ऐसे संस्थान है जहां क्षेत्रवाद और जातिवाद की बात सुर्खियों के माध्यम से चर्चे में भी आती रही है.

आईआईएमसी,बीएचयू और जामिया मिलिया की बात करें तो यहां मध्यम वर्गीय परिवार का हुनरमंद युवा पत्रकारिता की शिक्षा भारी भरकम फीस आसानी से सहन नहीं कर पाता, ऐसे में इन संस्थानों तक ऐसे युवक युवतियां ही पहुंच पा रहे है जो रईस परिवारों से तालुकात रखते हैं.

हालत ऐसी है कि प्रोफेशनल होने का चादर ओढकर पत्रकारिता के लिए निकलने वाले इन नये पत्रकारों से समाज की धरातल कोसों दूर रहती है ऐसे में ये आम आदमी की आवाज तो कम ही बन पाते हैं उससे ज्यादा चाटूकारिता कर आगे बढऩे का ख्वाब देखते हैं और इसमें कुछ क्या ज़्यादातर सफल भी हो रहे हैं.

लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि ये कम से कम पत्रकार नहीं बन पाते, पत्रकारिता की नीति शास्त्र भी कहता है कि पत्रकारिता एक पेशा भर नहीं है बल्कि उसके बहुत ऊपर की एक सोच है, यह एक मिशन है जो सामाजिक न्याय, मानवता, समरसता, स्वतंत्रता, सत्य के लिए कटिबद्ध है, समय की मांग व ठोस वास्तविकता है कि पत्रकारिता के मूल्यों की हिफ़ाज़त हर कीमत पर की जानी चाहिए.

अफ़सोस की बात ये है कि कई मीडिया शिक्षा संस्थान सिर्फ डिग्रीधारी पत्रकार बनाने की फैक्ट्री से ज्यादा कुछ भी नहीं दिखते, वहीं सरकारी संस्थानों की बात करें तो यहां राजनैतिक पहुंच के कारण कोई भी किसी भी पद का मालिक बन बैठता है, उसकी योग्यता और दक्षता को मापने की जरूरत ही नहीं समझी जाती.

यहां ये बताना भी लाजमी होगा कि इन संस्थानों से निकलने वाले पत्रकर ऐसे भी हैं जिन्हें हिन्दी में ठीक से एक पैरा तक लिखना नहीं आता और न ही कैमरा को ट्राईपोड में रखना आता है, ऐसे में क्या मतलब हुआ, ऐसे पत्रकारिता के सरकारी संस्थानों का, अगर कोई संस्थान खुद को नया बताकर अपने छात्रों को नीव का पत्थर कहकर उन्हें खुश करने की कोशिश करें तो यह कहां तक सही है सोच का विषय है ?

अब आते हैं आज की चमक-दमक वाले या शोकिया निकलने वाले अख़बार ओर पत्र पत्रिकाओं पर यहां भी कुछ अपने समाज के नाम से तो कुछ धर्म के नाम पर पत्र पत्रिकाओं को निकालें का ऐलान करते हैं ओर वो समाज की सेवा के नाम पर ही समाज को लूटने वाले कब बन जाते हैं पता ही नहीं चलता ?

आज अख़बारों पर तो नई सलाम ने कुछ अंकुश लगाया है लेकिन टीवी मीडिया मैं इसकी बाढ़ सी आ गई है जहां पत्रकारिता के नाम पर व्यापार किया जा रहा है, आज ऐसे लोग चैनल के लोगो का माइक हाथ मैं लेकर शहर मैं घूमते नज़र आ जायेंगे जिनको पत्रकारिता की ए बी सी डी भी नहीं मालूम, वहीं इस व्यापारी व्यवस्था से कुछ पत्रकारों के सम्मान को ठेस पहुंची ओर उन्होंने पत्रकारिता को ही अलविदा कह दिया.

ऐसे सैंकड़ों पत्रकारों को मैं जानता हुँ जो पत्रकारिता की जान है लेकिन आज उनकी क़लम ख़ुद उनकी ईमानदारी से बेजान है, मगर आज वो लोग पत्रकारिता को मज़ाक़ बनाये हुए हैं जो सच मैं ख़ुद एक पत्रकार की क़लम की बड़ी ख़बर हैं, ऐसे लोग आज भारी तादाद मैं हमारे बीच हैं ये आप देख भी रहे होंगे?

लेकिन आज मैं यहां बड़ी ही ईमानदारी से एक बात कहना चाहुंगा कि हम अगर किसी ऐसे समूह से जुड़े हैं या जुड़ने जा रहे हैं तब हम ख़्याल रखें पत्रकारिता से ऐसे लोगों को जोड़े जो सच मैं पत्रकारिता की गरिमा को बढ़ाने मैं साथी हो सकते हैं वरना चाटूकारिता को पत्रकारिता कहकर बदनाम ना करायें या करें.

एक सही पत्रकार का काम अपने आसपास की गंदगी को निडरता से देश ओर देश की जनता के सामने लाकर उसका समाधान करना होता है जो किसी एक से उसका बनकर चिपक जाये वो पत्रकार नहीं हो सकता हां चापलूस कह सकते हैं, पूरा पढ़ने के लिए शुक्रिया दोस्तों .

आपका दोस्त ख़ादिम
एस एम फ़रीद भारतीय

मानवाधिकार कार्यकर्ताओ के साथ बदसुलूकी करने वाले पुलिस कर्मियों के खिलाफ दर्ज होगी FIR नही तो एसएसपी पर होगी कार्यवाही- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग

नई दिल्ली- आज कुछ सपना साकार होने के साथ रंग लाई है *पीयूसीएल* की मेहनत जब रास्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने केंद्र ओर राज्य सरकारों को भी चेताते हुए कहा कि मानवाधिकार कार्यकर्ता नही है भीड़ का हिस्सा, मानवाधिकार कार्यकर्ताओ के साथ बढ़ती ज्यादती और पुलिस के अनुचित व्यवहार के चलते कई बार मानवाधिकार कार्यकर्ता आजादी के साथ अपना काम नही कर पाते है. उसी को ध्यान में रखते हुए रास्ट्रीय मानवाधिकार आयोग  के अध्यक्ष ने राज्य सरकारों को चेतावनी देते हुए निर्देश भी दिया है कि पुलिस आदि मानवाधिकार कार्यकर्ता के साथ बदसलूकी ना करें.

मानवाधिकार कार्यकर्ता भीड़ का हिस्सा नही है.

किसी स्थान पर हिंसा या बवाल होने की स्थिति में मानवाधिकार कार्यकर्ताओ जो स्वयं सेवी संस्थान को उनके काम करने में पुलिस व्यवधान नही पहुँचा सकती, पुलिस जैसे भीड़ को हटाती है वैसा व्यवहार मानवाधिकार कार्यकर्ताओ के साथ नही कर सकती, ऐसा होने की स्थिति में बदसलूकी करने वाले पुलिसवालों या अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज किया जायेगा.

अध्यक्ष ने कहा कि जिस तरह कोर्ट में एक अधिवक्ता अपने मुवक्किल का हत्या का केस लड़ता है पर वह हत्यारा नही हो जाता है, उसी प्रकार किसी सावर्जनिक स्थान पर मानवाधिकार कार्यकर्ता NGO अपना काम करते है पर वे भीड़ का हिस्सा नही होते, इसलिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओ को उनके काम से रोकना मानवाधिकार की स्वतंत्रता का हनन करना है !

सभी राज्यों को दिए निर्देश
रास्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष ने देश के केबिनेट सचिव, गृह सचिव, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, मुख्य सचिवों व गृह सचिवों को इस सम्बन्ध में निर्देश भेजा है... और उसमे स्पष्ट कहा है कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओ के साथ पुलिस या अर्द्ध सैनिक बलों की हिंसा बर्दाश्त नही की जायेगी.

सरकारे ये सुनिश्चित करें कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओ के साथ ऐसी कोई कार्यवाही कही न हो, पुलिस की मानवाधिकार कार्यकर्ताओ के साथ की गई हिंसा मानवाधिकार की स्वतन्त्रता के अधिकार का हनन माना जायेगा, और  संविधान की धारा के तहत बदसलूकी करने वाले पुलिसकर्मी या अधिकारी पर आपराधिक मामला दर्ज होगा.

नोट- आप नहीं जानते होंगे कि देश का सबसे पहला मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल है ओर तीनों राष्ट्रीय आयोग पीयूसीएल की याचिका पर ही बने हैं, सबसे आखिर मैं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन हुआ जबकि सबसे पहले अल्पसंख्यक आयोग का दोनों के बीच महिला आयोग का गठन पीयूसीएल ने कराया.
मुझे गर्व है कि मैं पिछले अठ्ठाइस सालों से पीयूसीएल से जुड़ा हुँ.

*एसएम फ़रीद भारतीय*
लेखक सोशलिस्ट मानवाधिकार कार्यकर्ता

अगर आप बेगुनाह हैं तब कैसे बचें पुलिस के झंझटों से

एस एम फ़रीद भारतीय
कुछ लोग आपसी मतभेद में एक दूसरे के खिलाफ झूठी एफआईआर लिखवा देते हैं, अकसर ऐसे मामलों में जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है, वे पुलिस और कोर्ट के कानूनी झंझटों में फंस जाते हैं और उनका पैसा, वक़्त और ज़िंदगी बर्बादी की तरफ़ पर चल पड़ता है, क्या आप जानते हैं कि ऐसी झूठी शिकायतों के खिलाफ आप कार्रवाई कर अपने खुद बचा सकते हैं ?

भारतीय संविधान में भारतीय दंड संहिता की धारा 482 ऐसा ही एक कानून है जिसके इस्तेमाल से आप ऐसे झंझटों से बच सकते हैं.

क्या है धारा 482
भारतीय दंड संहिता की धारा 482 के तहत आप अपने खिलाफ लिखाई गई एफआईआर को चैलेंज करते हुए हाईकोर्ट से निष्पक्ष न्याय की मांग कर सकते हैं, इसके लिए आपको अपने वकील के ज़रिये हाईकोर्ट में एक प्रार्थनापत्र देना होगा, जिसमें आप पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर पर सवालिया निशान लगा सकते हैं, अगर आपके पास अपनी बेगुनाही के सबूत जैसे कि ऑडियो रिकॉर्डिग, वीडियो रिकॉर्डिग, फोटोग्रॉफ्स, डॉक्यूमेंट्स हों तो आप उनको अपने प्रार्थना पत्र के साथ लगायें, ऐसा करने से हाईकोर्ट में आपका कैस बहुत मजबूत हो जाता है.

कैसे करना चाहिए धारा 482 का प्रयोग
धारा 482 का प्रयोग दो तरह से किया जाता है, पहला प्रयोग ज्यादातर दहेज तथा तलाक के मामलों में किया जाता है, इन मामलों में दोनों पार्टियां आपसी रजामंदी से सुलह कर लेती हैं, जिसके बाद लड़की पक्ष हाईकोर्ट में लड़के पक्ष के खिलाफ एफआईआर कैंसिल करने की एप्लीकेशन देता है, जिसके बाद लड़के पक्ष के खिलाफ दायर 498, 406 तथा अन्य धाराओं में दर्ज मामले हाईकोर्ट के आदेश पर बंद कर दिए जाते हैं.

तुरंत रुकवा सकते हैं पुलिस की कार्रवाई दूसरा प्रयोग आपराधिक मामलों में किया जाता है, मान लीजिए किसी ने आपके खिलाफ मारपीट, चोरी, बलात्कार अथवा अन्य किसी प्रकार का षडयंत्र रचकर आपके खिलाफ पुलिस में झूठी एफआईआर लिखा दी है.

आप हाईकोर्ट में धारा 482 के तहत प्रार्थना पत्र दायर कर अपने खिलाफ हो रही पुलिस की कार्रवाई फ़ौरन रुकवा सकते हैं, यही नहीं हाईकोर्ट आपकी एप्लीकेशन देखकर संबंधित जांच अधिकारी जांच करने के लिए आवश्यक निर्देश दे सकता है, इस तरह के मामलों में जब तक हाईकोर्ट में धारा 482 के तहत मामला चलता रहेगा, पुलिस आपके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकेगी, यही नहीं यदि आपके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी है तो वह भी तुरंत प्रभाव से हाईकोर्ट के आदेश आने तक के लिए रूक जाएगा.

किन बातों का रखें ध्यान
इस कानून के तहत आप को एक फाइल तैयार करनी होती है जिसमें एफआईआर की कॉपी तथा आपके प्रार्थना पत्र के साथ-साथ आपको जरूरी एविडेंस भी लगाने होते हैं, यदि एविडेंस नहीं है तो आप अपने वकील से सलाह मशविरा कर पुलिस में दर्ज शिकायत के लूपहोल्स को ध्यान से देख कर उनका उल्लेख करें, इसके अतिरिक्त आप यदि आपके पक्ष में कोई गवाह है तो उसका भी उल्लेख करें.

नोट- लेखक मानवाधिकार कार्यकर्ता ओर मानवाधिकार कैसों के सलाहकार है सिर्फ़ सलाह बतौर आपको जानकारी दी गई है ये कार्यवाही आपको वकील के ज़रिये ही करनी होगी.
०९८०८१२३४३६

Thursday, 12 October 2017

सुप्रीमकोर्ट अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करे ?

एस एम फ़रीद भारतीय

सुप्रीमकोर्ट कोर्ट के फ़ैसले को आज मैं देख रहा हुँ कि ये फ़ैसला जनहित का ना होकर ख़ुद के स्वार्थ का ज़्यादा है ?
सुप्रीमकोर्ट के फ़ैसले पर उंगली उठाना मेरा मक़सद नहीं है, लेकिन मैं भी मानवाधिकारवादी हुँ ओर तमाम मानवता मेरी नज़र मैं है, आज मैं ये सब इसलिए लिखने को मजबूर हुआ हुँ जब ये दूसरा फ़ैसला देशहित नहीं स्वार्थ हित मैं आया है.

इस फ़ैसले की बात करूं तो सुप्रीमकोर्ट ने एनसीआर मैं बंम पटाख़ों की बिक्री पर रोक लगाई है इससे ये ज़ाहिर हुआ कि एनसीआर मैं साहेब लोगों का बसेरा है आम आदमी को तो इस आदेश से राहत तुफ़ैल मैं मिल रही है बस, दूसरे सुप्रीमकोर्ट ने दिखा दिया कि उसकी नज़र मैं बस एनसीआर के लोगों का महत्व है, पूरे मुल्क के इंसान बस एनसीआर मैं ही बसते हैं बाकी देश के नागरिकों को इससे कोई नुकासान नहीं होगा ?

तब मैं एक सवाल करना चाहता हुँ कि वो प्रदुषण को नापने का कौनसा पैमाना है जिससे ये फ़ैसला सुनाया गया, जब एनसीआर से बाहर के लोग इससे दूषित नहीं होंगे तब सर वही फ़ार्मूला एनसीआर पर भी लागू करें ना ?

सबसे अलग सुप्रीमकोर्ट ने ये फ़ैसला तब दिया जब ये बंम पटाखे फ़ैक्टरियों से निकलकर आम ग़रीब के हाथों मैं आ चुके हैं वो भी उन ग़रीबों के जो नोट बंदी के साथ महंगाई की मार से परेशान हैं ओर कुछ अपने को संभालने के लिए इस दीपावली कुछ कमाने के चक्कर मैं साहूकारों से मोटे ब्याज पर पैसा लेकर अपनी आजीविका शुरू करना चाहते थे, कुछ ने तो अपने आपको गिरवी रखा है वहीं कुछ ने बीवी बच्चों के गहने या मकान वगैरा.

अब सोचें इस फ़ैसले से नुकसान किसका है, कौन पिस रहा है क्या बड़े व्यापारी या छोटे तबक़े के ग़रीब मज़दूर ?

वहीं ये एक हिंदोस्तान के बड़े धर्म की आस्था का सवाल भी है, करोड़ों लोग इस दीपावली पर्व को साथ मिलजुल कर मनाते हैं माननीय सुप्रीमकोर्ट ख़ुद कहती आई है कि वो धर्म के मामले मैं दखल नहीं देगी जहां करोड़ों लोगों की आस्था का सवाल हो तब ये आदेश क्यूं ?

इससे पहले भी एक फ़ैसला ऐसा ही आया था जिससे करोड़ों ग़रीब के परिवारों पर फ़ैसले का सीधा असर हुआ था वो था गुटके ओर शराब को लेकर, सुप्रीमकोर्ट ने कुछ गुटका कम्पनियों के साथ शराब बंदी के विज्ञापनों पर रोक लगा दी थी गुटके को ज़हर बता कर क्यूंकि उसमें तम्बाकू मिला था ओर बहुत सी कम्पनियां बना रही थी जिससे गुटका खाने वालों को कम्पनियों की बहस मैं गुटका पचास पैसे तक मैं मिल रहा था.

मगर आज गुटके बनाने वाली कुछ ही कम्पनियां हैं ओर उन्होंने अपने क्षेत्र भी बांटकर पचास पैसे वाले गुटके को पांच रूपये का कर दिया क्या लोगों ने गुटका खाना बंद कर दिया है ?

नहीं ना उतना ही बिक रहा है ओर खाया जा रहा है, हां शायद अब मसाला ओर तम्बाकू अगल मिलकर पांच रूपये मैं बिकने से ये गुटका ज़हर से अमृत बन गया है बात लम्बी है इस लिए बाद मैं फ़िलहाल मैं माननीय सुप्रीमकोर्ट से गुज़ारिश करूंगा कि वो अपने फ़ैसले पर इस दीपावली पुनर्विचार करें ओर अगली दीपावली लोगों मैं जागरूकता पैदा करें के उपायों पर सरकार को दिशानिर्देश जारी करे, जिससे विदेशों से आने वाले बंम पटाखे देश मैं ना आ पायें ओर ना ही देश की कम्पनियां इनको बड़े स्तर पर बना पायें, तभी इससे देश ओर देश की जनता को फ़ायदा होगा वरना हज़ारों ग़रीब बेमौत मारे जायेंगे.

नोट ये मेरी अपनी सोच है ज़रूरी नहीं आप सहमत हों !
जयहिंद जयभारत

Tuesday, 10 October 2017

इमरान प्रतापगढ़ी से कुछ सवाल, कुछ तो शर्म करो इमरान ?

प्रोफ़ेसर माजिद मजाज़ के इस ख़ुलासे ओर सवालों के बाद मेरे जहन मैं अस्सी के दशक के जामा मस्जिद के इमाम अब्दुल्ला बुख़ारी की याद आ गई जिन्होंने क़ौम को भरोसे मैं लेकर पहले नाम शौहरत ओर इज़्ज़त के साथ दौलत कमाई लेकिन बाद मैं क़ौम ने जब समझा तब उनके साथ क्या हुआ, यही हाल मुझको इन इलज़ामों के सामने आने के बाद इमरान प्रतापगढ़ी का लग रहा है पढ़े पूरी ख़बर ओर इल्ज़ाम ओर जवाब मांगे इमरान से, ओर अगर इमरान साहब आपकी नज़र से ये पोस्ट गुज़रे तो बड़ी ही इमानदारी से जवाब दें ?

दलाली वाले सफ़र का आग़ाज किया मदरसे की नज़्म पढ़कर फिर अकबरुद्दीन ओवैसी पर नज़्म पढ़कर लोकप्रियता बटोरने के बाद चेहरे पर हल्की निखार आई और तबतक दौलत-ओ-शोहरत का नशा भी सर चढ़कर बोलने लगा।

फिर फ़लस्तीन-कश्मीर तक का नाम लेकर खाड़ी देशों में जाकर अवाम के सामने फ़र्ज़ी आँसू बहाकर लोगों को भावना की क़ैद में जकड़ लिया।

फिर वापस उसी उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद चलते हैं जहाँ मुख़्तार अंसारी का नाम लेकर आँसू गिराये तो इलाहाबाद में अतीक़ अहमद का नाम लेकर अपनी दुकान चमकाई।

अब चूँकि दलाली के लिंक रोड से निकल कर सीधा हाईवे का सफ़र तय करना था क्योंकि अब मारुति 800 से सीधा फ़ॉरचुनर पर आ गये थे। इसलिये सैफई के रास्ते लखनऊ के हुक्मरान अखिलेश यादव को “सियासत की दुनिया का दरवेश” तक कहना पड़ा। बदले में उत्तर प्रदेश के समाजवाद ने उस मुग़लिया दौर से चली आ रही प्रथा को “यश भारती” के रूप में रिटर्न गिफ़्ट किया वही जिसे मुनव्वर राणा ने अपनी एक नज़्म में “शाही टुकड़ा” कहा था।

इसी सफ़र में सर सैय्यद बनने का भूत भी सवार हुआ फिर स्कूल खोलने का सपना देखने के बाद फिर कॉलेज फिर विश्वविद्यालय का नाम लेकर मुल्क के अमीर लोगों से लेकर अरब देशों तक हर जगह कई करोड़ रुपये का चंदा इकट्ठा किया, पर चूँकि ईरान के साथ कूटनीतिक रिश्तों में आई दरार की वजह से यहाँ कारीगर नहीं आ पाये इसलिये आज कई सालों से स्कूल/विश्विद्यालय का बाथरूम तक नहीं बन सका।

फिर जनाब पहुँचे मुल्क की पुरानी राजधानी कोलकाता की तरफ़ जहाँ पश्चिम बंगाल की दारुल हुकूमत के इर्द गिर्द चक्कर काटने के बाद ममता बनर्जी तक पहुँचे, वहाँ थोड़ा बहुत ऐंठ पाये क्योंकि बंगाल वाले फिर से किसी ‘मीर जाफ़र’ के हाथों शिकार नहीं होना चाहते थे।

जैसा कि आपको पता होगा कि लालू यादव के बिना भारतीय राजनीति कूड़े के ढेर के बराबर है, इसलिये जनाब किसी हिसाब से वहाँ पहुँचे पर दाल नहीं गल पाई क्योंकि इनकी दलाली से तबतक हर कोई आगाह हो चुका था।

इसी बीच मुल्क में फ़ासिस्ट संगठनों द्वारा हो रही मॉब लिंचिंग में मारे गये मजलूमों ने इनकी अर्थव्यवस्था में चार चाँद लगा दिया। फिर हर छः महीने में नई फ़ॉरचुनर, शाही रहन-सहन, चापलूसों की एक बड़ी जमात इकट्ठा कर ली।

अब हाल में जनाब कांग्रेस के बहाने शिवसेना के साथ हैं, उम्मीद करता हूँ कल जनाब चंद सिक्कों की ख़ातिर संघ की गोद में बैठे होंगे.

-प्रोफ़ेसर माजिद मजाज़

Tuesday, 3 October 2017

सच मैं जब पढ़ेगा इंडिया तब आगे बढ़ेगा इंडिया ?

एस एम फ़रीद भारतीय
*सम्पादक सैफ़ी पोस्ट*

पढ़ेगा भारत, बढ़ेगा भारत ?
पढ़ेगा इंडिया तभी तो
आगे बढ़ेगा इंडिया ?
बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ ?
पढ़ोगे नहीं तो आगे बढ़ोगे नहीं ?

ये सारे नारे वो हैं जिनको एक तरफ़ा सोच ज़हन मैं आने के बाद लागू किया गया है, देश के राजनेता ओर सरकार चाहते है कि भारत अमेरिका, फ़्रांस, जापान, जर्मन ओर पैरिस बन जाये, हमारी भी पढ़ाई के नाम पर पहचान हो दुनियां मैं नाम हो, क्या ये सोच सही है, क्या इस सोच ओर कार्यवाही से मेरा देश आगे बढ़ेगा, किसको इसका फ़ायदा मिलेगा ?

आईये इन मुद्दों पर फिर से सोचते हैं कि पढ़ाई लिखाई से किसको क्या मिलेगा !

मान लो मैं अपनी क़ौम ओर क़बीले की बात करूं तब मेरे क़बीले का काम औज़ार ओर हथियार बनाने के साथ खेतीबाड़ी करना भी है, मेरे क़बीले के लोग जिनको आज सैफ़ी यानि लोहे ओर लकड़ी के काम करने वालों के रूप मैं जाना जाता है, सैफ़ी क़बीले के लोग बहुत ही मिलनसार होने के साथ दयालु भी होते हैं, सैफ़ी को पैदाईशी इंजिनियर भी कहा जाता है, कितना भी मुश्किल काम हो ये चुटकियों मैं पूरा करने का जज़्बा अपने हुनर के साथ करने का रखता है !

अब मान लो सैफ़ी क़बीला या बाकी काम ओर मज़दूरी करने वाला समाज अपने बच्चों को सौ फ़ीसद पढ़ाई के क्षेत्र मैं डाल दे तब जो काम ये लोग करते हैं उनको कौन करेगा, कैसे भारत के किसान ओर मज़दूर की समस्याऐं पूरी होंगी, कैसे खेतों मैं अनाज उगाया जायेगा, कैसे इंसानी ज़रूरतों के लिए काम करने वाले मज़दूर पैदा होंगे, क्या बच्चा पढ़ लिखकर वो सब फिर से कर पायेगा ?

नहीं कर पायेगा ओर ना ही सरकार आज इनकी मदद कर रही है ओर ना ही कल कोई मदद कर पायेगी तब देश की हालत बेइंतहा ख़राब होगी, आज भी देश मैं पढ़े लिखे बेरोज़गारों की बड़ी तादाद है, लाखों घर अपने बच्चों को आगे बढ़ाने के चक्कर मैं अपना सब कुछ दाव पर लगाकर अपने बेटे को रोज़गार ना मिलने पर तबाह ओर बर्बाद कर चुके हैं.

ओर जबजब सरकार ने विदेशों से मुकाबला करते हुए विदेशी नीति को भारत पर जबरन थोपा है तब तब भारत के नागरिकों को उसका उल्टा परिणाम मिला है, कैसे आईये आपको समझाते ओर दिखाते हैं ?

देश मैं जब से मशीनी करण हुआ है तब से देश की हालत अंदर से सुधरने के बजाये बिगड़ी है क्यूंकि मशीनों ने भारत से रोज़गार छीनने के साथ अपने कामों को कभी भी पूरी तरहां पूरी ईमानदारी से अंजाम नहीं दिया है ?

सफ़ाई पर हम सबसे पहले आते हैं ?
पहले नगरपालिकाओं मैं सफ़ाई कर्मियों की भर्ती इलाकों मैं सफ़ाई के लिहाज़ से हुआ करती थी, आज जब से नगरपालिकाओं मैं मशीने जेसीबी ट्रेक्टरों ने काम करना शुरू किया है तब ही से देश के शहरों मैं गंदगी के ढेर लगने शुरू हुए हैं, जानते हैं क्यूं ?

क्यूंकि मशीनें अपना काम उस तरहां नहीं करती जिस तरहां पहले सफ़ाई कर्मचारी किया करते थे ओर ना ही मशीनें उस जगह पहुंच पाती हैं जहां सफ़ाई कर्मचारी पहुंच जाया करते थे, वहीं मशीनों ने सफ़ाई कर्मचारियों को भी लापरवाह ओर नकारा बना दिया है, पहले सफ़ाई कर्मचारियों की पोस्ट के लिए मारामारी रहती थी ओर ये लोग दिलसे काम किया करते थे लेकिन आज हालात आपके सामने हैं ?

अब आते हैं देश की दो सबसे बड़ी ज़रूरतों पर यानि किसान ओर मज़दूरी पर ये ही दोनों देश की सबसे बड़ी ताक़त हैं, इन्हीं के भरोसे देश चल रहा है ओर आज सबसे कड़वा सच भी यही है कि देश का किसान ओर मज़दूर दोनों ही परेशान हैं, आज किसान ओर मज़दूरों के बेटे अपने पुश्तैनी काम को करने के लिए तैयार नहीं हैं, लाखों किसान अपने पैरों पर ख़ुद कुल्हाड़ी मार चुके हैं, हज़ारों परेशान आकर ख़ुदकुशी कर चुके हैं जानते हैं क्यूं ?

क्यूंकि उन्होंने अपनी औलाद को पढ़ा लिखाकर बड़ा अफ़सर या सरकारी कर्मचारी बनाने के लिए अपनी मेहनत ओर खेतों को गिरवी रखकर बैंकों साहुकारों से इस उम्मीद पर कर्ज़ा ले लिया कि पढ़कर जब बेटा बड़ा बनेगा तब वो सबकुछ ठीक कर देगा, लेकिन उसके सभी सपने तब चकनाचूर हो गये जब वो पढ़ लिखने के बाद आज भी दरदर की ठोकरें खा रहा है, पढ़ाई लिखाई ज़्यादा करने की वजह से अब खेती ओर मज़दूरी करते मैं उसको शर्म आती है, बूढ़े मां बाप की हड्डियों मैं अब इतना दम नहीं कि वो खेती या मज़दूरी कर सकें, तब आज घर मैं खाने के लाले पड़े हैं !

मेरे कहने का मतलब ये भी नहीं है कि आप अपनी औलाद को बिल्कुल ना पढ़ाये या सरकार पढ़ाई की योजनाओं को बंद कर दे, नहीं बिल्कुल नहीं मेरे कहने का मतलब ये है कि जिस तरहां से आज हमारी पीढ़ी को बड़े सपने दिखाकर पढ़ाई के संस्थान लूट रहे हैं आज पढ़ाई के मंदिर लूट के अडडे बन चुके हैं वो बंद होने चाहिए.

पढ़ाई लिखाई इतनी हो जितनी एक आदमी को अपने कारोबार या आपसी बोलचाल के लिए ज़रूरी है, अंग्रेजों का मुकाबला पढ़ाई मैं करने हमारी सरकार की बेवकूफी है, मशीनी करण भी जहां विदेशियों की ज़रूरत है वहीं हमारी तबाही है क्यूं, क्यूंकि विदेशियों की आबादी हमारे मुल्क की आबादी के मुकाबले कुछ भी नहीं है, दूसरे जिसको हम पढ़ाई का आधार मानते हैं अंग्रेजी ? अरे भाई वो उनकी मादरे ज़ुबान है !

मेरा सरकार से अनुरोध है कि वो अपने देश की शिक्षा के तरीके को बदले, कोर्स मैं बदलाव हो पढ़ाई ऐसी हो जिससे पढ़ने वाला अपने पुश्तैनी काम से दूर ना जाकर उसको बढ़ावा दे सारे ही अगर इंजीनियर बन जायें या डाक्टर बन जायें तब मज़दूरी कौन करेगा, क्या मेरे देश के सभी पढ़े लिखों को रोज़गार मिल गया ???

जवाब किसी के पास हो तो बतायें ?

Sunday, 1 October 2017

सैफ़ी समाज क्या हैं क्या आप जानते हैं ?

एस एम फ़रीद भारतीय
दोस्तों अज़ीज़ो ओर साथियों लेख बड़ा हो सकता है आपकी निगाह मैं लेकिन मेरी निगाह मैं बहुत ही छोटा है ये हमारे क़बीले की आन बान ओर शान से जुड़ा लेख है मैने इसको बहुत ही छोटा करने की कोशिश की है बहुत से सवालों को छोड़ दिया है फिर भी अपनी कोई भी राय पूरा पढ़ने से पहले ना दें ये मेरी गुज़ारिश है.
जहां हम आज तक ख़ुद से ही सवाल करते आये हैं कि
हम यानि सैफ़ी क्या हैं, तब मैं एक छोटा सा परिचय ख़ुद से मतलब सैफ़ी समाज यानि क़बीले से कराना चाहता हुँ कि हम सैफ़ी हैं क्या ओर आज ये सैफ़ी पोस्ट साप्ताहिक ज़रिया है इसी सोच ओर अपने को खुद के साथ अपनी क़ौम ओर देशवासियों से रूबरू कराने का, उम्मीद है आप भी मेरी सोच से इत्तेफ़ाक़ करेंगे ?
हमेशा ही एक अजीब सी हलचल हमारे ख़ुद के अपने दिलों मैं भी रहती है कि हम सैफ़ी समाज के लोग क्या हैं ओर आज तक हम अपने हुनर का लोहा दुनियां के सामने क्यूं नहीं मनवा पाये आज मैं ऐसे ही सैकड़ों सवालों का जवाब अपनों के साथ अपने को भी देना चाहता हुँ ओर आप सभी सैफ़ी भाईयों से गुज़ारिश करता हुँ कि आप फ़क़र् के साथ कह सकते हैं कि मैं सैफ़ी हुँ, आप ओर हम ही क्यूं पूरी दुनियां ओर देश की अवाॅम को कहना चाहिए कि हमको सैफ़ियों पर फ़क्र है!
क्यूं कहना चाहिए आज मैं इसी का ख़ुलासा बड़े ही खुले दिमाग से करना चाहताआपको ये हुँ ओर आप सभी को ये भी बताना चाहता हुँ कि ये मेरी ख़ुशफ़हमी या किसी गुरूर की बात नहीं है हां इतना यक़ीन ज़रूर है कि जो मैं कहने जा रहा हुँ उससे पूरी दुनियां के लोग इत्तेफ़ाक़ करेंगे क्यूंकि मैं किसी नशे या ख़ुश फ़हमी मैं ये सब नहीं लिख रहा हुँ ओर ना ही बढ़ा चढ़ाकर लिखने की कोशिश कर रहा हुँ, मैं वही लिख रहा हुँ जो सैफ़ी समाज था है ओर शायद रहेगा भी.
कुछ लोग बहुत ही कड़वी ज़ुबान में ओ लुहार के, ओ बढ़ई के, कहकर भी पुकारते थे, कुछ लोग इससे भी गंदी ज़ुबान मैं पुकारा करते थे, कुछ ऐसे बेहुदा अल्फ़ाज़ बोलते जो सीधे दिलों पर चोट किया करते, लेकिन आख़िर करें तो क्या करें, जाएं तो कहां जाएं, सालों महीनों दिनों दिन जीतोड़ मेहनत करके किसानो के खेतों के लिए नये औज़ार बनाते कृषि यंत्रों की मरम्मत करते, मिस्त्री के लिए कमाई का इंतज़ाम, इतना सबकुछ करने के बावजूद सामाजिक और आर्थिक रूप से हमेशा दबाये जाते रहे.
इस सबसे परेशान आकर बिरादरी के लोगों ने जो लुहार ओर बढ़ई के नाम से जाने जाते थे तय किया कि क्यूं ना अपने नामों को ही बदला जाये तब बढ़ियों लकड़ी का काम करने वालो ने अपने लिए नूही नाम तज़्वीज़ किया और लोहे का काम करने वाले लुहारों ने दाऊदी नाम पर ज़ोर दिया.
लेकिन ये दोनों ही नाम नूही ओर दाऊदी इस क़बीले को अलग अलग बांटने वाले थे, जबकि ये दोनों ही काम करने वाले यानि लुहार-बढ़ई एक ही क़बीले के लोग हैं बेशक काम अलग अलग हों, तब कुछ बुज़ुर्गों की सलाह पर नाम के लिए मिटिंगें होती रही लेकिन सब बेनतीजा रहीं, तब अमरोहा में एक महासम्मेलन हुआ, बड़ी मेहनत व जिद्दोजहद ओर लाख कोशिशें करने के बाद दसियों हज़ार बिरादरी के लोगों के बीच 6 अप्रैल 1975 को स्वतंत्रता सेनानी और अल-जमियत उर्दू अख़बार के संपादक हज़रत मौलाना उस्मान फरकिलित साहब ने एक नाम तय किया "सैफ़ी" जो सब लोगों को बहुत ही पसंद आया ओर इसे तभी अपना लिया गया !
आज हम लोग इस नाम के साथ जहां अपने आप मैं फ़क्र महसूस करते हैं वहीं दिल मैं एक बात बड़े ज़ोर से खटकती भी रहती थी कि इस सैफ़ी सरनेम से पहले हम क्या थे, क्या लुहार ओर बढ़ई कोई सरनेम था या काम की पहचान ? बस तभी से अपने क़बीले के बारे मैं जानने की तमन्ना बढ़ गई ओर मैं कोशिश करने लगा कि किसी भी तरहां मालूम हो जाये हमें सैफ़ी सरनेम से पहले किस सरनेम से जाना जाता था!
काफ़ी कोशिशों के बाद मेहनत रंग लाई ओर जो कुछ सामने आया उससे बहुत सी उल्झने अपने आप सुलझती चली गई ओर दिमाग अपने आप काम करने लगा, जो कुछ जाना वही आप लोगों से साझा करने की कोशिश कर रहा हुँ ओर यक़ीन है आप भी अपने को मेरी सोच से इत्तेफ़ाक़ के लिए तैयार करेंगे.
दोस्तों जब भी मैं कहीं जाता तब मेरे दिमाग मैं एक ही सोच होती कि यहां से कुछ हमारे बारे मैं मालूम हो जाये, बातों ही बातों मैं जानने की कोशिश करता मगर कुछ तो उस वक़्त उम्र के लिहाज़ से मेरी बैचेनी को टाल देते ओर कुछ नासमझ समझकर बस अपने हिसाब से जवाब दे देते, जो मेरे गले नहीं उतरता था ओर मैं असल जवाब की तलाश मैं लगा रहता वो भी किसी लिखित सबूत के साथ, बस ये एक धुन सी बन गई थी ओर मुझको जानना था.
तब एक दिन ऐसा भी आया जब मैं जिस जगह कई बार अपने सवाल को बहुत से लोगों के सामने दोहरा चुका था वहीं मुझको सबूत के साथ अपने सवाल का मुकम्मल जवाब मिल गया ओर वो जगह थी मेरी बड़ी बहन की ससुराल यानि अलीगढ़ टनटन पारा मैं इमामुद्दीन बिल्डिंग.
हुआ यूं कि मैं एक बार जब बड़ी बहन के यहां गया तब उस वक़्त मेरे बहनोई जनाब क़ासिम साहब अपने किसी कागज़ की तलाश मैं अपने सभी कागज़ों के बक्से को खोले बैठे थे, ओर मैं वहां पहुंच गया तब मेरे बहनोई साहब ने ख़ुशी से मेरा इस्तग़्बाल करते हुए कहा कि फ़रीद साहब सही वक़्त पर आये हैं आप कुछ मेरी मदद करें इन कागज़ों को तरतीब से लगाने के साथ जिस कागज़ की मुझे तलाश है उसे ढूढने मैं, मैने कहा क्यूं नहीं लेकिन मेरी ऊर्दू इतनी अच्छी नहीं है जितनी आपकी है फिर भी मैं कोशिश करता हुँ ओर लग गया अपने बड़े बहनोई साहब के साथ.
कागज़ों को खंगालते हुए मेरे हाथ वो कागज़ लगा जिसकी मेरे बहनोई क़ासिम साहब को तो तलाश थी ही वहीं वो मेरे सवाल का जवाब भी था, वो कागज़ कासिम साहब के एक परदादा के मकान का कागज़ था जो उनको एक मुक़दमें मैं अदालत मैं जमा करना था ओर वो उस मकान का बैनामा था!
बैनामें पर जो मैने पढ़ा तो मैं दंग रह गया ओर अपने बहनोई कासिम साहब से पूंछा कि इस कागज़ मैं तो लिखा है आप लुहार नहीं नज्जार हैं आपका पेशा नज्जार ओर क़ौम मुस्लिम शेख़ लिखा हुआ है ?
तब क़ासिम साहब ने बताया कि नज्जार लुहार को ही कहा जाता है ओर हम ओर आप पक्के लुहार हैं ओर हमारा क़बीला मुस्लिम शेख़ है !

नोट ये लेख अभी पूरा नहीं है बाकी बाद मैंं इंशाअल्लाह 

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